
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं नाइंथ स्टैंडर्ड में यहाँ दिल्ली आई थी स्कूल में, तो मैंने यहाँ का माहौल अलग पाया। यहाँ पर लड़के, लड़कियों से बात करने में बिल्कुल हिचकिचाते हैं। एकदम घबराते हैं कि लड़कियों से बात मत करो, ज़्यादा बात मत करो।
उसके बाद एक घटना हुई जब हम गेम्स के लिए गए। तब स्पोर्ट्स टीचर ने हमें, लड़कियों-लड़कों को साथ खेलने के लिए बोल दिया। तब जब हम साथ खेल रहे थे, तो एक लड़का मेरे दोस्त को पकड़ने के लिए पीछे भाग रहा था। तो बाक़ी लड़के बोलते हैं कि, "अरे देखो, लड़की को पकड़ रहा है! उसको क्यों पकड़ रहा है? हमें पकड़ ना, हिम्मत हो तो हमें पकड़।" तो ये सिर्फ़ कुछ ही जगह पर होता है। जैसे भारत में ये सिर्फ़ कुछ ही जगह पर है। जैसे मेरी पुरानी स्कूल थी, उसमें ऐसा कुछ नहीं था। हम सब मिलकर रहते थे, मिलकर ही पढ़ते थे, मिलकर ही खेलते थे। ऐसा कोई इनर पार्शियलिटी नहीं थी। तो ये यहाँ पर ही ऐसा क्यों है?
आचार्य प्रशांत: यही तो बेटा लोक-संस्कृति है न। ऐसा ही है। रिवाज़, परंपरा, माहौल — ऐसा ही चला आ रहा है। जो इन चीज़ों का पालन कर रहे हैं न, उन्होंने वो सवाल कभी नहीं पूछा जो तुम पूछ रही हो, क्या? — कि "ऐसा क्यों है?" इसलिए ऐसा है — क्योंकि किसी ने कभी नहीं पूछा कि "ऐसा क्यों है?" बस पालन कर लिया, इसलिए जो है सो है।
पूछ ही लें लोग कि — जो मुझे बताया जा रहा है: "ऐसा आचरण करो", "ऐसा विचार रखो", "ऐसा व्यवहार रखो" — क्यों रखूँ? मना नहीं कर रहा, सिर्फ़ पूछ रहा हूँ। पूछ रही हैं? लड़कियों के लिए तो और ज़रूरी है कि पूछें, क्योंकि ज़्यादा उन्हीं को कहा जाता है — "ऐसे-ऐसे-ऐसे..."। पूछ रहे हैं समझा दीजिए। मानेंगे, बिल्कुल मानेंगे — बस समझा दीजिए।
क्योंकि कोई पूछने वाला नहीं होता, तो जो चल रहा होता है, वो चलता रहता है। अंधेरा क्यों है? अंधेरा तो होगा ही। प्रकाश नहीं होगा तो अंधेरा होगा। किसी को कभी आपत्ति हुई नहीं अंधेरे से — इसलिए अंधेरा है। आपत्ति हो जाए तो पल भर में हट जाएगा। अभी बटन दबा दो, हट जाएगा। अभी सवाल पूछोगे, तो हो जाएगा। वरना तो देखो — पहले एक चलता था फ्रेज़ — टैबुला रासा, अब वो उतना मान्य नहीं रहा। लेकिन फिर भी उस बात में कुछ दम है।
कहते थे कि — एक खाली स्लेट की तरह या कैनवास की तरह बच्चा पैदा होता है। उसको कुछ पता-वता नहीं, वो यहाँ (दिमाग़) खाली है। उसके दिमाग़ में जो डाल दोगे, जैसे उसको संस्कारित कर दोगे, वैसा हो जाएगा। ये बात बहुत वेदांत-सम्मत नहीं है, क्योंकि हम जानते हैं कि जब आप पैदा होते हो, तो वृत्तियों के साथ पैदा होते हो। ठीक है? इन्हीं वृत्तियों को लोकधर्म कहता है कि, ये तुम्हारे पिछले जन्मों के कर्मों से आ रही हैं। वेदांत कहता है — "पिछले जन्म की बात नहीं है, ये प्रकृति का संयोग है।”
इसमें ऐसे पिछले जन्म की रूह-वुह लाने की बीच में कोई ज़रूरत नहीं है। पर ये बात पक्की है कि हम जैसे पैदा होते हैं, ठीक वैसे ही नहीं बड़े होते उसमें समाज रंग भरता है। हमारी स्लेट पर जो लिखावट होती है, वो समाज, माहौल, परिस्थितियों की होती है।
आप बहुत छोटे होते हो, तो आप सवाल वग़ैरह नहीं कर सकते हो। आपको कुछ बात बता दी गई, मानना पड़ेगा। दूसरे पर आप निर्भर भी हो, और इतनी बुद्धि भी नहीं होती कि सवाल पूछ भी पाओ। पर जब थोड़े से बड़े हो जाओ, जैसे बड़े हो गए हो — मैं समझता हूँ 3-4 साल की उम्र के बाद से हर बच्चे को सवाल आने लग जाते हैं और उसको पूछने दिए जाने चाहिए।
यही अच्छी परवरिश है — पेरेंटिंग। और कुछ भी उसके खोपड़े में तो डालो ही मत — कि वो जगह है, वो जगह गंदी है, वो जगह अच्छी है। वो वाले जो वहाँ वाले हैं, उस घर में जो लोग रहते हैं, उनके घर मत जाना। क्यों नहीं जाना? बस (बड़ी-बड़ी आँखे दिखाते हुए और चुप कराते हुए अभिनय करना)। ये सब मत करो, बात करो — "चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ़ मैन"
चाइल्ड को ही करप्ट कर दिया, तो मैन करप्ट निकलेगा ही निकलेगा। अगर चाइल्ड को ही मानसिक रूप से पंगु कर दिया, तो जो मैन है वो भी पाओगे कि लाचार, पंगु और दुर्बल ही पैदा हुआ है। बस यही लोगों को कहीं और परवरिश मिली होती, जो तुम्हारे माहौल के स्कूल के लोग हैं तो उनका व्यवहार बिल्कुल दूसरा होता। इसलिए घूमना-फिरना अच्छा होता है। इसलिए अपने गाँव, शहर, कस्बे से बाहर जाना, देश का भ्रमण करना — स्थिति अनुमति दे तो विदेशों में घूमना अच्छी बात है।
मैं विदेशों में जाकर मज़े मारने के लिए नहीं कह रहा कि अच्छी बात है — वहाँ जाकर ज़रा लोगों को देखो तो। और बहुत मामले में वो आपसे बिल्कुल विपरीत तरीक़े से जीते हैं — और उनको भी पूरा भरोसा है कि उनका ही तरीक़ा सही है। तब पता चलता है कि — "मैं जैसे सोच रहा हूँ, वैसे सोचना ज़रूरी नहीं है।" इससे बिल्कुल अलग सोचने वाले लोग भी हैं, और वो भी जी रहे हैं।
ये नहीं कि उनकी बात सही ही है या मेरी बात गलत ही है। बात ये है कि वो भी अपनी परिस्थितियों के बनाए हुए हैं, और मैं भी। वो अपनी परंपरा में विश्वास रखते हैं — मैं अपनी परंपरा में विश्वास रखता हूँ। तो ले-दे कर के, दोनों ही जमूरे हैं — कठपुतली हैं। वो अपने समाज, परंपरा और इतिहास-अतीत के गुलाम हैं, और मैं अपने समाज, माहौल, अतीत का गुलाम हूँ। ये सब ज़रा देखो तो पता चलता है।
बाहर नहीं भी जा पाओ, तो दक्षिण घूमो। हरियाणा, राजस्थान के हो, तो बंगाल चले जाओ, थोड़ा दुनिया देखो। और जिस भी समुदाय, संप्रदाय, पंथ, जाति इत्यादि से हो — उससे बाहर घुलना-मिलना तो बहुत-बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। बहुत ज़्यादा।
हिंदू हो, तो जाकर के ईसाइयों से, मुसलमानों से बात करो। मुसलमान हो, तो अपने ही वहाँ पर छोटे से दायरे में मत रहो, जाकर के हिंदुओं से घुलो-मिलो। कुछ बातें पता चलती हैं। तथ्य खुलते हैं। और जब तथ्य नहीं खुलते — तो क्या आ जाती हैं, बताओ? कल्पनाएँ।
कुछ भी वहाँ पर छवि बना लोगे, क्योंकि तथ्य तो पता है ही नहीं। और छवि नहीं भी बनाओगे तो कोई व्हाट्सऐप फॉरवर्ड आएगा, उस पर यक़ीन कर लोगे। कोई तुमसे कह देगा — "वहाँ जो लोग रहते हैं न, गली में उस तरफ़ वो गड़बड़ लोग हैं।" और तुम मान लोगे, क्योंकि उन लोगों से तुम ख़ुद तो कभी मिले ही नहीं। तो जो भी कोई बता देगा, वो तुम मान लोगे।
और इसलिए पढ़ना बहुत ज़रूरी है, ताकि हमारा जो सीमित परिवेश है, उसके आगे क्या है, पता चले। बड़े अच्छे लेखकों का काम यही होता है — वो पूरी दुनिया आपको पन्नों में परोस देते हैं। कहते हैं — अच्छा, ठीक है, अभी छात्र है, छात्रा है, या बहुत संसाधन नहीं हैं, बहुत यात्रा नहीं कर सकते — तो वो क्या करते हैं? फिर अपनी यात्राओं के…
श्रोता: किताबें लिखते हैं।
आचार्य प्रशांत: अब “बोल्गा से गंगा तक” — बताओ, किसकी है?
श्रोता: राहुल सांकृत्यायन।
आचार्य प्रशांत: राहुल सांकृत्यायन। अब पढ़ो उसको। अब तुम तो नहीं जाने वाले रूस, और पूरा... वहाँ से तिब्बत गए थे वो। वहाँ से बहुत सारी पांडुलिपियाँ... ये सब तुम नहीं करने वाले। पर उनके जो पूरे मेमॉइर्स हैं, ट्रैवलॉग्स हैं, उनको तुम पढ़ो, तो पता चलता है — "अरे! ऐसा भी होता है? अच्छा, ऐसा भी होता है!" अच्छी किताबें और किस लिए होती हैं? ताकि मन खुले, वरना? एक डब्बा, उसी डब्बे में बैठे हो कूप मण्डूक और टर्रा रहे हो, और सोच रहे हो — हमारी टर्राहट ही तो सत्य है।
और जो जितने छोटे दायरे में रहता है न, वो उतना ही कट्टर हो जाता है। वो अपनी धारणाओं के प्रति उतना ही आग्रही हो जाता है। और जिसने दुनिया देखी होती है, खूब पढ़ा होता है, घूमा होता है — उसमें एक विशालता आ जाती है और उदारता आ जाती है। उसको पता होता है कि सत्य तो यहाँ कुछ भी नहीं है।
तो भाई, कुछ मेरे आग्रह हैं, कुछ तेरे आग्रह हैं। मैं ये नहीं कहूँगा कि मैं सच्चा हूँ और तू झूठा है। मैं बस ये कह दूँगा — भाई, ये मेरी परंपरा है, जो मुझे अतीत से मिल गई। वो तेरी परंपरा है, जो तुझे तेरे अतीत से मिल गई। ठीक है, कोई बहुत गंभीर मुद्दा नहीं है जिस पर लड़ाई कर ली जाए।
मैं तेरे घर में पैदा हुआ होता तो तेरे जैसा होता, और तू मेरे घर में पैदा हुआ होता तो मेरे जैसा होता। तो इस पर हम क्या लड़ें — कि किसका घर सही, किसका घर गलत? ये तो सब समाज और संयोग की बात है, संयोगों के पीछे लड़ाई नहीं की जाती।
जिनके पास संसाधन हों, अपने बच्चों को — हो सके तो थोड़ा दूर की जगहों पर पढ़ने भेजिए। आ रही है बात समझ में? बच्चों को नहीं भेज पा रहे? कि बच्चे बड़े हो गए हैं, उनको कहीं कॉलेज वग़ैरह में एडमिशन मिल रहा है — और दो विकल्प हैं: एक घर के पास वाला और एक 500, 1000, 2000 कि.मी. दूर वाला — दूर वाले में भेजिए। बच्चे का व्यक्तित्व बेहतर निकलेगा। नहीं तो घर घुसनु बना रहे हो उसको। और घुसे मत रहिए उसकी ज़िन्दगी में — “हाँ, पराठा खा लिया?”
मैं आपके सामने बैठा हूँ। आप लोग कई बार — “ये बड़ी-बड़ी बातें...बड़ी-बड़ी बातें, आचार्य जी ने ये करा ये सोचा, वो करा वो सोचा... कैसे हुआ था? क्या हुआ था?” कुछ बहुत छोटी-छोटी बातें थीं, जो बड़े महत्त्व की थीं। मेरी ज़िन्दगी में कोई घुसा नहीं। कोई एनलाइटनमेंट वग़ैरह नहीं। इतनी छोटी सी बात, क्या? मेरे अभिभावक मेरी ज़िन्दगी में नहीं घुसे। हाँ, माहौल उन्होंने पूरा बना कर दे दिया। माहौल बना हुआ है — और जो करना है करो, जैसे उड़ना है उड़ो।
मुझे कभी हुआ कि मुझे कोई सलाह चाहिए — तो मैंने सलाह ले ली। मेरे पिताजी गए हैं, उनसे मेरी जो आखिरी बातचीत हुई थी, वो यहीं बोध स्थल में आए थे और उसके कुछ दिनों बाद चले गए। वो आख़िरी बातचीत भी अध्यात्म को लेकर ही थी।
तब “पुराण प्रत्युषा” शुरू करने की सोच रहा था। याद है किसी को? मैंने उनसे कहा था — मैंने कहा, “कुछ जो महापुराण हैं, 18 उसमें से बचे हैं, तो सोच रहा हूँ गोवा चला जाऊँगा। कुछ महीने लगाऊँगा, इनको पढ़ूँगा।”
तो आखिरी बात उन्होंने जो कही बोले —“एक दिन में एक खत्म करो न, उसमें है क्या।” ऐसे ही थे। समझ रहे हैं ना वो क्या बोलना चाह रहे थे? समझ गए? बस वही आखिरी बात थी। वो नहीं आ रहे हैं कि "ये करो, वो करो, करो..." मैंने पूछा, कुछ तो बता दिया। अच्छी बात।
डर मत जाया करो कि "हम पैरेंट्स हैं और बच्चा हाथ से निकल रहा है।" ये अच्छी बात है अगर वो आपके हाथ से निकल रहा है, उसके लिए अच्छी बात है। और आपके लिए अच्छी बात ये होती है — आपकी दृष्टि में, कि वो आपकी मुट्ठी में बिचा रहे। जो बच्चा आपकी मुट्ठी में बिचा है ना, वो बोनसाई बन जाएगा।
प्रेम होता है कि बीज भले मेरा है पर उसको रोप दिया, दाना-पानी कर दिया, अब उसकी जड़ें खूब गहरी जानी चाहिए ताकि उसकी टहनियाँ और उसका तना ऊँचाई ले सके।
अब मैं ये थोड़ी करूँगा कि “आ, तू मेरे गमले में बैठ।” नहीं, गमले में नहीं बैठूँगा। मैं तुझे अब खुला मैदान दे दूँगा। तू अपनी गहराई, ऊँचाई — खुद अब नाप जा। खूब हर दिशा में, अपने हिसाब से तू अब अपने पंख पसार।
हम क्या करते हैं? “बेटी, तुम ना इस गमले में रहना। यहाँ सुरक्षित रहोगी, बेटी।” वो बेटी गमले में रहेगी, तो वो बेटी बस इतु-इतु (छोटी सी) रहेगी फिर। उसे गमला नहीं चाहिए, उसे क्या चाहिए? उसे खुली ज़मीन चाहिए ताकि ऊँचा आकाश मिल सके।
लकीर का फ़कीर नहीं बनना है। गीता ले ली ना अतीत से, हो गया। जो वहाँ श्रेष्ठतम था — वो हमने ले लिया। शेष विषय अतीत के नहीं, ज़रूरी नहीं है। जो ज़रूरी था, वो हमने ले लिया सर पर रखा है उसको, यहाँ रखा है। ले लिया और बाक़ी नहीं लेंगे।**
ये यूनिफॉर्म में कैसे आज स्कूल था? — यहाँ भी तो टीचर हैं न, इसलिए।