क्या मुक्त पुरुषों का भी अपना निजी व्यक्तित्व होता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो मेरा प्रश्न ये है कि बुद्ध हुए, महावीर हुए, तो उस समय के जो तात्कालिक कारण थे कि कर्मकांड की प्रधानता हो गयी थी इस वजह से उन्होंने उसको अस्वीकार कर दिया। तो जैसे कि आप वेदों-उपनिषदों की व्याख्या करते हैं, समझाते हैं, ये चीज़ वो लोग भी कर सकते थे लेकिन उन्होंने कुछ नयी बातें कहीं और उनकी सत्ता को इनकार कर दिया। जबकि बाद में ये भी हुआ कि बुद्धिज़्म में या जैनिज़्म मे फिर पाखंड को बढ़ावा मिला, उनके जाने के बाद। तो काम तो वही हो गया फिर से। तो बुद्ध और महावीर ने वेद-वेदान्त की ही व्याख्या क्यों नहीं करी?
आचार्य प्रशांत: करा होगा, करा होगा, उन्होंने भी करा होगा, और उन्होंने अपने से पूर्ववृत्ति कई सुधारकों को ऐसा करते देखा भी होगा। इस बात को समझना — कोई सन्त, कोई मुक्त पुरुष व्यर्थ के विद्रोह में विश्वास नहीं रखता। चीज़ अगर इतनी ही नहीं बिगड़ गयी है कि उसको फेंकना पड़े, तो वो उसको सुधारने में ज़्यादा यक़ीन रखता है। उसका नाम समाज विध्वंसक नहीं होता न? उसका नाम होता है समाज सुधारक।
तो पहली कोशिश तो यही की होगी कि सुधार आ जाए, या तो स्वयं की होगी या अपने से पहले कई औरों को देखा होगा, उदाहरण के तौर पर, जिन्होंने कोशिश की कि सुधार आ जाए। लेकिन समय-समय की बात है — कई बार स्थितियाँ इतनी प्रतिकूल हो जाती हैं कि सुधार की सम्भावना बिलकुल ख़त्म हो जाती है। तब फिर नये शब्द, नयी मिथ (पुराण कथा) और नये सिद्धान्त इस्तेमाल करके सत्य का एक नवीन प्रस्तुतिकरण करना पड़ता है। नहीं तो जो सुधार सकते हैं वो पहली कोशिश यही करते हैं कि सुधार ही दें। समझ रहे हो?



