
अहंकार भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके उपयोग से पहचाना जाता है। आँसू, मुस्कान या कोई भी भावना अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार उन्हें लाभ, छवि या स्वार्थ के साधन में बदल देता है। यदि रोना किसी परिणाम, सहानुभूति या लाभ से जुड़ा है, तो वह प्रोग्राम्ड इमोशन है। शुद्ध भावना सहज होती है; अहंकार हर भावना को अपने हित के अनुसार मोड़ देता है।







प्रश्नकर्ता: लगभग सभी परिवारों में समस्याएँ होती ही हैं। अनबन, खटपट होती ही है। फिर भी इनमें लोग साथ रहते ही हैं। इसका क्या समाधान है?





प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि मम्मी हमसे कहती हैं कि तुम्हारे कारण हम अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाये। तो सर, उनकी इच्छा तो यही थी न कि हम भी कॉलेज में जाएँ। तो सर, वो ऐसा क्यों कहती हैं कि हम तुम्हारे कारण अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाये?

प्रश्नकर्ता: सबसे पहले आपको और इस संस्था से जुड़े सभी वॉलन्टियर्स (स्वयंसेवकों) को कोटि-कोटि नमन, हम सभी के जीवन में एक अलग अलख जगाने के लिए। मैं पिछले दो वर्षों से आपको सुन रहा हूँ, जिसकी वजह से अन्दर से एक अलग आवाज़ आती है।

प्रश्नकर्ता: मैं अपने घर में अपने परिवारजनों को इस सत्संग से लाभान्वित करना चाह रहा था, परन्तु खुद के प्रयासों की वजह से वो विपरीत दिशा में ही जा रहे हैं।

प्रश्न: आचार्य जी, क्या अध्यात्म और गृहस्थ जीवन को साथ चलाना सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: दोनों को अलग कैसे चला लेते हो? कह रहे हैं गृहस्थ जीवन और अध्यात्म को साथ कैसे चला लेते हैं। मुझे बड़ी उत्सुकता है जानने की कि वो गृहस्थी कैसी होगी जिसमें अध्यात्म नहीं है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मेरा प्रश्न ये है कि हम लोग अपनी फ़ैमिली, जहाँ से हम बोलना, सीखना, सब कुछ, बचपन से शुरू करते हैं, उनके खिलाफ़ अगर खड़ा होना पड़े, क्योंकि वो कुछ समझ ही नहीं रहें हैं। कितना भी समझाओ, उनको पता भी है कि वो ग़लत कर

आचार्य प्रशांत: आमतौर पर जो घरों की बुरी दशा रहती है, जो कलह-क्लेश संताप रहता है, उसका बहुत बड़ा कारण ये है कि घर के केन्द्र में जो महिला बैठी है, जो स्त्री है, पत्नी है, माँ है, गृहिणी है उसको घर में क़ैद कर दिया गया है। घर उसी

आचार्य प्रशांत: पति पत्नी से परेशान रहता है मेरी उम्मीदें नहीं पूरी करती। पत्नी भी तो बराबर ही परेशान रहती है ना पति से, ये मेरी उम्मीदें नहीं पूरी करता। पति कहेगा मैं इसकी उम्मीदें क्यों पूरी करूँ, इसकी उम्मीदें ही नाजायज़ हैं। पत्नी कहती है मैं इसकी उम्मीदें क्यों

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ? मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ। ये भी पता है कि वो ठीक हैं अपनी जगह पर, फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा। इसीलिए घरवालों से कुछ समय लिया है, पर अब ऐसा लग

प्रश्नकर्ता: मेरे विचार से एक व्यक्तिगत संसार होता है और एक सामाजिक संसार होता है। और मेरी आयु वर्ग में — 21 से 30 वर्ष की आयु के बीच जहाँ पर आदमी के के सामाजिक संसार को दो हिस्सों में बाँट दिया जाता है — रिश्ता (पर्सनल लाइफ़) और कैरियर…


प्रश्नकर्ता: मैं सूरत से आया हूँ। और मेरा जो प्रश्न है वो रियल लाइफ (वास्तविक जीवन) से है। आचार्य जी, मैं आपको कम-से-कम पाँच-छः महीने से सुनता हूँ। और सुनने के बाद अंदर से बहुत से बदलाव आये हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं एक आध्यात्मिक संस्था से पहले से ही जुड़ा हुआ हूँ, और मैं आपके साथ भी जुड़ा रहना चाहता हूँ। क्या ये सम्भव है कि मैं एकसाथ दो गुरू रख सकता हूँ?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, दो हज़ार एक में मेरा विवाह हुआ था, उसके बाद थोड़ी सी पज़ेसिवनेस थी, बहुत ज़्यादा पज़ेसिवनेस


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न बच्चों के परवरिश के संदर्भ में है। जैसे हमेशा से कहा जाता है कि एक बच्चे की परवरिश में उसके माता और पिता दोनों की ही बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। और अगर दोनों में से कोई एक

प्रश्नकर्ता: मैं सिंगल पैरेंट (एकल अभिभावक) हूँ। मेरी एक बच्ची है छोटी। मुझे उसे कैसे संभालना चाहिए, कैसे संस्कारित करना चाहिए? क्योंकि मैं उसको थोड़ा सा फ़्रीडम (स्वतंत्रता) भी देती हूँ, तो बाहर के लोग बोलते हैं कि वो तुम्हारी सुनती ही नहीं है। तो कैसे उसको अच्छे से संस्कार…


प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहली बात तो आप और विवेकानंद जी एक ही फ्रेम (चौखट) में दो सुपर हीरोज बैठे हैं, तो आपकी जो बात है,

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरा नाम ऋचा है। आप तीन महीने पहले मुझे यूट्यूब में आप मिले और तब से मुझे लग रहा है कि हाँ, कुछ हो सकता और कुछ बदलाव हम कर सकते हैं अपनी ज़िंदगी में। अन्यथा काफ़ी कुछ मन में चल रहा था।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं बन्धनों में फँसा हुआ हूँ और मैं जिन लोगों से जुड़ा हुआ हूँ, वो भी कमरे में बन्द ही हैं, फँसे हुए हैं। उन्हें इस बात की कोई ख़बर नहीं और कोई ख़बर लेना भी नहीं चाहता। मेरे साथ-साथ उनके लिए भी इस क़ैद से रिहाई

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरे दो बच्चे हैं आचार्य जी और मेरा प्रश्न उन्हीं से सम्बन्धित है कि आजकल की जो पीढ़ी है, ये अभिभावकों की बात क्यों नहीं सुनती, और इतनी बहस क्यों करती है?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। मैं आपको दो-ढाई साल से सुन रही हूँ। पहले तो मुझे आपकी बातें थोड़ी कम समझ में आती थीं, पर अभी धीरे-धीरे क्योंकि जैसे कहते हैं कि तीस साल के बन्धन हैं या जो मन हमने सोसायटी (समाज) से लिया है, हर चीज़ सोसाइटी से मिली…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सब कहते हैं कि सबसे ताक़तवर रिश्ता माँ-बाप और बच्चों का होता है लेकिन अगर मैंने माँ-बाप को न पसन्द आने वाली लड़की से शादी करने का फैसला लिया तो वो रिश्ता भी तोड़ देते हैं। तो फिर इस रिश्ते का क्या अर्थ है? और अगर इसका

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, शत्-शत् नमन। मैं व्यवसाय से एक चिकित्सक हूँ। मेरा सवाल ये व्यक्तिगत नहीं है। मेरा सवाल ये था आचार्य जी कि ये जो चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने जो प्रगति की है आईवीएफ सेंटर (प्रजनन केंद्र) के, इसमें दो चीज़ और शामिल हैं कि भई

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं नागपुर से हूँ, मैं विगत आठ महीनों से आपको सुन रही हूँ और एक घुटन थी, एक बेचैनी थी, एक अजीब सी तड़प थी। आ गयी यहाँ आपके पास इस शिविर में, एक अजीब सी शांति लग रही है, आनंद आ रहा है। मैं ये

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल बड़ा व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी है। यह घरेलू हिंसा को लेकर है। मेरी माँ की १६ साल की उम्र में मेरे पिता से शादी करवा दी गई। वह गहरी शराब की लत में पड़ गए और उनकी वजह से परिवार की आर्थिक और

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आपको सुनना शुरू करने से एक-दो महीने पहले मेरी शादी हो गयी थी। शादी तो हो गयी, अब समस्या यह है कि एक प्रकार से हम दोनों बिलकुल अलग-अलग ध्रुव हैं। लोग कहते है कि विपरीत ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, असल ज़िंदगी में शायद…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।, मैं आपको करीब डेढ़ साल से सुन रहा हूँ। पहले खाली समय में आपको ही सुनता रहता था, आपकी ही संगति करता था, आदतें भी सुधर गईगयी थीं। लेकिन अब मैं पा रहा हूँ कि मैं अपनी पुरानी आदतों (खाने, नशे वगैरह) में वापिस खिसकता चला

भाग 1

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पहले मैं परिवार वालों के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित था। लेकिन अब उनसे हिसाब-क़िताब वाले सम्बन्ध हैं। क्या यह बदलाव सही है?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा प्रश्न यह है कि हम अपने बच्चों को सत्य से कैसे अवगत कराएँ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। सत्संग और शिविर वाला माहौल घर पर ख़ुद को कैसे दे सकते हैं? क्या ऐसा संभव है क्योंकि जहाँ भी मैं रहता हूँ, चाहे घर पर, स्कूल में, कॉलेज में या

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने रिश्तों को निभाने के कारण मैं अशान्त हो जाता हूँ। ऐसा क्यों होता है?

प्रश्नकर्ता: आपसे प्रेरणा मिली है कि अध्यात्म, गीता, उपनिषद् का जीवन में बहुत महत्व है और जितनी जल्दी हो सके ज़िन्दगी में उतनी जल्दी इन ग्रंथों से परिचय हो जाना चाहिए। अब मेरा चौदह साल का बेटा है, उसे बहकते देख रहा हूँ। उपनिषद् इत्यादि उसे बताता हूँ तो उसे

माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।
पीछे हटने का मन क्या होता है? मन क्या होता है? मैंने कभी बोला मन करता है? मैंने कहा, पीछे हटने का फ़ैसला लेना चाहते हो स्वार्थवश। चाहते हो। “मन करता है,” तो बहुत छुपा-छुपाई वाला मुहावरा है। “मन कर रहा है,” मन क्या कर रहा है, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ। “मन कर रहा है,” तो ऐसा लगता है जैसे किसी और के प्रभाव में आ गए हो, मन कोई और है। आप ही मन हो, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के साथ ही घरेलू प्राणी भी है। घर तो रहेगा ही — प्रश्न यह है कि उस घर के साथ आप संबंध क्या बना रहे हो? आपके इर्द-गिर्द जो कुछ भी है, उससे सही रिश्ता बनाना सीखो। अध्यात्म का मतलब यह नहीं है कि घर-बार छोड़ देना है। अध्यात्म में कर्म के तौर पर कुछ भी अनिवार्य नहीं, कुछ भी वर्जित नहीं। सब विकल्प खुले हैं — छोड़ने का भी विकल्प है, और रिश्ते को सुधार देने का भी विकल्प है। आपको अपनी चेतना का प्रयोग करके देखना है कि इस क्षण पर क्या करना उचित है।
यदि घर में कोई बोध की राह पर चल पड़ा है, तो यह पूरे परिवार के लिए शुभ संकेत है। अध्यात्म परिवार को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे सुदृढ़ और समृद्ध बनाता है। यह हर रिश्ते को नई रोशनी में उजागर करता है। जो स्वयं को जानने की दिशा में बढ़ता है, वह पहली बार जीवन में वास्तविक रूप से उपयोगी बनता है। सही संगति में प्रवेश करने से वर्तमान की सभी संगतियाँ भी साफ़ हो जाती हैं। इसलिए साहसपूर्वक अपने बंधनों को जानने की राह चलो, और उनसे मुक्त होते जाओ।
अपने रिश्तों के आधार को समझो और रिश्ता सिर्फ़ माँ-बाप या दोस्तों से नहीं होता। रिश्तों का अर्थ है पूरी ज़िन्दगी, क्योंकि हम रिश्तों में ही जीते हैं। यही कारण है कि जब ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं, तो रिश्ते कमजोर पड़ जाते हैं, क्योंकि ये ज़रूरत और निर्भरता के रिश्ते होते हैं। निर्भरता के रिश्ते कभी स्वस्थ नहीं हो सकते।
जिन लोगों की तुम बात कर रहे हो वो वही कर रहे हैं जो अस्तित्व का नियम है। वो देह हैं, वो शरीर हैं। वो उसी की बात करते हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए होती है क्योंकि तुम भी बहुत हद तक उनके जैसी हो। तुम्हारी तकलीफ़ की वजह ये नहीं है कि उन्होंने तुमसे कुछ व्यर्थ की बातें कह दी हैं या उनकी कुछ व्यर्थ की धारणाएँ हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास भी ये धारणा है कि वो तुम्हारे हैं और तुम्हारे और उनके रिश्ते में कुछ सच्चाई है, कुछ पवित्रता है, कुछ ताक़त है।
प्रश्नकर्ता: अपूर्वा हैं, अगर कोई हमारी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाए, हमें बार-बार परेशान करे तो हम उस समय पर न्यूट्रल (तटस्थ) कैसे बने रहें?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो-तीन तरह की परेशानियाँ होती हैं जो लोगों को लगती हैं। मान लो, तुम ट्रेन में जा रही हो, भारतीय रेल। अब…
यस्यामिमे घण्नरदेव दस्यव: सार्थ विलुम्पन्ति कुनायकं बलातू। गोमायवो यत्न हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं बवृका:।।
अर्थ: महाराज, उस जंगल में छ: डाकू हैं। इस वणिक समाज का नायक बड़ा दुष्ट है। उसके नेतृत्व में जब यह समाज वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात उसे लूट लेते हैं।
~ परमहंस गीता…
यथा ह्नुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीज क्षेत्र पुररेवावपन-काले गुल्मतृणवीरुद्धिर्गह्नमिव। भवत्येवमेव गृहा श्रमः कर्मक्षेत्र यस्मिन्न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथ:।।
“जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण से आदि…
प्रश्नकर्ता: हमारा जो मन है वो डूअलीटी (द्वैत) में ही रहता है। पहले वो समाज में ढूँढता है चीज़ों को, फिर वो आध्यात्म में ढूँढता है चीज़ों को। जब वो दोनों जगह से हारता है तब वो थककर रुकता है। तब आप उपनिषद् की बात करते हैं। उपनिषद् भी मैं…
आचार्य…
आचार्य जी, मेरा प्रश्न…
आपने जो कहा कि स्वेच्छा से अपनी इच्छा का त्याग कर देना चाहिए, तो मुझे लगता है मेरी परिस्थिति…
आचार्य प्रशांत: जो आप…
जो पहले इतना अन्दर से दिख नहीं पाता था। जब आपको…
आचार्य प्रशांत: इसी सवाल को आप और आगे बढ़ाएँगे तो आपको ये भी पूछना पड़ेगा…
आचार्य प्रशांत: होता क्या है कि हम जिनका भला चाहते हैं हम उन्हीं की ओर देखना शुरू कर देते हैं। यह ऐसी सी बात है कि कोई ड्राइवर गाड़ी चला रहा हो और सवारियों की ओर देखना शुरू कर दे कि कितनी प्यारी सवारियाँ है और मुझे इनका ख़याल रखना…
तो, आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है कि ऐसे तो मेरी लाइफ स्टाइल (जीवन शैली) सब…
मेरा जो व्यक्तित्व…
आचार्य प्रशांत: तो सवाल है बच्चों के बारे में कि ये बच्चे ऐसे क्यों…
प्रश्नकर्ता: मैं सूरत से आया हूँ। और मेरा जो प्रश्न है वो रियल लाइफ (वास्तविक जीवन) से है। आचार्य जी, मैं आपको कम-से-कम पाँच-छः महीने से सुनता हूँ। और सुनने के बाद अंदर से बहुत से बदलाव आये हैं।
जो पहले इतना अन्दर से दिख नहीं पाता था। जब आपको…
मैंनूं कौन पछाणे
हादी मैंनूं सबक पढ़ाया, ओत्थे होर न आया-जाया, मुतलिक ज़ात जमाल विखाया, वहदत पाया ज़ोर नी।
गुरु ने मुझे शिक्षा दी कि यह मार्ग ऐसा है कि वहाँ कोई अन्य आता-जाता नहीं है। गुरु ने…
आचार्य प्रशांत: भक्ति सिर्फ़ भगवान की की जाती है। समर्पण सिर्फ़ सत्य को किया जाता है। ये पहली बात। घरवालों की भक्ति नहीं की…
आचार्य…
प्रश्नकर्ता: हैलो सर, सभी स्वार्थी होते हैं। हमारे सभी रिश्ते स्वार्थी होते हैं, तो सर क्या हमारे अभिभावक भी स्वार्थी होते हैं? सर अगर हाँ , तो फिर हम उनको ऐसे क्यों भगवान का दर्ज़ा दे चुके रहते हैं कि वो जो तय करेंगे वो ही बिलकुल अटल सत्य होगा,…