आप ये नहीं कह सकते कि मैं तो उन्हीं शादियों में जाकर के वैसे ही नाचूँगा जैसे नाचता हूँ, लेकिन बच्चे मेरे बड़े शुद्ध संस्कारी निकल जाएँ — निकल ही नहीं सकते। अगर बच्चों को सुधारना है, तो उसमें केवल बच्चों का ही नहीं, माँ-बाप का, पूरे घर का सुधार निहित होगा। श्रम करना पड़ेगा। घर के वातावरण को समझना होगा। तब जाकर के बच्चे सुधरेंगे, नहीं तो बच्चे ठीक वैसे ही निकलेंगे जैसे आजकल की आम संतानें निकल रही हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था। मेरे 9 साल के और 11 साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनेंगे उसमें ज़्यादा ध्यान देते हैं। तो मैं उनको कबीर साहब के भजन वग़ैरह कभी सुनाने की कोशिश भी करता हूँ तो उससे बोर लगता है उनको। तो उस पर थोड़ा मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: देर कर दी है न! आपको 9 या 10 वर्ष किसी चीज़ का अभ्यास करा दिया जाए, सोचिए कितने ज़्यादा होते हैं 9-10 वर्ष! तो उसके बाद फिर एक ढर्रा बँध जाता है भीतर, बदलेगा नहीं आसानी से। ये सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। इसमें सूचना पहुँचनी तय है चारों ओर से किसी के भी कान तक, आँख तक, मन तक। बहुत सावधान रहना होता है कि बच्चों तक क्या चीज़ पहुँच रही है।
हम सोच लेते हैं कि अभी दो साल का है, चार साल का है तो क्या फ़र्क़ पड़ता है! बच्चा ही तो है। हम उसको ले जाकर के शादियों में डीजे पर नचा देते हैं। या कि बच्चा घर में लेटा हुआ है, सोया है या खेल रहा है, हम पीछे से पंजाबी रैप बजा देते हैं, या कोई भी। पंजाबी भाषा में अकेले थोड़ी कोई ख़राबी हो गई, अवधी रैप भी हो सकता है। आजकल बना भी रहे हैं लोग। तब हमको लगता है कोई फ़र्क़ नहीं पड़ गया है। बल्कि




