इतनी गन्दगी है भीतर, फिर खुद से प्रेम कैसे करें? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल आपने सत्संग में आत्म-प्रेम के विषय में कहा था, कैसे मन यह जानते हुए, यह देखते हुए कि उसमें सारी गन्दगी मौजूद है, बहुत विकार मौजूद हैं, खुद को प्रेम कर सकता है। यह रास्ता बहुत कठिन मालूम होता है, जब भी आत्म-प्रेम, सेल्फ़-लव की ओर एक भी कदम आगे बढ़ाते हैं तो भीतर मौजूद विकार आकर सारा रास्ता रोक लेते हैं।
आचार्य प्रशांत: या तो जो सब गन्दगियों के बीच में तुम्हारी शुद्धता छुपी हुई है उससे प्रेम कर लो, वो आत्म-प्रेम का रास्ता है। ऊपर-ऊपर बहुत गन्दगी है पर भीतर शुद्धता है, मुझे प्रेम है उस शुद्धता से और चूँकि मुझे उस शुद्धता से प्रेम है, इसलिए मैं उसका पोषण करूँगा, उसको और बढ़ाऊँगा — ये प्रेम का रास्ता है, ये गन्दगी को नहीं देखता। दूसरा जो रास्ता है — वो आत्म-त्याग का है। कह रहे हो कि जब मैं जानता हूँ कि मुझमें इतनी गन्दगियाँ भरी हुई हैं, तो मैं खुद से प्रेम कैसे कर सकता हूँ। ठीक है, मत करो खुद से प्रेम, खुद का त्याग कर दो।
भई, तुममें गन्दगी भी है और शुद्धि भी है। मैंने समझाया कि अपनी शुद्धता से प्रेम करो, पर तुम बात कर रहे हो अपनी गन्दगी की, अपने कचरे की, वो सब जो दोष और विकार भीतर बैठे हैं, उनकी बात कर रहे हो। ठीक है, अगर तुम्हारी नज़र उन पर हैं, तो तुम्हारे लिए फिर बेहतर है आत्म-प्रेम से आत्म-त्याग का रास्ता। जिस कचरे को लेकर के परेशान हो — अंदरुनी कचरा, उस अंदरुनी कचरे का त्याग कर दो, ये ज्ञानी का रास्ता होता है, ये “नेति-नेति” का रास्ता है, ये आत्म-त्याग का रास्ता है। ‘छोड़ूँगा, काटूँगा, मिटा दूँगा!’
प्रेम का रास्ता सिर्फ़ सीधे, सामने सच को देखता है और उसकी तरफ़ बढ़ता चला जाता है। वो कहता है, ‘प्यार हो गया है उससे, अगल-बगल क्या है, मैं देख नहीं रहा। जीवन में गन्दगी बहुत है, पर मुझे ये भी समझ में आ गया है कि जीवन में चाहने लायक क्या है, अब जो चाहने लायक है मैं उसके साथ रहूँगा, गन्दगी की ओर देखूँगा ही नहीं। नतीजा ये निकलेगा कि कुछ समय में गन्दगी के पार निकल जाऊँगा। जीवन में बहुत कचरा है लेकिन जीवन में कुछ ऐसा भी मिल गया है जो बहुत साफ़ है और सुन्दर है, तो अब मैं पूरा जीवन बिताऊँगा उसके साथ जो साफ़ है और सुन्दर है।’



