प्रश्नकर्ता: त्रिपुरा रहस्य में संगति के बारे में बहुत बोला गया है। मतलब सत्संगति आपको मोक्ष की ओर ले जाती है। क्या अपनी संगति हम चुन सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: बिलकुल! वहीं एक चुनाव है जो आपको जी-जान से करना चाहिए, जिस पर अड़ जाना चाहिए।
प्र: मेरे जीवन में तो ऐसा लग रहा है कि जो संगति मेरे पास है, वो सब ख़ुद से हैं।
आचार्य: संगति अगर आप चुनना चाहते हैं, तो सूत्र बताए देता हूँ। ये पूछ लीजिए कि 'किसकी संगत में मन कैसा हो जाता है। किसकी संगत में परमात्मा की सुध आती है, और किसकी संगत में परमात्मा बिलकुल भूल ही जाता है। किसके साथ बैठकर अगर सत्य का नाम लूँगा, तो साथी कहेगा – क्या खूब! और किसके साथ बैठूँगा और सत्य वचन बोल दिया, तो साथी कहेगा – अब कभी मुँह मत दिखाना मुझें।' यही है चुनाव।
जिसके साथ बैठकर के परमात्मा का नाम लेना आसान हो जाता हो, बस उसके साथ बैठो। और जिसके साथ बैठकर परमात्मा का नाम लेने के लिए मुँह छुपाना पड़ता हो, उसे तुरन्त त्याग दो, वो ज़हर है।
प्र२: नहीं, लेकिन अलग-अलग तरह के लोग हैं न। एक तो चलो बिलकुल ही भौतिकवादी हो गये, जो कि अपना बस कमा रहे हैं, खा रहे हैं, अपनी चीज़ों का स्तर बढ़ाते जा रहे हैं। दूसरे हैं जो धार्मिक हैं, पूजा भी कर रहे हैं, परमात्मा का नाम भी ले रहे हैं, लेकिन अंदर उनके वही सब है कि ऐसे नहीं तो ऐसे बचा लें, वैसे नहीं तो वैसे बचा लें। मतलब असली तो फिर वो साधु वाली बात आ जाती है कि जो आचार्य जी हैं, या इस तरह के, तो ऐसे लोग तो फिर बहुत ही कम हैं। तब असली अगर...।










