प्रश्नकर्ता: सर, सुबह जब मैं आया था और बैठा था गंगा किनारे। तो जो लोग घूमने आये थे, अभी भी जैसे हैं, तो लोग चिल्लाते क्यों हैं? जैसे मैंने भी अपने पर ध्यान दिया है, मैं भी बहुत चिल्लाता हूँ। तो ये चिल्लाहट क्यों है? कोई अभिव्यक्ति होती है?
आचार्य प्रशांत: हाँ, हम अपनेआप को बताना चाहते हैं कि हमारे जीवन में भी कुछ उमंग है, तरंगित होने के लिए कुछ है।
प्र: अच्छा सर, एक चीज़ और बताओ, जैसे कि मैंने सुना है कि पहाड़ों में जाकर बहुत सारे लोग, मेरे दोस्त भी, बहुत ज़्यादा ड्रग्स वगैरह लेते हैं। तो पहाड़ों में तो ऑलरेडी (पहले से ही) इतनी शान्ति दिखती है, तो उन्हें और, एक्स्ट्रा शान्ति के लिए नशा क्यों करना पड़ता है?
आचार्य प्रशांत: जहाँ परमात्मा नहीं होगा, वहाँ कोई-न-कोई नशा चाहिए। जहाँ परमात्मा नहीं होगा, वहाँ कोई-न-कोई नशा ज़रूर चाहिए। शराब नहीं करोगे, तो कुछ और करोगे। परमात्मा नहीं है, तो बहुत दर्द होता है। उतना दर्द झेला नहीं जाता, नशा करना पड़ता है फिर। जहाँ सच्चाई नहीं है, वहाँ बेइन्तेहा दर्द होता है। कोई उतना दर्द झेल नहीं सकता, फिर आप नशा करोगे। कोई भी नशा कर सकते हो — कमाने का नशा कर सकते हो, ज्ञान का नशा कर सकते हो, वासना का नशा कर सकते हो, प्रसिद्धि का नशा कर सकते हो। कोई भी नशा कर सकते हो, पर करना पड़ेगा, दर्द झेला नहीं जाएगा।
नशेड़ी कौन है? वो जिसे परमात्मा चाहिए, लेकिन कहीं और ढूँढ़ रहा है, कोई विकल्प पकड़ा है। जो शराब में मिल नहीं सकता, उसे शराब में तलाश रहा है। शराब पीकर क्या होता है? जो ये विचारों का पूरा चक्र चलता है, घूर्णन, ये ज़रा रुक जाता है और साथ-ही-साथ भीतर जो तुम दबाये बैठे हो उसको थोड़ी सरलता से अभिव्यक्ति मिल जाती है। जो तुम अन्यथा न बोल पाते, वो तुम शराब पीकर बोल देते हो। और जो विचार तुम्हें आमतौर पर आतंकित किये रहते हैं, वो शराब पी लेते हो तो ज़रा थम जाते हैं। ये तो काम परमात्मा का है, ये तो काम आध्यात्मिकता का है कि तुम्हारे विचारों को स्थिरता दे दे, पर उसमें तुम प्रविष्ट हुए नहीं, तो फिर तुम विकल्प की तरह शराब का इस्तेमाल करते हो।




