प्रश्नकर्ता मेरे को पता है कि मैं नशा करता हूँ और वो एक सर्टेन टाइम (निश्चित समय) पर आता है। शाम हो जाती है तब मन उधर को पूरा खिंचा चला आता है। वो जो मज़ा देता है मैं उसको छोड़ भी नहीं पाता और मैं कहीं भी कोई भी ग़लत चीज़ देखता हूँ जैसे अब माँस खाना मैंने बंद कर दिया कब से। अगर नशे में होता हूँ तो उदंडता करता हूँ, नशा जब उतर जाता है सुबह तब भी वैसे ही करता हूँ। मेरे को लगता है कि जो नशा करता हूँ उससे मेरी जो यात्रा है उसमें बाधा आ रही है।
ऐसी छोटी-मोटी नौकरी करता हूँ। और मेरे को उसमें काफ़ी समय मिल जाता है कि मैं आपको सुनता हूँ और मैं चाहता हूँ कि कुछ अलग करूँ जैसे बाक़ी लोग करते हैं वैसा न करूँ।
आचार्य प्रशांत दिक्क़त ये है कि छोटा नशा कर रहे हो, बड़ा वाला चाहिए। ये जो छोटी-मोटी नौकरी कर रहे हो न, इसी के कारण छोटा-मोटा नशा भी करना पड़ रहा है। बड़े के नौकर बन जाओ और बड़ी नौकरी करना शुरू कर दो, उसमें बहुत बड़ा नशा है।
प्र: सर, ऐसा लगता है कि अकेले पड़ जाऊँगा।
आचार्य तो मत पड़ो फिर, फिर क्यों पूछ रहे हो?
प्र: सर, अकेले करने की कोशिश भी कर रहा हूँ। लेकिन पहले तो मुझे सुधरना पड़ेगा न।
आचार्य




