गुरु ही देव है, माने ऊँचा देव को बाद में मानना, पहले आत्मा को ऊँचा मानो। बाहर कुछ भी ऊँचा नहीं है, जो ऊँची से ऊँची चीज़ हो सकती है, वो तुम्हारे ही भीतर मौजूद है। कितनी आत्मसम्मान की बात है ना ये। पर हम अपने ही प्रति अपमान से भरे हुए लोग हैं। तो हमें लगता है कि वहाँ पर कुछ है और हमें जाकर लोट जाना है, नेताजी हो, कोई हो, लौट जाना है। हीन भावना, अपना ही अपमान।
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आचार्य प्रशांत: जो सबसे ऊँची चीज़ हो उससे कटकर क्यों रहा जाए, और जुड़ना कई बार तरीक़ा हो सकता है कटने का। उदाहरण के लिए गुरु पूर्णिमा 365 में से एक दिन है तो जुड़ जाते हैं। कितने दिन? एक दिन। 365 में से एक दिन जुड़ जाते हैं। और इतना जो ये विराट ब्रह्मांड है, उसमें किसी एक व्यक्ति को या दो-चार व्यक्तियों को गुरु घोषित कर देते हैं, शरीर देख कर के। शरीर पहली बात तो आते-जाते रहते हैं, और दूसरी बात शरीर तो सबके लगभग एक जैसे ही होते हैं। तो समग्रता से, पूरेपन से ख़ुद को किसी क़द्र बचाए रखने का एक तरीक़ा और ये हो गया। और इन दोनों को मिला दें तो क्या बात बन जाएगी? वो ये कि गुरु है माने कोई इंसान है और गुरु पूर्णिमा आती है साल में एक बार, उस दिन उस इंसान की स्तुति, श्लाघा कुछ कर दो। उस दिन उसकी प्रशंसा कर दो, भजन वग़ैरह गा दो, चरणकमल और इस तरह की बातें उससे खूब सारी कर डालो।
एक व्यक्ति, एक दिन। एक व्यक्ति और उसका एक दिन। तो इसलिए मैंने आपसे आते ही कहा कि जुड़ना अक्सर कटने का बहाना हो जाता है। एक दिन तो 1/365 और एक व्यक्ति तो वो व्यक्ति सदा उपलब्ध रहने नहीं वाला। पहली बात तो मरेगा और दूसरी बात जब तक ज़िंदा भी है, तब तक हमेशा आपके सामने रहेगा नहीं। आपके सामने रहे भी तो वो चीज़ तो बाहरी ही है ना। आप उसकी सुनो क्यों? कोई भी बाहर है आपसे, आप उसकी क्यों सुनो? और आप उसकी बात सुन भी लो तो समझो क्यों? व्यक्ति ही तो है। अधिक से अधिक कितनी ऊँचाई दे सकते हो किसी व्यक्ति को? दे सकते हो, बहुत दे सकते हो, पर एक सीमा हो जाएगी। उस व्यक्ति की अपनी भी कुछ सीमाएँ हैं और बाक़ी आप भीतर ही भीतर उसके साथ अपने संबंध को सीमित रख सकते हो। दोनों बातें। तो कुल मिलाकर ये पूरा जो कार्यक्रम है, ये बड़ा ख़ुद को रोके रहने का हो जाता है। सीधे शब्दों में कहूँ तो आत्म-प्रवंचना — ख़ुद को ही धोखा देना।




