ज़िन्दगी टिकटॉक है, बच्चे! || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें ज़्यादा ध्यान देते हैं। तो मैं उनको कबीर साहब के भजन वग़ैरह कभी सुनाने की कोशिश भी करता हूँ तो उससे बोर लगता है उनको। तो उस पर थोड़ा मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: देर कर दी है न! आपको नौ या दस वर्ष किसी चीज़ का अभ्यास करा दिया जाए, सोचिए कितने ज़्यादा होते हैं नौ-दस वर्ष! तो उसके बाद फिर एक ढर्रा बँध जाता है भीतर; बदलेगा नहीं आसानी से।
ये सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। इसमें सूचना पहुँचनी तय है चारों ओर से किसी के भी कान तक, आँख तक, मन तक। तो बहुत सावधान रहना होता है कि बच्चों तक क्या चीज़ पहुँच रही है।
हम सोच लेते हैं कि अभी दो साल का है, चार साल का है तो क्या फ़र्क पड़ता है! बच्चा ही तो है। हम उसको ले जाकर के शादियों में डीजे पर नचा देते हैं। या कि बच्चा घर में लेटा हुआ है, सोया है या खेल रहा है, हम पीछे से पंजाबी रैप बजा देते हैं, या कोई भी। पंजाबी भाषा में अकेले थोड़ी कोई ख़राबी हो गयी, अवधी रैप भी हो सकता है। आजकल बना भी रहे हैं लोग।
तब हमको लगता है कोई फ़र्क नहीं पड़ गया है। बल्कि क्यूट लगता है बच्चा उस पर अगर नाचना शुरू कर दे तो। बच्चे ने कहीं सुना होगा न पहले! तब तो उसकी रूचि जाग्रत हुई। या अचानक बैठे-बैठे एक दिन बोलता है कि इस तरह की चीज़ होती है। मुझे यही सुनना है, मेटल सुनना है, हिपहॉप सुनना है। ऐसे बोला उसने? ऐसे बोला? तो पहले उसने पूरी ख़ुराक ली है न?



