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बाबा कोबरा, और कालसर्प दोष || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर, मैं करीब पन्द्रह साल की थी, जब मेरे मम्मी-पापा ने एस्ट्रोलॉजर (ज्योतिषी) से मेरी कुंडली बनवायी थी। जिसमें मुझे पता चला था कि मुझे कालसर्प दोष है। तो उसको लेकर फिर काफ़ी रुद्राभिषेक भी हुए, मासिक शिवरात्रि को भी मन्दिर गये थे, मेरे मम्मी-पापा। उस वक्त तो मैं स्कूल में थी तो मैंने ज़्यादा इस पर ध्यान नहीं दिया। जितना हो पाया वो सब करवाया।

तो मैंने दो-तीन जगह पूछा, जहाँ से भी ये बात उठी। लेकिन मुझे कुछ वैसा उत्तर मिला नहीं एक्ज़ैक्टली (बिलकुल सही) कि ये होता क्या है? और इसका प्रभाव क्या पड़ता है? अभी मैं जॉब ही कर रही हूँ तो कहीं-कहीं पर अगर कुछ ऐसा किसी तरह का समस्या आती है तो मुझे लगता है कि इसी वजह से हो रहा है कि मेरी ग़लती भी है। तो मुझे एक्ज़ैक्टली इसका कान्सेप्ट (अवधारणा) समझना है कि ये है क्या? और ये क्या कुछ कर रहा है या हम जो अपने से कर रहे हैं, हमारी ग़लती का नतीजा है कि हमें किसी चीज़ में सफलता नहीं मिल पा रही?

आचार्य प्रशांत: कुछ हो तो समझाऊँ कि कुछ होता है। पूछ रही हैं, ‘क्या होता है?’ जो चीज़ है ही नहीं, उसके बारे में क्या बताऊँ कि क्या होता है? आप पूछें ये (मग को हाथ में लेकर दिखाते हुए) है। इसके बारे में बताइए क्या है? कौनसी धातु का है? कितने वज़न का है? कितना बड़ा है? तो कुछ बताऊँ भी। आप कहें, ‘ये (मेज़ पर खाली जगह पर इशारा करते हुए) जो यहाँ पर रखा हुआ है न प्याला, इसके बारे में कुछ बताइएगा?’ काल प्याला दोष! (श्रोतागण हॅंसते हैं) मैं खोज रहा हूँ, है कहाँ पर? कुछ हो, तो न बताऊँगा।

प्र: ये बहुत लोगों से सुना है, मतलब एक टर्म जैसा हो गया है।

आचार्य: टर्म तो कुछ भी बना लो, उससे क्या हो जाता है? कुछ होना भी तो चाहिए न? क्या है?

प्र: मतलब, जैसा मैंने पूछा था अपनी मम्मी से, तो उन्होंने बताया था कि किसी पिछले जन्म में तुमने साँप को मारा होगा, तो इसीलिए‌ तुम पर ये दोष है। तो ये सारी चीज़ें।

आचार्य: तो ये तो सारे नेवलों को लगना चाहिए, आपको क्यों लग रहा है? (श्रोतागण हॅंसते हैं) और सारे किसानों को लगना चाहिए, चूहे उनकी फसल खाते हैं, वो चूहों को मार देते हैं, जब चूहे नहीं रहते तो साँप मर जाते हैं, तो इस देश की सत्तर प्रतिशत जो खेतिहर आबादी है, सबको लगना चाहिए। क्या बोलूँ मैं?

वो उतनी दूर हैं ग्रह-उपग्रह, आप साधारण गणित लगाकर के, भौतिकी के नियमों से गणना नहीं कर सकते हो कि उनका आप पर क्या असर पड़ता होगा? नहीं कर सकते हो क्या? और जो असर पड़ेगा भी वो किस पर पड़ेगा? शरीर पर पड़ेगा। किसी ऐसी चीज़ पर पड़ेगा, जिसका वज़न हो। मन का वज़न है? तो मन पर कहाँ से असर पड़ जाएगा?

और जो असर पड़ेगा वो सब पर पड़ेगा या किसी एक पर पड़ेगा? असर पड़ेगा तो सब पर पड़ेगा न? आप ऊपर आकाश में उड़ रहे होते हैं हवाई जहाज़ में, वो हिचकोले खाता है तो ऐसा होता है कि जिनकी कुंडली में कुछ ख़ास लिखा होता है, वही ऊपर-नीचे होते हैं? सब होते हैं।

अगर कोई आकाशीय घटना घटेगी तो उसका प्रभाव तो सब पर पड़ेगा न और एक बराबर पड़ेगा, तो आप काहे को परेशान हो रहे हो?

ये है (मग को हाथ में लेकर दिखाते हुए) इस वक्त इसका गुरुत्वाकर्षण है जितना मेरे शरीर पर, वो कहीं ज़्यादा है तुलनात्मक रूप से बृहस्पति ग्रह के गुरुत्वाकर्षण से भी। वो इतना दूर है, इतना दूर है कि उसका मुझ पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। और उसका मुझ पर जो प्रभाव पड़ता है वो दूरी के साथ नहीं कम होता, वो दूरी के स्क्वेयर के साथ कम होता है।

और ये (मग को हाथ में लेकर दिखाते हुए) मेरे बहुत निकट है, इसका मुझ पर ज़्यादा असर पड़ रहा है। अगर शान्ति करनी भी है तो फिर मुझे ग्रह-शान्ति नहीं, मग-शान्ति करनी चाहिए। ये (मग) कर रहा है असर, वो क्या करेगा असर? वो क्या करेगा? बस वही है कि हम न जीवन को जानते हैं, न शरीर को जानते हैं, न मन को जानते हैं और जब कोई नहीं जान रहा होता न कुछ भी, तो उसको बुद्धू बनाना बहुत आसान हो जाता है क्योंकि वो कुछ नहीं जानता तो किसी भी बात पर यक़ीन कर सकता है। उसे कुछ पता ही नहीं बेचारे को तो उसे कुछ भी बोल दो, वो यक़ीन कर लेगा।

रॉकेट लॉन्च होने वाला होता है तो बड़े-बड़े वैज्ञानिक हैं भारत में ही, वो इत्तू सा, छोटू सा रॉकेट बनवाते हैं, उसको लेकर जाते हैं और उसकी शान्ति करवाते हैं। कहते हैं, अब इसकी रॉकेट की, छोटू की शान्ति करा दी, अब बड़े वाले में भी आग नहीं लगेगी। ये चल रहा है बक़ायदा, ये क्यों हो रहा है?

क्योंकि हम नहीं जानते हैं, भौतिक क्या है? मानसिक क्या है? आध्यात्मिक क्या है? ये भेद हमें पढ़ाया ही नहीं गया, तो विश्वविद्यालयों से ऊँची-ऊँची डिग्री पाये हुए लोग भी घोर अन्धविश्वासी रह जाते हैं। वो खूब पढ़ा होगा, लेकिन फिर भी गहराई से सुपरस्टीशियस (अन्धविश्वासी) होगा और इसीलिए सुपरस्टीशन (अन्धविश्वास) का धन्धा चल रहा है क्योंकि जब बहुत पढ़ा-लिखा आदमी भी अन्धविश्वासी होता है, तो वो अन्धविश्वास वाली जगहों पर घोर सहायता, दान-दक्षिणा और चंदा करता है।

आपकी संस्था है, आप लोग संस्था में योगदान करते हो, आप जो योगदान करते हो वो सोच-समझकर विचार से करते हो, ठीक? आप कहते हो, ‘ये काम है, ये मेरी सामर्थ्य है और जो काम चल रहा है, मेरा उसका ये मूल्यांकन है तो मैं इतना उस काम की सहायता कर सकता हूँ।’ ठीक है न? तो उसमें एक तर्क होता है, उसमें एक बुद्धि होती है।

लेकिन आपको डरा दिया जाए, आपको बोला जाए, आपके बच्चे का संस्था ने अपहरण कर लिया है। अब बताओ, आप कितना रुपया देने को तैयार हो जाओगे? जो व्यक्ति साधारण बुद्धि के चलते सोच-समझकर के हज़ार-पाँच-हज़ार रुपये आकर के योगदान करता था वो व्यक्ति सीधे पाँच लाख-दस लाख, कहो तो एक करोड़, उतना भी देने को तैयार हो जाएगा।

इसलिए ये अन्धविश्वास और कुतर्क की दुकानें सबसे ज़्यादा चलती हैं। सबसे ज़्यादा पैसा इन्हीं के पास रहता है। आप सोचते नहीं हो कि अन्धविश्वास फैलाने वाले‌‌ ये जितने मिस्टिकल गुरु घूम रहे हैं ये हेलिकॉप्टर पर कैसे चलते हैं? और लगातार विदेशों की यात्राएँ कैसे कर रहे होते हैं? ये ऐसे ही कर रहे होते हैं।

उन्होंने लोगों को इतना डरा दिया होता है, सर्प दिखा-दिखाकर कि लोग डर के मारे अपनी पूरी पूँजी इनको दे जाते हैं। उनको सपने में सर्प आते हैं और ये बिलकुल आपको मैं तथ्य बता रहा हूँ। यही बोलकर डराया जाता है कि बेटा कुछ गड़बड़ करी न तुमने, अचानक तुम्हें पता नहीं चले कहीं से सर्प आएगा, तुम्हें डसकर चला जाएगा।

सारे सर्प तो गुरु जी के कंट्रोल (नियन्त्रण) में है। वो सर्प जो लगातार दिखाया जाता है आपको, वो यूँही नहीं दिखाया जाता, उस सर्प के पीछे तगड़ा आर्थिक तर्क है, इकॉनोमिक लॉजिक है उस सर्प के पीछे। क्योंकि आदमी सर्प से लगातार डरता रहा है और उनका पूरा धन्धा ही इसी पर आश्रित है कि आपको डराकर रखा जाए।

जब आप डरोगे तभी तो आपकी जेब से मोटा रोकड़ा निकलेगा। डराने के लिए साँप बहुत उपयोगी है। तो लगातार आपसे साँप-साँप-साँप यही बातें की जाती हैं। चित्रों में साँप दिखाया जाएगा, छवियों में साँप दिखाया जाएगा, कोई इमारत खड़ी की जाएगी उसमें एक बड़ा भारी साँप खड़ा करेंगे। आप कहीं प्रवेश कर रहे होंगे, वहाँ द्वार पर ही पाँच-छ: साँप चिपका देंगे।

वो सब क्यों किया जाता है सोचो तो सही? और कालसर्प-योग ही क्यों है? कालशशक-योग क्यों नहीं है? शशक माने खरगोश, आप डरोगे ही नहीं, कहोगे, अच्छा, क्यूट। तो कालसर्प योग बोलना बहुत ज़रुरी है, सर्प बोलते ही हवा खिसक जाती है और तुरन्त बोलोगे, ‘बताओ पंडित जी कितना देना है?’ पंडित जी बोले, पचास हज़ार! वो बोले, लो पचास हज़ार अभी लो! सर्प न हो तो धन्धा कैसे चलेगा? बस इतनी सी बात है, कुल ये इसके पीछे का मनोविज्ञान है और कुछ नहीं।

अभी वो कांतारा पिक्चर आयी थी। उस पर मैंने बोला, पूरा-का-पूरा वो प्रदेश मेरे पीछे पड़ गया है। वो सब सर्प भेज रहे हैं लगातार, वहाँ पर जो कमेंट हैं, जाकर पढ़ना, वो यही लिख रहे हैं। एक बड़ा मज़ेदार होता है, इन द नाइट ब्लैक कॉम्पलेक्शन विल कम, से हेलो टू यू, एंड स्वैलो यू (अन्धेरी रात्रि में काला साया आएगा, तुम्हें हैलो बोलेगा और तुम्हें निगल जाएगा)। (श्रोतागण हँसते हैं)

अरे! ये जाकर पढ़ो, ये वहाँ लिखा हुआ है। वो उन्होंने मुझे प्रेम समेत भेंट किया है। इन द नाइट ब्लैक कॉम्प्लेक्शन कम, से हेलो एंड स्वैलो और सबका यही है, यू विल डाई वोमिटिंग ब्लड, यू आर इन्सल्टिंग अवर कल्चर एण्ड अवर रिचुअल (तुम खून की उल्टियाँ करते हुए मरोगे, तुम हमारी संस्कृति और हमारे रीति-रिवाज़ों की बेइज़्ज़ती कर रहे हो)। क्योंकि वो ख़ुद भी डरे हुए लोग हैं न और वो जिस चीज़ से डरे हुए हैं, उसी चीज़ से मुझे डराना चाहते हैं। उनको लग रहा है, वो डर गये थे, इन सब बातों से तो मैं भी डर ही जाऊँगा।

फिल्म में भी यही तो था कि उस व्यक्ति ने जाकर कुछ बोल दिया, तो वो अदालत की सीढ़ियों पर खून उलटता हुआ मरा। और ठीक इसी दृश्य से पूरा भारत थर्राता है कि मैंने अगर कुछ उल्टा-पुल्टा कर दिया तो पता नहीं कौनसी गुप्त, अदृश्य शक्तियाँ हैं, वो आकर के न जाने मेरे साथ क्या कर जाएँ? ठीक वही तो दृश्य है, जिससे पूरा भारत थर्राता है।

और ये सब पुरानी कहानियाँ नहीं सुनी कि फ़लाना था, दिव्यात्मा था, योगी था वो भागकर गया जंगल में और अदृश्य हो गया। और वही सब वहाँ दिखा रहे हैं, फिल्म में। वो भागकर जाता है, जंगल में गायब हो गया, बन्दा ही गायब हो गया। फिर अन्त में उसका बेटा बचता है बस। वो कौन है? कहाँ गया भाई? कुछ पुलिस गयी, खोजने-नहीं खोजने, मिला कि नहीं मिला; नहीं वो तो एक दिव्य बात है इस पर कोई चर्चा नहीं हो सकती कि गायब होने का क्या अर्थ है। एक आदमी गायब हुआ है, क्या बोलना चाहते हो? कैसे? कहाँ? क्यों? सत्तर-अस्सी किलो का एक आदमी गायब हुआ है, कुछ तो मिलेगा? नहीं.. और हिन्दुस्तान बहुत प्रसन्न है, पिक्चर देखकर।

मुझे पिक्चर से कोई समस्या नहीं है। कुछ बातों में और एक तल पर फिल्म जो दिखाना चाह रही है, वो चीज प्रशंसनीय भी है। मैं उसको देखकर के निकला था जिन लोगों के साथ था, निकलते ही मैंने सबसे पहले उसकी तारीफ़ करी थी। क्योंकि मैं उस फिल्म को तब अपनी दृष्टि से देख रहा था, जहाँ से मैं देख रहा हूँ उस फिल्म की सहराना की जा सकती है लेकिन फिर मैंने उस फिल्म को वहाँ से देखा जहाँ से उसे आम आदमी देखेगा और आम आदमी के लिए वो पिक्चर बहुत घातक है।

आम आदमी के ज़ेहन में वो दृश्य छप जाएगा कि एक आदमी अदालत की सीढ़ियों पर खून की उल्टियाँ करते हुए मरा, क्योंकि उसने दैव पर सवाल खड़ा कर दिया था। आम आदमी को उस पूरी पिक्चर से एक वही दृश्य याद रहना है और इसीलिए तुम पाओगे कि ये जितने गुरु-घंटाल हैं सबने अपने-अपने आश्रमों में इस पिक्चर की स्क्रीनिंग करी है। क्योंकि वो यही तो बताना चाहते हैं कि हमारे पास वो शक्तियाँ और सिद्धियाँ हैं जिनको तुम जानते नहीं बच्चा; पर खूफिया, गुप्त सिद्धि हमारे पास है। हम तुम्हारा कल्याण भी कर सकते हैं, हम तुमको बर्बाद भी कर सकते हैं, निकाल पैसा।

संस्था जब आपसे कहती है कि भाई कुछ योगदान कर दो! तो बोलती है, ये देखो ये गीता का कोर्स है, अच्छा है न? देख चुके हो न? पढ़ चुके हो न? अब जब इतना खा-पी चुके हो तो थोड़ी सहायता भी कर दो हमारी। रोज़ यूट्यूब पर चार-चार वीडियो देखते हो न? पहले ही देख चुके हो न? एडवांस डिलीवरी कर दी न हमने सर्विस की? अब कर दो। हमें ये बोलना पड़ता है उसके बाद आप कहते हो, ‘ठीक है, इतना कह रहे हो तो पाँच-सौ रूपये ये लो।’

अभी साँप भेज दें, तुरन्त जेब झाड़ दोगे। इतना परेशान कर रहे हो, किसी दिन भेजना ही पड़ेगा अब। (सभी श्रोतागण हँसते हैं), कोई तरीक़ा ही और छोड़ नहीं रहे।

आ रही है बात समझ में?

और इस चक्कर में साँप बेचारे की और दुर्दशा कर रखी है। वो ग़रीब जानवर लेना एक न देना दो, वो ख़ुद हैरान है कि ये पिछले हज़ारों साल से पूरी दुनिया पीछे काहे पड़ी है हमारे। कबीर साहब का बड़ा सुन्दर है! वो कहते हैं कि घर में साँप निकलता है तो उसे लट्ठ मार-मारकर मार देते हो और फिर आटे का साँप बनाकर उसको पूजते हो, वाह! बेटा तुम्हारा पाखंड, वाह! तुम्हारा पाखंड।

दूध पिला रहे हो उसको, बोला तो है मैंने पहले, दूध उसको पच ही नहीं सकता क्योंकि वो मैमल (स्तनधारी) नहीं है, वो रेप्टाइल (सरीसृप) है। दूध का उसके पास कोई पाचन तन्त्र ही नहीं है, उसको दूध पिला दिया, वो मर जाता है दूध पीकर। कहते हैं, ‘हमने पिलाया तो नहीं मरा।’ अरे! तुरन्त मर जाए ज़रूरी है? तुमको तुरन्त कुछ भी पिला दें तो अभी मर जाओगे, तीन दिन बाद मरोगे। चलो नहीं मरा, तकलीफ़ तो हुई न उसको।

बीन बजाएँगे, इच्छाधारी नागिन, नगीना पिक्चर आयी थी, इतनी तो फिल्में बना दी है साँपों पर। और उसके कान ही नहीं हैं, वो बेचारा सुन सकता नहीं, तुम बीन बजा रहे हो और सोच रहे हो नाच रहा है, वो नाच नहीं रहा है वो बीन देख रहा है बीन को देखकर वो डर रहा है, तो बीन का पीछा कर रहा है, ऐसे (हाथ से साँप की आकृति बनाते हुए) तनकर के कि ये बीन जैसे ही कुछ ख़ुराफात करे, मैं इसे डसूँगा।

तुम सोच रहे हो वो नाच रहा है सपेरे से बोलो बीन को एक जगह रखकर बजाए फिर देखो साँप नाचता है कि नहीं। वो बीन के साथ बीन की आवाज़ पर नहीं नाचता, वो बीन की गति का पीछा करता है, बीन हिल रही है इसीलिए साँप हिल रहा है, आवाज़ तो उसको सुनायी ही नहीं दे रही है। पर हम बिलकुल अशिक्षित लोगों वाला कार्यक्रम चलाते हैं। पढ़े-लिखे होकर भी, यही सब साँप उड़ा रहे हैं। वो क्या बोला था एक बार, इंटर कांटिनेंटल बैलिस्टिक रेप्टाइल (अंतरमहाद्वीपीय प्राक्षेपिक सरीसृप), उड़ते हुए साँप।

अज्ञात का डर। हर आदमी यही कह रहा है, ‘‘लेकिन अगर कुछ होता ही हो तो? मैं ही क्यों रिस्क लूँ? अरे! जब हर कोई सेफ़ (सुरक्षित) खेल रहा है तो मैं भी भीड़ के साथ-साथ जो थोड़ा-बहुत करना होता है मैं भी कर देता हूँ। मैं कुछ उल्टा-पुल्टा कर दूँ और मैं ही मरूँ खून की उल्टी करते हुए तो?’

सबका यही तर्क है बस। क्यों? क्योंकि आपको सच्चाई पता नहीं है और वो सच्चाई सिर्फ़ विज्ञान से नहीं आपको पता चलेगी। क्योंकि हमने तो कहा वैज्ञानिक भी घोर अन्धविश्वासी हैं, वो सच्चाई आपको अध्यात्म से पता चलेगी, अन्धविश्वास की काट अध्यात्म है। विज्ञान तो असफल हो गया, बड़े बड़े वैज्ञानिक अन्धविश्वासी हैं, विज्ञान नहीं है अन्धविश्वास की काट, अन्धविश्वास की काट अध्यात्म है। आध्यात्मिक हम हैं नहीं, जब आप आध्यात्मिक नहीं होगे, तो विज्ञान पढ़कर भी आप अन्धविश्वासी रह जाओगे।

ॲंगूठियाँ, ये वो, अभी आप ही लोगों में गिनने लगें तो निकल आएँगी ॲंगूठियाँ, पता नहीं कितनी। फ़लानी ॲंगूठी से फ़लाने ग्रह का आप कर रहे हो, ये कर रहे हो, वो कर रहे हो। फेल हुए थे न बारहवी में? कुछ नहीं पता न? न प्लैनेटरी मोशन (ग्रहों की गति) जानते, न डिस्टेंसेज़ (दूरियाँ) जानते, न फोर्स (बल) जानते हैं कितना लगता है, कितना नहीं?

ॲंगूठियाँ धारण कर रहे हैं, मालाएँ पहन रहे हैं ये महॅंगी-महॅंगी मालाएँ और बाबाओं की वेबसाइट पर मालाएँ बिक रही हैं, अँगूठियाँ बिक रही हैं, साँप बिक रहे हैं, तुम पहन भी रहे हो। अब ये एक बहुत सही मार्केट ऑपर्चुनिटी (बाज़ार में अवसर) है। वो एक नाम है जो किसी ने अभी तक कराया नहीं है कॉपीराइट ‘बाबा कोबरा’ ये करा लो, क्योंकि ये बड़ा मस्त नाम है! इस नाम की सक्सेस (सफलता) एकदम पक्की है। और जितने साँपधारी हैं उन सबकी नज़र इस नाम पर पड़ने ही वाली होगी। इससे पहले कि ये नाम उठ जाए, तुम उठा लो इसको, ‘बाबा कोबरा’। कुछ नहीं करना सिर पर, मुंडी पर एक साँप बैठाना है ऐसे (सिर पर हाथ से साँप बनाकर दिखाते हुए)।

ऐसे-ऐसे सवाल कर देते हो, मुझसे कुछ भी बुलवा लेते हो और फिर हिन्दुस्तान का पूरा राइट विंग (दक्षिण-पंथी) एकदम चिढ़ा बैठा है मुझसे। वो ताक में रहते हैं कि कुछ कहीं से मिले और फिर मचाएँ शोर जोर का और उसके ज़िम्मेदार कौन हो? आप लोग।

प्र: सर, अभी कुछ दिनों पहले सेटेलाइट लॉन्च से पहले भारत का प्रमुख तक़नीकी संस्थान है, वहाँ पर पूजा-अर्चना चल रही थी, तो ये देखकर थोड़ा आश्चर्यचकित हुआ था मैं कि ये क्या हो रहा है? जहाँ पर हमारे युवा जो हैं, जहाँ से तक़नीक की शिक्षा लेते हैं, विज्ञान सीखते हैं वहीं पर एक तरीक़े से अन्धविश्वास को बढ़ाया जा रहा है, कहीं-न-कहीं उसके केन्द्र में भी जो है अन्धविश्वास पहुँच ही चुका है।

साथ-साथ में, मैं देखता हूँ ये ज्योतिष विद्या के काफी जो पारंगत हैं, उनसे दो-चार बार चर्चाएँ करी हैं मैंने, तो वो बताते हैं मुझे कि नहीं ये पूरा विज्ञान है। और इसकी; जैसे अब देखिए कि चन्द्रमा जो है, चन्द्रमा का जो चक्र होता है उसके कारण समुद्र पर जो असर होता है वो साफ़-साफ़ दिखता है, आपके मन के ऊपर जो असर होता है वो आप साफ़-साफ़ देख नहीं पाते हैं, अब आप भी तो सत्तर प्रतिशत पानी से ही बने हैं तो अगर चन्द्रमा का असर समुद्र के ऊपर हो रहा है तो आपके मन के ऊपर कैसे नहीं होगा? पानी के बने हैं आप।

आचार्य: नहीं, पानी पर नहीं असर होता है, उसका पदार्थ पर असर होता है। और अगर असर होगा तो मेरे पूरे शरीर पर होगा न? पूरा शरीर ही मेरा क्या है? मटीरियल (पदार्थ), चन्द्रमा का ग्रैविटेशन (गुरुत्वाकर्षण) सिर्फ़ पानी पर ही नहीं असर करता है, हर चीज़ पर असर करता है वो तो, पानी पर आपको उसका प्रभाव दिख जाता है। तो ये तर्क बिलकुल व्यर्थ का है कि आप में भी सत्तर प्रतिशत पानी है तो आप पर भी असर होगा।

बन्द पानी पर थोड़े ही असर होगा। पानी की बोतल रखी होती है तो क्या उसमें जल स्तर बढ़ने लग जाता है चन्द्रमा के प्रभाव से? तो आपके भीतर कोई पानी खुला थोड़े ही पड़ा हुआ है, सागर की तरह। ये क्या बेहूदा तर्क है? अगर चन्द्रमा के प्रभाव से सब पानियों पर असर पड़ रहा होता तो जो पानी की बोतल है, उसमें भी पानी का स्तर ऊपर ऐसे उठ रहा होता, उठता है क्या? तो पानी की बोतल में नहीं उठता, तो आपके शरीर में काहे को उठेगा?

यहाँ (शरीर की तरफ़ इशारा करते हुए) पर तो जो पानी है वो बिलकुल कॉम्पैक्ट (सुगठित) हालत में है और प्रेशराइज़्ड (दबाव) हालत में हैं, आपको ब्लड प्रेशर पता है न अपना? उस ब्लड प्रेशर के सामने चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण की क्या हैसियत है? कहाँ आपका ब्लड प्रेशर और कहाँ चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण, इनमें कोई तुलना है? और अगर असर हो भी रहा है तो आपके पूरे शरीर पर हो रहा है, पूरे शरीर पर एक-एक चीज़ पर, हड्डी पर भी हो रहा है, माँस पर हो रहा है, मज्जा पर हो रहा है, रक्त पर हो रहा है और आप पर ही नहीं हो रहा, सब पर हो रहा है तो उसमें परेशानी की क्या बात है? क्यों इतना उसमें तुम बौरा रहे हो?

ये जो प्लैनेटरी ऑब्जेक्ट्स (ग्रहीय वस्तुएँ) हैं, ये आपके ऊपर जितना असर डालते हैं न, उससे कहीं ज़्यादा असर मैं बता देता हूँ कौनसी चीज़ें डाल रही हैं, आप अभी इलेक्ट्रिकल सर्किट से घिरे हुए बैठे हैं उनका मैग्नेटिक फील्ड (चुम्बकीय क्षेत्र) होता है। बारहवीं की फिजिक्स बता रहा हूँ, फ्लोइंग करेंट क्रिएट्स इट्स ओन मैग्नेटिक फील्ड (बहती विद्युत धारा अपना चुम्बकीय क्षेत्र बनाता है) और कितना होता है? किस दिशा में होता है वो बायोट-सवर्ट लॉ सब पढ़ चुके हैं, तो ये सब जो हैं (कमरे में लगे हुए विद्युत संयोजन की ओर इशारा करते हुए)। आप मैग्नेटिज़्म (चुम्बकत्व) के भीतर बैठे हुए हो।

ये दोनों जो हैं (सामने रखी दो लाइट की ओर इशारा करते हुए) ये स्ट्राॅंग लूमिनस ऑब्जेक्ट्स (शक्तिशाली प्रकाशमान वस्तुएँ) हैं, ये मुझ पर बड़ा असर डाल रहे होंगे। असर हो रहा है तो इनका ज़्यादा हो रहा है, चन्द्रमा का असर होता होगा पर चन्द्रमा से ज़्यादा असर तो इन चाँदों का हो रहा है, ये जो दो घेरकर मुझे बैठे हैं।

ये छोटे-मोटे असर की मैं परवाह थोड़े ही करूँगा, मैं तो अपना काम करूँगा, बहुत वीक इन्फ्लुएंस (दुर्बल प्रभाव) होता है इनका (ग्रहों का) पृथ्वी के किसी भी ऑब्जेक्ट पर, उसकी नहीं परवाह करी जाती। आप गाड़ी में बैठे हो, इंजन वाइब्रेट (कम्पन)कर रहा है उससे आपका पूरा शरीर वाइब्रेट कर रहा होता है, वो ज़्यादा बड़ा असर है और बहुत बड़ा असर बता दूँ, ये जो ए.क्यू.आई. (वायु गुणवत्ता सूचकांक) इतना ख़राब है, इतने डस्ट पार्टिकल्स (धूल-कण) हैं, ये ज़्यादा बड़ा असर है आपके शरीर पर।

आप इसकी बात करोगे या चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण की? बोलो? क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) से आपने कितनी ही चीज़ें बदल दी हैं, जानते हो ये जो पृथ्वी का तापमान बदल रहा है समुद्रों का जल स्तर इससे भी बढ़ रहा है और इससे कहीं ज़्यादा बढ़ रहा है घातक रूप से बढ़ रहा है, तो हम ये क्यों नहीं कहते कि एक नया ज्योतिष विज्ञान चाहिए जो क्लाइमेट चेंज की बात करे। चाँद ने लहरें उत्तेजित कर दीं, हमारे लिए बहुत बड़ी बात है। और क्लाइमेट चेंज ने विश्व के समस्त समुद्रों का स्तर; स्थायी, परमानेंट रूप से बढ़ा दिया उसकी नहीं बात करोगे?

एक दिन लहर उठती है रोज़ तो चाँद लहर उठा भी नहीं पाता, एक दिन। वो इतनी बड़ी बात हो गयी और समुद्र हमेशा के लिए ऊपर उठ गये हैं, द्वीपों को खा गये, शहरों को निकल गये उसकी नहीं बात करोगे। मैन-मेड (मानव-निर्मित) कारणों से जानते हो पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड (चुम्बकीय क्षेत्र) तक प्रभावित हो रहा है, हम उसकी भी नहीं बात कर रहे। अपनी धुरी पर पृथ्वी के घूमने की जो गति है, वो तक हमने बदल डाली है, हम उसकी भी नहीं बात कर रहे।

आप पर कोई असर पड़ना है तो इन चीज़ों को ज़्यादा पड़ेगा न? उसकी नहीं बात करनी। ये क्या तर्क है? देखो, समुद्र में लहरें उठ रही हैं न? फुल मून (पूर्णिमा) उठीं, तुम्हारे भीतर भी पानी है तो तुममें भी लहर उठी और हमने कहा क्या तर्क दिया है? वाह! मस्त तर्क दिया है।

क्या मतलब है इसका? लॉजिक क्या है? इस हिसाब से तो ये मेरी जो चाय है ये भी उछल जाए।

ये सब कुछ नहीं है, ये हमारे भीतर का पुराना पाशविक अन्धेरा है, जैसे जब इंसान को कुछ नहीं पता था न तो वो किसी की भी पूजा करना शुरू कर देता था। तुम बहुत पीछे चले जाओ, हज़ारों साल पहले; तो दुनिया में यही हुआ है सबकी पूजा करनी शुरू कर दी क्योंकि जो अज्ञात होता है वो डरावना लगता है, जिसका पता नहीं, तुम उसके सामने तुरन्त झुक जाओगे कि न जाने क्या कर दे। कभी ऐसा हुआ कि रात में उठे हो थोड़ी सी, मान लो कहीं पानी पीने के लिए और घर में किचन की तरफ़ बढ़े हो और वहाँ से खट-पट की आवाज़ आ रही है, अन्धेरे में बिलकुल, हुआ है? हुँ-म-म (भूतिया फिल्मों में निकलने वाली डरावनी आवाज निकालते हुए)

रामसे बंधुओं का पूरा कार्यक्रम शुरू हो जाता है न यहाँ पर? क्योंकि पता नहीं है तो कुछ भी हो सकता है और फिर बहुत डर लगता है, खट-खुट। कौनसी प्रेतात्मा है? कौन से जन्म का साँप है? कुछ भी हो सकता है? और फिर प्रकाश, बत्ती जली! स्विच दबा, बत्ती जली और निकला क्या? चुहिया।

जब पता नहीं होता तो आप एक चुहिया से भी डर जाते हो, जब नहीं पता है कि जो घटना घट रही है वो किसकी वजह से घट रही है तो डर उठेगा, ये बात प्राकृतिक है और ये एक प्राकृतिक डिफेंस मैकेनिज़्म (सुरक्षा-प्रणाली) है क्योंकि चुहिया है, ये बात तो प्रकाश के बाद पता चली न? हो सकता है कि वो अजगर होता, होने को तो हो ही सकता है। एक बटा, एक करोड़ की सम्भावना तो ये भी है न कि वो अजगर होता, तो प्रकृति आपको बचाने के लिए, आपकी सुरक्षा के लिए आपको डर से भर देती है। ये एक प्राकृतिक डिफेंस मैकेनिज़्म (सुरक्षा-प्रणाली) है। डरा दो बन्दे को, ताकि वो भीतर न जाए, क्या पता अजगर हो ही? एक करोड़ में से एक सम्भावना तो ये है न कि अजगर हो ही सकता है तो प्रकृति कहती है तुम डर ही जाओ, मान लो अजगर नहीं निकला तो कोई नुक़सान हुआ, कुछ नहीं, शरीर तो बचा रह गया न?

लेकिन डरकर के तुम बच गये यदि वो अजगर था क्योंकि यदि वो अजगर था और फिर भी तुम घुस जाते तो मारे जाते, तो प्रकृति कहती है प्ले सेफ़ (सुरक्षित खेलो)। अजगर नहीं भी है तो तुम यही मानो कि अजगर है और डर जाओ। प्रकृति ने हम सबके शरीरों में व्यवस्था कर रखी है कि जहाँ डरने की ज़रूरत नहीं भी है वहाँ हम डरें। और ये व्यवस्था हमारे बहुत काम आयी है क्योंकि इस व्यवस्था ने मनुष्य के शरीर को, मनुष्य की प्रजाति को ही आज तक बचाकर के रखा है, ठीक है?

डरे रहो, जब डरे रहोगे तो शरीर बचा रहेगा, लेकिन आज आप वहाँ पहुँच गये हैं जहाँ शरीर आपका दुख नहीं है, आपका दुख है मन। अन्धविश्वास शरीर को बचाने में उपयोगी था आदि काल में जब मनुष्य जंगल में था। तब अन्धविश्वास ने लाभ दिया है, शरीर को बचाया है। इसीलिए अन्धविश्वास क़ायम रहा है। अन्धविश्वास के उपयोग रहे हैं। लेकिन आज आपकी समस्या ये नहीं है कि शरीर को कैसे बचाएँ? उसके लिए विज्ञान है, दवाइयाँ हैं, वो बचा देते हैं शरीर को। शरीर को बचाने के लिए अब अन्धविश्वास की ज़रूरत नहीं है। आज आपकी समस्या है मन की गुलामी और मन की गुलामी में अन्धविश्वास बड़ी समस्या है, तो आज ज़रूरी है कि अन्धविश्वास हटाया जाए।

आ रही है बात समझ में?

जब तक प्रकाश नहीं करोगे, तब तक चुहिया से भी डरोगे। इसीलिए अध्यात्म में बोध को प्रकाश की संज्ञा देते हैं और कहते हैं ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ)। ज्योति होगी तो चुहिया से नहीं डरना पड़ेगा।

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