गृहस्थ हो भी गए हो, तो भीतर आत्मस्थ रहो || आचार्य प्रशांत, परमहंस गीता पर (2020)

यथा ह्नुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीज क्षेत्र पुररेवावपन-काले गुल्मतृणवीरुद्धिर्गह्नमिव। भवत्येवमेव गृहा श्रमः कर्मक्षेत्र यस्मिन्न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथ:।।
“जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण से आदि से गहन हो जाता है। उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मों का सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता; क्योंकि यह घर ही कामनाओं की पिटारी है।“
~ परमहंस गीता, पाँचवा अध्याय, चौथा श्लोक
आचार्य प्रशांत: तो पूछ रहे हैं कि श्लोक बता रहा है कि कर्मभूमि में कर्मों का सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता माने कर्मों की पूर्ण निवृति कभी नहीं होती। कर्मफ़ल से छुटकारा कभी नहीं मिलता, कर्मचक्र से जीव बाहर कभी नहीं आता। तो पूछा कि, ‘गृहस्थ जीवन जी रहे मनुष्य के लिए सही कर्म क्या है, यदि गृहस्थ जीवन जीते हुए साधना में विघ्न आये,अधिकांश समय रोज़मर्रा के कामों को देना पड़े तो उसका क्या उपाय करें?’ कृपया मार्गदर्शन करें।
देखिए बहुत बार कहा है मैंने कि मजबूरी तो कुछ होती नहीं, आप कह रहे हैं गृहस्थ जीवन जीते हुए साधना में विघ्न आये, अधिकांश समय रोज़मर्रा के कामों को देना पड़े, तो यहाँ तो आपने फिर मजबूरी की भाषा में बात कर डाली न। आप कह रहे हैं आप मजबूर हैं कि आपको रोज़मर्रा के कामों में समय देना पड़ रहा है। आप मजबूर नहीं है, ये तो चुनाव है न, आपके पास विकल्प है कि अगला एक घंटा इसमें दूँ या उसमें दूँ।
आप तय कर लेते हैं कि मुक्ति को नहीं देना है, अध्यात्म को नहीं देना है, सत्कार्य को नहीं देना है, गृहस्थी के काम को देना है। क्या है गृहस्थी के काम? गाजर-मूली खरीदने जाना है। अब आप फ़ैसला करते हैं न? आपने अपनी दृष्टि में खुद ही निर्धारित कर लिया कि इन दोनों चीजों में से ज़्यादा महत्वपूर्ण कौन है तो जो आप फिर चाहोगे वो आपको मिलेगा। आपको गाजर-मूली ही ज़्यादा महत्वपूर्ण लग रही है तो गाजर-मूली बढ़िया मिलेगी रात के खाने में। दूसरी ओर सत्य है, मुक्ति है, आपने उसको चुना होता तो वो भी आपको मिल जाता।






