ये दुनिया बहुत बड़ा समंदर है कीचड़ का और...| Acharya Prashant | Motivational Video | Motivation |

आचार्य प्रशांत: मेरे घर में लाइब्रेरी (पुस्तकालय) थी। उसमें कुछ क़िताबें तो चलो मैं बच्चा था तो मेरे स्तर की थीं, पर ज़्यादातर क़िताबें वो थीं जो आप पढ़ा करते थे और आपके ज़माने की, आपके कॉलेज के दिनों की (वयस्कों की ओर इंगित करते हुए)। मैं वो भी पढ़ डालता था — समझ में आये, समझ में न आये, मैं वो सब भी पढ़ डालता था।
उसमें नोबेल प्राइज़ विनिंग लिटरेचर भी था, उसमें बुकर प्राइज़ विनिंग बुक्स भी थीं, उसमें साइकोलॉजी (मनोशास्त्र) भी था, फ़िलॉसॉफ़ी (दर्शनशास्त्र) भी था, पोएट्री (कविता) भी थी, हिस्ट्री (इतिहास) भी थी। और मैं दूसरी-तीसरी में रहा होऊँगा जब से उस लाइब्रेरी से मुझे थोड़ा प्यार हो गया था। और जब तक मैं आपकी उम्र में पहुँचा था―अब ऐसे गिनती करना तो मुश्किल है पर अगर मैं कहूँ क्लास टेंथ — सैकड़ों क़िताबें मैंने पढ़ डाली होंगी, आउट साइड द टेक्स्ट बुक्स (पाठ्य पुस्तक के अलावा), आउट साइड द टेक्स्ट बुक्स। (तालियाँ बजती हैं)
इसका मतलब ये नहीं है कि मैं टेक्स्ट बुक्स नहीं पढ़ता था, टेक्स्ट बुक्स भी पढ़ लेता था। पढ़ने में भी ठीक-ठाक ही था, बोर्ड के भी रिजल्ट ठीक-ठाक ही आ गये थे। लेकिन टेक्स्ट बुक के अलावा, टेक्स्ट बुक के बाहर।
तो एम्बेसेडर कार बुलायी जाती थी ― मुझे एक-एक वाक्या याद है, बताता हूँ। तो हम रुद्रपुर में रहते थे, तो वहाँ से बहुत जब छोटा सा कस्बा था, तब वहाँ कुछ नहीं था, आज से चालीस साल पहले की बात है। बहुत छोटी सी जगह थी वहाँ। तो वहाँ इतनी कोई मार्केट वग़ैरह भी नहीं थी। तो आप शॉपिंग करने के लिए बरेली जाया करते थीं, और वहाँ से हम लोग कई बार नैनीताल भी जाते थे।



