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आओ प्यारे, तुम्हें झूठ सिखाएँ! || आचार्य प्रशांत, आर.डी.वी.वी. के साथ (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा प्रश्न यह है कि हम अपने बच्चों को सत्य से कैसे अवगत कराएँ।

आचार्य प्रशांत: सत्य कुछ होता ही नहीं है, उससे कैसे अवगत कराएँगे? झूठ से अवगत कराया जाता है। सच रोशनी है। सच क्या है? रोशनी है, है न? उस रोशनी में वो सब चीज़ें दिख जाती हैं जो झूठ हैं।

ऐसा सा है जैसे कि बच्चे सारे एक अंधेरे कमरे में हैं, बड़ा सा अंधेरा कमरा है। और उस कमरे में बहुत सारी चीज़ें रखी हुई हैं। कुछ चीज़ें उपयोगी हैं, कुछ चीज़ें अनुपयोगी हैं। सच और झूठ की बात नहीं है, ठीक है न? कुछ चीज़ें उपयोगी हैं, कुछ अनुपयोगी हैं।

उपयोग कैसे निर्धारित होता है? कि बच्चे को बड़ा करने में जो चीज़ काम आये, उसको हम कहते हैं वो चीज़ उपयोगी है। ठीक है!

बहुत सारे बच्चे हैं और बहुत बड़ा कमरा है और उसमें बहुत-बहुत सारी चीज़ें हैं। कुछ चीज़ें उपयोगी हैं, वो बच्चों को बड़ा करने में, परिपक्व करने में काम आएँगी। और कुछ चीज़ें बिलकुल व्यर्थ हैं, ज़हरीली भी हो सकती हैं, धारदार हो सकती हैं, चोट दे सकती हैं, कुछ भी कर सकती हैं। कुछ चीज़ें अनुपयोगी हैं, कुछ उपयोगी हैं और कमरे में है घोर अंधेरा।

कमरे में क्या है?

घोर अंधेरा। उस अंधेरे के कारण ये हो रहा है कि बच्चे कुछ देख ही नहीं पा रहे हैं, कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं। तो जो चीज़ खाने की नहीं है, उसको उठाकर खा रहे हैं। और जो चीज़ खाने की नहीं है, उसको बच्चा खाएगा तो क्या बड़ा होगा?

प्र: नहीं।

आचार्य: जो चीज़ पकड़ने की नहीं है, उसको पकड़ रहे हैं। कभी जाकर दीवार से भिड़ रहे हैं, कभी किसी चीज़ से टकरा कर नीचे गिर रहे हैं। ये सब चल रहा है उस कमरे के अंदर। आप माँ हैं, आप बच्चों का भला चाहती हैं; आप जा करके कमरे में प्रकाश कर देती हैं। ठीक है? आप कमरे में प्रकाश कर देती हैं। प्रकाश करते ही क्या होगा?

प्र: रोशनी।

आचार्य: सब दिखने लगेगा। दिखने लगेगा न! तो बच्चे जान जाएँगे कि कौनसी चीज़ उपयोगी है। उसको वो ग्रहण कर लेंगे। जो अनुपयोगी है, उसको वो त्याग पाएँगे। ठीक है, अब समझिए।

ये जो अंधेरा कमरा है, ये पूरा जगत है। कमरे में जो कुछ रखा हुआ है, इतना बड़ा कमरा है, अपनी सारी चीज़ों के साथ वो कमरा क्या है? जगत।

अंधकार क्या है? अज्ञान है।

बच्चा क्या है? उस जगत में जीव है।

जगत में फैली हुई इतनी वस्तुएँ होती हैं, उसको बोलते हैं प्रकृति। ठीक है न। और जगत में वो जो बच्चा है छोटा सा, उसका क्या नाम है जीव। और अंधेरा, हमने कहा, क्या है? अज्ञान। अज्ञान है।

ज्ञान क्या होता है? प्रकाश। ठीक है न। प्रकाश नहीं देखा जाता, प्रकाश के माध्यम से उपयोगी और अनुपयोगी को देखा जाता है। तो सत्य से अवगत नहीं हुआ जाता, सत्य तो प्रकाश है। वो तो प्रकाश की तरह होता है। उसको क्या जानोगे?

कोई कहता है 'मैने रोशनी देखी?' रोशनी नहीं देखी न। रोशनी में कुछ देखा जाता है। रोशनी में क्या देखा जाता है? क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी है।

तो बच्चों को उपयोगी-अनुपयोगी से अवगत कराएँ। बच्चों को बताएँ कि 'तुम कौन हो?' तुम छोटू हो। 'तुम्हारा लक्ष्य क्या है?' बड़ा होना। 'कैसे बड़ा होना है?' शरीर भर से नहीं, आंतरिक रूप से। चेतना का विकास ही जीवन का लक्ष्य है। ठीक है न?

तो तुम्हारा लक्ष्य है बड़ा होना। तो तुम्हारे लिए उपयोगी क्या है? अगर लक्ष्य है बड़ा होना, तो तुम्हारे लिए उपयोगी क्या है? वो सबकुछ जो तुम्हारी चेतना को पोषण दे। ठीक है?

तो ज्ञान के प्रकाश में हमें जानना है कि क्या है जो मेरे लिए अच्छा है और उसको ग्रहण करना है। और बाक़ी सब चीज़ों को अस्वीकार करना है, वो अनुपयोगी हैं। इसको विवेक भी कहते हैं।

बच्चों को झूठ से अवगत कराइए, बच्चों को चीज़ों की सही शक्ल दिखाइए। अंधेरे में बच्चा न जाने किस चीज़ को क्या समझ रहा है! हमें पता ही नहीं; हम बुरे को अच्छा, अच्छे को बुरा समझ रहे हैं। हम ज़हर को मिठाई समझ रहे हैं। और मिठाई हमें कड़वी लगती है। ये सबका हाल है न?

तो हमें बच्चे की आंतरिक रोशनी जलानी है।

प्र: कैसे जलाएँगे, सर? उन्हें क्या समझाएँगे? कैसे बताएँगे?

आचार्य: हाँ, वो ऐसे करा जाता है कि जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ मान्यता रखकर बैठे हो, आओ उनके पास जाएँ, उनको ठीक से देखें।

उदाहरण के लिए, बच्चे ने मान ही लिया है कि ये जो सड़क पर जानवर हैं, इनको पत्थर मारना खेल का हिस्सा है। पाँच बच्चों की भीड़ जुट जाती है और सड़क पर जो कुत्तें हैं, उनको पत्थर मारती है। आपने ये देख लिया। आप कहते हैं, 'अच्छा ठीक है! तुमने पत्थर मार लिए शाम को, आओ अब शाम को चलते हैं उस डॉगी के पास।' और वो कुत्ता है, वो कहीं कोने में पड़ा हुआ कराह रहा है और उसके घाव लग गया है, घाव से ख़ून भी रिस रहा है।

अब आप बच्चे को उस कुत्ते के करीब लेकर जाते हैं। पत्थर तो दूर से मारा जाता है न। आपने कहा, 'दूर से तुमने पत्थर मार लिया, आओ अब पास से कुछ और करते हैं।' बच्चे को उस कुत्ते के पास ले जाते हैं। और कहते हैं, 'अब इसको देखो।' और वो कुत्ता बिलकुल मायूस पड़ा हुआ है घाव खा करके। आप कहते हैं, 'ये कुत्ता है, तुमने अभी इसको पत्थर मारा था, अब थोड़ा इसका माथा सहलाओ।'

और इसी बच्चे ने पत्थर मारा था, और इसी बच्चे ने उसका ख़ून निकाला था; ये बच्चा उसका माथा सहलाता है, कुत्ता फिर भी पूँछ हिलाना शुरू कर देता है।

आप कहते हैं, 'हम इसको थोड़ा सा पानी पिला दें, देखो इसके ख़ून आ गया है।' तो बच्चा अब मौन हो गया है, बच्चा स्तब्ध हो गया है। बच्चे ने कुछ नया देख लिया है। कुत्ता अभी तक उसके लिए हिंसक खिलवाड़ की वस्तु मात्र था। और जैसे ही वो देखता है कि कुत्ता कोई दूसरी चीज़ भी होता है, बच्चे के मन में अचानक एक सन्नाटा आ गया है, अवाक् हो गया है बच्चा!

बच्चा धीरे से सिर हिलाकर सहमति देता है, ‘हाँ, कुत्ते को पानी पिला देते हैं।’ वो जाता है, भीतर से छोटे कटोरे में पानी ले आता है। कुत्ता पानी पी लेता है। आप कहती हैं, 'इसके ख़ून बह रहा है, इसकी पट्टी कर दें?' बच्चा फिर कुछ नहीं बोलता, बच्चे में अब अपराध भाव भी खड़ा हो रहा है। बच्चा कहता है, 'इसका ख़ून तो मेरे ही ख़ून के रंग का है। बस मैने ही कभी ग़ौर नहीं किया था।'

इस ग़ौर करने को कहते हैं ध्यान। ध्यान वो नहीं होता कि कहीं सुबह आधे घंटे कमरे में बैठ करके, आँख बंद करके आसन में कह दिया, 'हम ध्यान कर रहे हैं।' लोग ऐसे ही ध्यान करते हैं। उसको कहते हैं मेडिटेशन , कि हम ध्यान कर रहे हैं। कैसे? सब बंद कर दी दुनिया को, आँख बंद कर ली और कह रहे हैं ध्यान। ध्यान ये नहीं होता।

जीवन में जो है, जाकर के उसको करीब से, गौर से देखो, ये ध्यान कहलाता है। जीवन में जो कुछ है, ज़रा अपनी मान्यताओं को परे रखकर, निष्पक्ष होकर के उसको देखो, ये ध्यान कहलाता है।

अब उस कुत्ते के ज़ख्म पर आपने थोड़ी सी बिटाडिन (दवाई) लगा दी। ज़रूरत हुई तो थोड़ी सी पट्टी कर दी। अब बच्चे ने कुछ नया देख लिया है, ये कहलाती है रोशनी। कुछ नया दिख गया। दिखा तभी होगा न जब प्रकाश होगा, तो दिखना ही प्रमाण होता है प्रकाश का। बच्चे को कुछ नया दिख गया, और दिखता है निकट जा करके। दूर रहकर कुछ नहीं दिखता, दूर रहकर तो बस भ्रम है।

अपनी मान्यताओं को चुनौती देना ही सत्य की साधना होती है।

हर आदमी मान्यताओं में जीता है। विश्वास है हमारे पास कि हमें ये पता है, हाँ ऐसा होता है, अब ये ऐसा है, ये ऐसा है। नहीं-नहीं-नहीं, क्या कैसा है, ये तभी पता चलेगा जब थोड़ी छानबीन करेंगे। जब थोड़ी निकटता दिखाएँगे, तब पता चलता है चीज़ें दुनिया में क्या हैं, कैसी हैं।

बच्चों को ऐसे ही बड़ा करना है। नहीं तो बच्चे भी बड़ी आसानी से विश्वास का, मान्यताओं का, बल्कि अंधविश्वास का शिकार हो जाते हैं।

प्र: टीवी, मोबाइल से जो देखते हैं, उनको वो लगता है कि वही चीज़ हैं बस सही।

आचार्य: हाँ, बिलकुल, क्यों नहीं। अब उदाहरण के लिए, कार्टून में उसको दिखा दिया कि एक छोटा खरगोश है और खरगोश के ऊपर तीन-चार पत्थर आकर गिरे तो खरगोश का सिर ऐसे टरर्र (सिर को हिलाते हुए) होता है; लेकिन फिर खरगोश ठीक हो जाता है और फुदकने लगता है। ऐसे ही दिखाते हैं न?

प्र: हाँ, जी।

आचार्य: ये होता है न कि दिखा देंगे कि एक सौ किलो का वज़न आ करके किसी भालू के सिर पर गिरा, तो भालू ज़मीन के अंदर गड़ गया। लेकिन फिर अगले ही सेकंड वो भालू ज़मीन से बाहर निकल करके फिर से खेलने लग गया।

ये बच्चे में हिंसा डाली जा रही है। आपको बच्चे को बताना होगा कि देखो बेटा, सौ किलो तो छोड़ दो, सौ ग्राम भी अगर सिर पर आ करके गिरे, तो आदमी बेहोश भी हो सकता है, सौ ग्राम भी अगर आकर गिरे।

आप कह सकते हो, 'बेटा, ये देखो चम्मच है छोटा सा, देखो बहुत छोटा है ना। देखो, ये चम्मच भी अगर अपने सिर पर मारो तो कितनी ज़ोर का लगता है।' बच्चा अपने सिर पर मारकर कहेगा, 'बड़ी ज़ोर का लगा मम्मा!' तो बताओ, अगर ये चम्मच इतनी ज़ोर का लगता है, तो उस भालू के सिर पर सौ किलो आया होगा, वो तो मर ही गया होगा न!

तो ये जो प्रवाह है प्रकृति का — अन्धा, इसको रोकना पड़ेगा और पूछना पड़ेगा कि ये जो कुछ मुझे प्रतीत हो रहा है, जो कुछ मुझे दिखाया जा रहा है, उसमे सच्चाई कितनी है। ऐसे बच्चों को सत्य से अवगत कराया जाता है।

प्र: जी। धन्यवाद सर।

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