प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सवाल ये है कि मन हर चीज़ को अंकित क्यों करता है, कि किसी ने किस नज़र से देखा, क्यों हँसा, क्यों आवाज़ हुई। कहीं तो मन में भी कुछ हो जाता है।
आचार्य प्रशांत: हर चीज़ को नहीं अंकित करता मन। इतनी सामर्थ्य ही नहीं मन की कि हर घटना, हर संवेग उस पर चिन्हित हो जाएँ। मन अहम् का ग़ुलाम होता है। अहम् ने जो अपना नाम रखा होता है, अहम् ने जो अपनी पहचान तय करी होती है, मन उसके अनुसार काम करता है। तुमने जो कुछ भी अपना नाम-पता अपनेआप को बता रखा है, उसी के अनुसार घटनाएँ और प्रभाव तुम्हारे मन पर अंकित होते हैं; सबकुछ नहीं मन पर आता।
इस जगह का ही उदाहरण ले लो, अभी बहुत कुछ है जो हो रहा है। तुम अगर ध्यान ही देना चाहो, तो यहाँ इतने लोग बैठे हैं, किसी पर भी ध्यान दे सकते हो। दीवारें हैं, उपकरण हैं, रोशनियाँ हैं, खिड़कियाँ हैं, दरवाज़े हैं, फ़र्श है, छत है; कितनी चीज़ें हैं न जो मन पर अंकित हो सकती हैं? वो अंकित हो रही हैं क्या? नहीं हो रहीं न? इसलिए क्योंकि इस समय अहम् का नाम क्या है? 'मैं जिज्ञासु हूँ।' अहम् ने अपना अभी क्या नाम रखा हुआ है? 'मैं जिज्ञासु हूँ। सवाल किया है मैंने, मैं सवाली हूँ।‘
ठीक है न?
अगर जिज्ञासु हो तुम, तो इस समय मन पर क्या अंकित होगा? जवाब। इसलिए मन पर अभी बाकी चीज़ें ज़रा भी रंग नहीं छोड़ रहीं, असर नहीं छोड़ रहीं। जो तुम्हारा नाम होता है, उसके अनुसार मन दुनिया से प्रभाव वगैरह ग्रहण करने लगता है, और मन दुनिया से जो कुछ ले रहा होता है, मन के अनुसार बस दुनिया वैसी ही होती है।
इस समय मैं तुमसे पूछूँ कि तुम्हारा संसार कैसा है, तो क्या तुम कहोगे कि दो खिड़कियों के बीच में दरवाज़ा है या इस समय यहाँ पर इतने लोग मौजूद हैं? मैं इस वक़्त पूछूँ कि तुम्हारा संसार कैसा है, तो तुम कहोगे, ‘मैं जो बातचीत कर रहा हूँ, वैसा ही है मेरा संसार। मेरे संसार में एक ही चीज़ है। ये जो भी बातचीत की घटना घट रही है, इसके अलावा कुछ और है ही क्या इस दुनिया में!’




