प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत बार ऐसा होता है कि हम कुछ लोगों को बड़ा समझने लगते हैं, और उन्हें तवज़्ज़ो देने लगते हैं। समझ नहीं आता कि ऐसा करना भी चाहिए या कोई सम्यकता रखनी ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: यूँ तो होगा ही, वो होना ही पक्का है। देखो, दुनिया तो झूले की तरह है, बच्चों का झूला होता है सीसॉ, उसमें क्या होता है? एक उठा सिर्फ़ तब जब दूसरा। उसमें कभी ऐसा देखा है कि दोनों उठे हुए हैं कि दोनों गिरे हुए हैं (हाथों इशारा करते हुए)। देखा है कभी ऐसा? इस दुनिया में ऐसा ही है। दुनिया में सम्यकता नाम की कोई चीज़ नहीं होती। सम्यकता सन्तुलन नहीं है। सम्यकता सन्तुलन नहीं है कि ऐसे बराबर कर दिया उसको (हाथों से एक तल में होने का इशारा करते हुए)। सम्यकता कोई और बात है। सम्यकता का अर्थ होता है दैवीय संगीत, औचित्य। औचित्य समझते हो? उचित होना, राइट होना।
सन्तुलित होने और सम्यक होने में आयामगत अन्तर है। हम सन्तुलन तो जानते हैं कि अच्छा आपको पहले ज़्यादा इज़्ज़त दे दी थी, फिर बहुत ही कम कर दी, तो अब बीच की इज़्ज़त देंगे। बीच की इज़्ज़त क्या होती है? कि पहले झुककर पाँव छूते थे, ये ज़्यादा इज़्ज़त हो गयी, फिर एकदम ही इज़्ज़त नहीं दी तो तनकर खड़े हो गये। फिर समझ में आया कि ये तो गड़बड़ हो रही है, तो फिर बीच की इज़्ज़त दी। बीच की इज़्ज़त क्या दी? कि फिर उसका पेट छूना शुरू कर दिया।
पहले बोलते थे पाय लागूँ , अब बोलते हैं पेट लागूँ। इज़्ज़त देने में उसका पेट सहला दिया। इशारा समझो। बड़ा गड़बड़ हो जाता है मामला, कई लोग करते भी ऐसे ही हैं। देश के जो पश्चिमी भाग हैं वहाँ ये भी खूब प्रचलित हो रहा है कि घुटने छुने के नाम ये पाँव छूने के नाम पर घुटने और जाँघें छुयी जाती हैं। पाय लागूँ , वो आयेगा वो ऐसे (छुकर मस्तक पर लगाने का इशारा करते हुए)। मैंने कहा, ‘तू कर क्या रहा है?’
सन्तुलन नहीं, सन्तुलन बड़ी हास्यास्पद स्थितियाँ पैदा कर देगा। सन्तुलन के तो चुटकुले बन जाएँगे। तुम्हें इज़्ज़त देनी है तो उसको दो जो वाकई इज़्ज़त देने के काबिल है।







