पुरुषों के विरुद्ध नारी का क्रोध || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरा नाम ऋचा है। आप तीन महीने पहले मुझे यूट्यूब में आप मिले और तब से मुझे लग रहा है कि हाँ, कुछ हो सकता और कुछ बदलाव हम कर सकते हैं अपनी ज़िंदगी में। अन्यथा काफ़ी कुछ मन में चल रहा था।
मेरा जो व्यक्तित्व है वो कुछ ऐसा है, कॉन्फिडेंस कम रहता है, मुझे दुविधा रहती है और अंतर्मुखी हैं हम काफ़ी। किसी से बातचीत कर नहीं पाते सही से। मुझे लगता है कि मेरी बात कोई सुनने वाला, समझने वाला नहीं है। इस वजह से हम ज़्यादातर चुप रहते हैं। लेकिन मन में बहुत कुछ चलता है।
मेरे अंदर गुस्सा बहुत ज़्यादा है। जो कि मुझे लगता है कि पितृसत्तात्मक समाज की वजह से है। पितृसत्ता की वजह से है या मेरे आस-पास जो हम दुनिया देखते हैं और समझते हैं उसकी वजह से है।
जब हम छोटे थे, दूसरी या तीसरी कक्षा में, मेरे इलाके में एक दीदी थीं, उनकी शादी हुई। शादी के बाद दहेज की वजह से उनके पति और ससुराल वालों ने उनको जला दिया। वो हैं, जिंदा हैं, सही सलामत हैं। लेकिन वो पूरी बदल गयीं। मतलब शरीर जल गया। उस घटना से उनकी ज़िंदगी बदल गयी पूरे तरीक़े से।
थोड़े और बड़े हुए इलाके में एक दूसरी दीदी थीं। उनकी शादी हुई। उनका भी उनके ससुराल वालों के साथ सही नहीं चल रहा था। चर्चा होती थी लेकिन उनके मायके वाले वापस उनको ससुराल भेज देते थे। अंत में ये हुआ कि जब वो तीन माह की गर्भवती थीं, एक रात उनके पति ने उनको शायद ज़हर देकर बेहोश करा और जब बेहोश वो हो गयीं, उनको रेलवे ट्रैक पर डाल दिया। ट्रेन निकल गयी उनसे। उनका जीवन ख़त्म।
अच्छी खासी पढ़ी-लिखी थीं वह। सब कुछ था। फिर थोड़े और बड़े हुए तो राजनीति से अगर जुड़ा देखें तो युद्ध हुए। भारत-पाकिस्तान का कारगिल युद्ध हुआ। गोधरा कांड हुए।



