एक अज्ञानी को आप एक पौधा भी दे दीजिए कि इसे बड़ा कर दो, उससे वो न बड़ा हो। मनुष्य का शिशु तो बड़ी संवेदनशील वस्तु होती है, प्राणवान वस्तु होती है। अज्ञानी को तो आप प्राणहीन वस्तु भी दे दीजिए, तो वो उसका भी बंटाधार कर दे। आप समझ रहे हैं कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, एक इंसान की औलाद को जन्म देकर उसका पालन-पोषण करके, परवरिश करके, उसको एक सशक्त चैतन्य मनुष्य बनाना। कितनी बड़ी बात, कितनी भारी ज़िम्मेदारी होती है। और यहाँ 20, 22, 24 साल वाली, जिन्होंने जीवन में न कोई पढ़ाई की, न कुछ समझा, न कुछ जाना, वो धड़ल्ले से बेबी बूमिंग कर रही हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न पैरेंटिंग को लेकर है, ख़ासतौर पर माँ को लेकर के। अक्सर देखा जाता है, आचार्य जी, जब भी माएँ घर के दबाव में या अपने काम के दबाव में होती हैं, तो सारी परेशानियाँ अपने बच्चों के ऊपर ही उतार देती हैं। चिल्लाकर, कभी डाँटकर सारा फ़्रस्ट्रेशन निकालती हैं। कई बार तो बच्चे बहुत बुरी तरीक़े से पीटे भी जाते हैं।
आचार्य जी, ग्लोबली 60% बच्चे, जो कि 2 से 14 वर्ष के हैं, उन्हें पैरेंट्स या केयर गिवर्स द्वारा फिजिकल अब्यूज़ का सामना करना पड़ता है, और वो भी रेगुलरली (सोर्स: यूनिसेफ)। ऐसा क्यों होता है आचार्य जी? ऐसा क्या हम माओं में, परिवार और समाज के दबाव के चलते होता है, या फिर ये हमारी भावनाओं के प्रति नासमझी है? ऐसे में एक माँ क्या करें आचार्य जी, कृपया मार्गदर्शन करें?
आचार्य प्रशांत: आपने पूछा ही ऐसा है कि मुझे बात खोलकर करनी पड़ेगी। आपने पूछा, ऐसा क्यों होता है? अब कोई भी किसी को मारेगा कब? जब ऊबा हुआ रहेगा, चिढ़ा हुआ रहेगा, परेशान रहेगा, झुंझुलाया हुआ रहेगा, तभी तो मारेगा न।




