कैसा है तुम्हारा मन - फूल, या धूल? || आचार्य प्रशांत, दादू दयाल पर (2017)
प्रसंग:
दोहा:
मन माणिक मूरख राखि रे, जन-जन हाथ न देहु। दादू पारिख जौहरी, राम साध होई लेहु ।।
~ संत दादू दयाल
मन माणिक मूरख राखि रे, जन-जन हाथ न देहु। दादू पारिख जौहरी, राम साध होई लेहु ।।
~ संत दादू दयाल

स्वाति बूंद केतली में आए, पारस पाये कपूर कहाए । दर्पण फूटा कोटि पचासा, दर्शन एक सब में बासा ।। ~ संत दादू दयाल
~दादू दयाल
वक्ता: मन के बारे में दो मूलभूत बातें कही गई हैं। दोनों दिखने में अलग-अलग हैं, कदाचित ये भी लगे की विपरीत है। लेकिन दोनों एक साथ चलती हैं। इसी विचित्रता, इसी संगम…
प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने कहा था कि ग़लती ‘मैं’ भाव से आती है। तो इसके साथ ही अक्सर हम अपनेआप को ये तर्क देते हैं कि मुझसे ये ग़लती हो गयी, ये मैं नहीं थी। तो ये ‘मैं’ भाव क्या है? और ग़लती किसको कहा जा रहा है तब?…