परवरिश नहीं आई, थप्पड़ चलाया

Acharya Prashant

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परवरिश नहीं आई, थप्पड़ चलाया
एक अज्ञानी को आप एक पौधा भी दे दीजिए कि इसे बड़ा कर दो, उससे वो न बड़ा हो। मनुष्य का शिशु तो बड़ी संवेदनशील वस्तु होती है, प्राणवान वस्तु होती है। अज्ञानी को तो आप प्राणहीन वस्तु भी दे दीजिए, तो वो उसका भी बंटाधार कर दे। आप समझ रहे हैं कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, एक इंसान की औलाद को जन्म देकर उसका पालन-पोषण करके, परवरिश करके, उसको एक सशक्त चैतन्य मनुष्य बनाना। कितनी बड़ी बात, कितनी भारी ज़िम्मेदारी होती है। और यहाँ 20, 22, 24 साल वाली, जिन्होंने जीवन में न कोई पढ़ाई की, न कुछ समझा, न कुछ जाना, वो धड़ल्ले से बेबी बूमिंग कर रही हैं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न पैरेंटिंग को लेकर है, ख़ासतौर पर माँ को लेकर के। अक्सर देखा जाता है, आचार्य जी, जब भी माएँ घर के दबाव में या अपने काम के दबाव में होती हैं, तो सारी परेशानियाँ अपने बच्चों के ऊपर ही उतार देती हैं। चिल्लाकर, कभी डाँटकर सारा फ़्रस्ट्रेशन निकालती हैं। कई बार तो बच्चे बहुत बुरी तरीक़े से पीटे भी जाते हैं।

आचार्य जी, ग्लोबली 60% बच्चे, जो कि 2 से 14 वर्ष के हैं, उन्हें पैरेंट्स या केयर गिवर्स द्वारा फिजिकल अब्यूज़ का सामना करना पड़ता है, और वो भी रेगुलरली (सोर्स: यूनिसेफ)। ऐसा क्यों होता है आचार्य जी? ऐसा क्या हम माओं में, परिवार और समाज के दबाव के चलते होता है, या फिर ये हमारी भावनाओं के प्रति नासमझी है? ऐसे में एक माँ क्या करें आचार्य जी, कृपया मार्गदर्शन करें?

आचार्य प्रशांत: आपने पूछा ही ऐसा है कि मुझे बात खोलकर करनी पड़ेगी। आपने पूछा, ऐसा क्यों होता है? अब कोई भी किसी को मारेगा कब? जब ऊबा हुआ रहेगा, चिढ़ा हुआ रहेगा, परेशान रहेगा, झुंझुलाया हुआ रहेगा, तभी तो मारेगा न।

माएँ बच्चों को मार रही हैं, मूल कारण तो ये है कि माँ ख़ुद अभी बच्ची है। बिना किसी आंतरिक परिपक्वता के उसने औलाद को जन्म दे दिया है। अचानक उसके हाथ में, उसकी गोद में एक जीव आ गया है, एक चीज़ आ गई है, जो जीती-जागती है। माँ भी जीव है, और ये जीव कभी नहीं समझ पाया कि जीवन का खेल क्या है। इस जीव को अपनी ही हस्ती का कुछ पता नहीं। जो माँ है, उसके अपने हाथ में जो चीज़ आ गई है, वो अब देखभाल, परवरिश और सुरक्षा माँगती है। उसकी कामनाएँ हैं, कहती है पूरी करो, रोती है, चिल्लाती है, बात मानने से इंकार करती है। माँ करे क्या उसका?

माँ तो ख़ुद वो बच्ची है, जो कोई भी ढंग की बात मानने से इंकार करती रही है न। और माँ को नहीं पता कि आपके भीतर क्या बैठा होता है, जो अच्छी बात से भी इंकार करना चाहता है। आपको इतनी अच्छी-अच्छी बातें बताई जाती हैं, पर आप उनको मना करते हो, नहीं मानते। माँ ने ख़ुद कोई ढंग की बात नहीं मानी, तो माँ को नहीं पता कि भीतर कौन है और वो क्यों मना करता है, किसी भी अच्छी सलाह को वो क्यों विरोध देता है, माँ को नहीं पता। तो बच्चे को भी वो कुछ बोलती है, बच्चा मानता नहीं। माँ को नहीं पता सचमुच कि बच्चा क्यों नहीं मानता। तो ले-दे के, माँ के पास बस झुंझलाहट, फिर गुस्सा, और फिर हिंसा बचती है, कि लगा दो उसको चार। मूल कारण तो देखिए यही है।

अब आप बाजारों में निकल जाएँ, कहीं भी चले जाइए। किसी बेबी बूमर जगह पर चले जाइए। कहीं भी क्या चले जाइए, अपने घर में, अपने मोहल्ले में ही देख लीजिए, तो ये बेबी बूमर्स घूम रहे होते हैं।

तो उसमें कई बार होता है कि जो पुरुष आगे-आगे चल रहा होगा, वो तो फिर भी किसी उम्र का लगेगा, 25-28, कई बार 30 का होगा। उसके पीछे-पीछे एक महज़ लड़की आ रही होती है, और उसकी गोद में बच्चा न हो तो आप कहेंगे कि ये अभी तो ऐसे ही किसी कॉलेज में पढ़ती होगी। आप ये तक बोल सकती हैं अगर वो जो पीछे लड़की चली आ रही है, उसे स्कूल ड्रेस पहना दी जाए, तो आप कहेंगे कि ये स्कूली लड़की है। पर फिर आप देखते हैं, कि उसकी गोद में बच्चा होता है। कई बार उसकी गोद में नहीं होता क्योंकि वो थोड़ा कमजोर सी होती है, तो बच्चा पतिदेव की गोद में होता है और वो पीछे-पीछे चल रही होती है।

और मैं ये किसी ग्रामीण क्षेत्र, पिछड़े क्षेत्र, या अनपढ़ लोगों की बात नहीं कर रहा हूँ। आप कहीं भी चले जाइए, मेट्रोस में भी आपको ये नज़ारा देखने को मिल जाएगा, बड़े शहरों में। आप उस लड़की को देखिए वो जो माँ बन गई है, उसकी शक्ल देखिए। वो किस कोण से एक नए प्राण को सींचने लायक दिखाई दे रही है आपको? उसके चेहरे पर अज्ञान है, आँखों में अंधेरा है, वो अभी एकदम अविकसित है भीतरी तौर पर। शरीर से तो विकसित है, तभी बच्चा पैदा हो गया। एकदम अविकसित है। आपने नहीं देखा हो वो बच्चा, आप उससे बात करें तो आप कहेंगे, “बेटा इधर आना, बोर्ड की तैयारी कर रहे हो, कैसे हैं?” और यही नहीं कि आपको बस भूल हो गई है तो आपने उसको स्कूली या कॉलेज की समझ लिया।

आप उससे बात करें, उसकी बातें भी ऐसे ही होंगी बिल्कुल हवा-हवाई बातें। आप उससे दुनिया की चार बातें पूछिए, तो उसे कुछ नहीं पता। आप उससे विज्ञान का कुछ पूछ लीजिए, आप उससे राजनीति का पूछ लीजिए, कुछ खेलों का, इतिहास का, समाजशास्त्र का, मनोविज्ञान का, दर्शन का, उसे कुछ नहीं पता होगा। उसने ज़िंदगी में कुछ नहीं किया, बस झट से एक बच्चा पैदा किया लेकिन। और बहुत बारी ये काम उसने दबाव में करा, तो वो और क्या करेगी?

अब वो यूँ ही एक चीज़ निकल कर सामने आ गई है। अब वो बच्चा है, वो बच्चा उसको समझ में नहीं आ रहा कि क्या चीज़ है, क्यों है, कैसा है। माँ बच्चे की जान खा रही है, बच्चा माँ की जान खा रहा है। माँ बच्चे को पीट रही है, बच्चे के पास ताक़त नहीं है, नहीं तो वो पलट कर माँ को पीट देता। इनका आपसी रिश्ता ही ऐसा है क्योंकि दोनों ही कुछ जानते नहीं, दोनों ही अभी बालक हैं।

एक अज्ञानी को आप एक पौधा भी दे दीजिए कि इसे बड़ा कर दो, उससे वो न बड़ा हो। मनुष्य का शिशु तो बड़ी संवेदनशील वस्तु होती है, प्राणवान वस्तु होती है। अज्ञानी को तो आप प्राणहीन वस्तु भी दे दीजिए, तो वो उसका भी बंटाधार कर दे। आप समझ रहे हैं कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, एक इंसान की औलाद को जन्म देकर उसका पालन-पोषण करके, परवरिश करके, उसको एक सशक्त चैतन्य मनुष्य बनाना। कितनी बड़ी बात, कितनी भारी ज़िम्मेदारी होती है। और यहाँ 20, 22, 24 साल वाली, जिन्होंने जीवन में न कोई पढ़ाई की, न कुछ समझा, न कुछ जाना, वो धड़ल्ले से बेबी बूमिंग कर रही हैं।

और मुझ पर कुपित न हों। मुझे मालूम है, अभी कहा ही कि बहुत बार ये सब कुछ अज्ञान में, दबाव में होता है। बस आसपास का चाल-चलन देखकर होता है। घर वालों के धक्के खाकर होता है, कि “अरे बेटा, शादी के चार महीने बीत गए, अभी तक आपने बच्चा नहीं पैदा किया।”

सिर्फ़ थप्पड़ नहीं मारे जाते, अज्ञान में हम बच्चे की जान ले लेते हैं।

पशु की जान बस उसके शरीर में होती है। इंसान की जान तो अंतःकरण में होती है न। जो इंसान भीतरी तौर पर विकसित नहीं किया गया माँ-बाप के द्वारा, उसकी तो जान ही ले ली गई। अब वो भले ही खड़ा हो जाए 6 फुट का हो कर के, तो भी उसको मुर्दा ही मानो। जानवर अपनी पूरी लंबाई-चौड़ाई हासिल कर ले, तो हम कह देते हैं बढ़िया निकल आया। इंसान को हम थोड़ी कह देंगे बढ़िया निकल आया, सिर्फ़ इसलिए कि 6 फुट का हो गया है। उसमें प्राण भरने वाला, उसमें ज्ञान सींचने वाला कोई होना चाहिए घर में या घर से बाहर, कोई नहीं होता तो 6 फुट का होकर भी वो भीतर से प्राणहीन ही रहता है।

और किसी को प्राणहीन कर देना, मुझे बताइए हत्या है कि नहीं? प्राणवान को आप प्राणहीन कर दें, तो इसको हम कहते हैं हत्या करी। और जो बच्चा संभावित रूप से प्राणवान हो सकता था, उसको आपने प्राणहीन कर दिया, तो इसे क्या कहें? खून बहता दिखाई नहीं देता, तो किसी को सजा नहीं दी जाती।

पशुओं के बाद, अगर इंसान ने सबसे ज़्यादा किसी के साथ अत्याचार किया है, तो शिशुओं के साथ।

और दोनों में एक साझी बात है कि दोनों दुर्बल, आश्रित, कमजोर हैं। पशु और फिर शिशु, दोनों ही बेचारे कुछ कर नहीं सकते। तो हमने उनका इतना शोषण किया, इतना शोषण किया। उसकी माँ है, चिबिल्ली बिल्कुल न कुछ उसको अनुभव, न ज्ञान, न जानती, न समझती। वो उसको ले के घूम रही है, और घर में तमाम तरीक़े के तत्व हैं। सब अपने-अपने चौधरी बने हुए हैं। ख़ासकर संयुक्त परिवार है तो वहाँ चाचा, ताऊ, फूफी, मामी, मौसी, बुआ सब लगे हुए हैं कि हम भी कुछ हैं। सब अथॉरिटी फिगर हैं घर के अंदर और सब चढ़े बैठे हैं बच्चे पर, और उस पर अपने-अपने प्रभाव डाल रहे हैं। इससे बड़ा अत्याचार क्या होगा।

दुनिया भर के अज्ञानियों को मौका मिला हुआ है बच्चे के ऊपर चढ़ बैठने का। बच्चों की मार पिटाई होती है, इसके बड़े घातक परिणाम होते हैं, साइकोलॉजिकल और न्यूरोलॉजिकल दोनों तलों पर। बच्चे का व्यक्तित्व हमेशा के लिए कुंठित हो सकता है, उसकी जिज्ञासा मर जाएगी, वो सवाल नहीं पूछ पाएगा। या फिर वो हिंसक, आक्रामक हो जाएगा कि मैं पिटा था, अब औरों को पीटूँगा। एक सहज, शांत, निडर, करुण व्यक्तित्व बनकर नहीं उभर पाएगा वो। अगर बच्चा घर में पिट रहा है, तो या तो दब्बू बन जाएगा या खूँख़ार। वही हम देखते हैं अपने देशवासियों की आम स्थिति में ज़्यादातर दब्बू हैं, कुछ खूँख़ार हैं जो दब्बुओं को दबाकर चलते हैं।

बड़े होकर बड़ी से बड़ी मनोवैज्ञानिक कुंठाएँ होती हैं। फिर जो उच्च कोटि के साइकेट्रिस्ट होते हैं, जब वो केस स्टडीज़ में जाते हैं कि चल क्या रहा है और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करते हैं, कि लाओ क्या हुआ था, मुझे समझने दो कि क्या हुई है बात। तो ज़्यादातर जो भीतर कॉम्प्लेक्सेस होते हैं, उनकी जड़ जाकर के बचपन में निकलती है, कि इसके साथ बचपन में ऐसा हुआ था और खूब हुआ था। तो इसका अभी चल रहा है ऐसा।

अब तो ये जानी बात है कि बच्चे का व्यक्तित्व का निर्धारण बहुत हद तक सात वर्ष तक हो जाता है। जो बुनियाद के पत्थर हैं, वो रख दिए जाते हैं सात साल की उम्र तक। उसके बाद आगे इमारत के रंग, रोगन, कमरे, नक्शा, ढाँचा अलग हो सकता है, अनुभवों के अनुसार, पर बुनियाद तैयार हो जाती है। और सात साल की उम्र तक बच्चा अगर पिट रहा है, तो वो पिटा हुआ जीवन ही जिएगा। जब घर वाले बच्चों को पीट रहे हों, तो आप वो दृश्य देखिएगा। काफ़ी घोर हिंसा होती है, वो चिल्लाना, वो थप्पड़ों की आवाज, कई बार लातें भी पड़ती हैं, कई बार बेल्ट भी चलती है। कई बार माँ होती हैं तो वो कुछ उठा कर बेलन, तसला, छन्नी, कढ़ाई कुछ भी मार देती है।

एक दूसरी दिशा से इसे समझते हैं। मारने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? मैं समझता हूँ कि बच्चे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, जो बहुत परेशान कर रहा है। आप उसके व्यवहार में परिवर्तन चाहते हो, यही चाहते हो। आप माँ-बाप हो और बच्चा घर में ऐसा व्यवहार कर रहा है, जो गड़बड़ है। पढ़ाई नहीं कर रहा, खाना नहीं खा रहा, खाना फेंक रहा है या अपने खिलौने तोड़ रहा है, या बाहर कुछ गड़बड़ कर रहा है, तो तभी तो आप परेशान हो। आप माँ-बाप हो, आप परेशान हो बच्चे के व्यवहार से। अब व्यवहार बदलने के लिए दो बातें हो सकती हैं, या तो उसको जानवर समझो या उसको इंसान समझो।

जानवर क्या होता है? ग़ौर से समझिएगा। जानवर क्या होता है? देह मात्र। जो देह मात्र है, वो पशु है। उसके पास कोई ज्ञान नहीं है। उसके पास बस शरीर है। शरीर है और शरीर से उठती हुई उत्तेजनाएँ हैं, शरीर से उठती हुई भावनाएँ हैं। ये सब जिसके पास होता है, वो जानवर होता है।

और मनुष्य वो होता है, जिसके पास देह और भावनाओं से आगे, जिसके पास ज्ञान होता है, चेतना होती है, वो मनुष्य होता है। आप अगर उसको पीट रहे हो, इसका मतलब आप उसको मनुष्य नहीं मान रहे। क्योंकि चेतना को परिवर्तित करने के लिए तो बात करनी पड़ती है। फिर समझते हैं, बच्चे का व्यवहार ही तो बदलना चाहते हो न आप, तो व्यवहार तब भी बदल जाएगा अगर बच्चे की आप चेतना बदल दो। कि नहीं बदलेगा?

हाँ, पशु के पास कोई ख़ास चेतना होती नहीं। तो अगर आपको उसका व्यवहार बदलना है, तो आपको उसके शरीर के साथ ही कुछ खेल खेलना पड़ता है। आपके पास कुत्ता है, आप उसे कोई व्यवहार सिखाना चाहते हो, तो आप उसे कुछ खाने-पीने का देते हो, तो वो उसी तरह का व्यवहार करने लगता है। है न? या कि सर्कस में जानवरों को पीटते हैं, उनको कुछ करतब सिखाने के लिए। पशु का व्यवहार बदलने का और कोई तरीक़ा नहीं है। उसको शरीर से संबंधित ही कुछ आपको या तो लालच देना पड़ेगा या दंड देना पड़ेगा। तो पशु का व्यवहार बदलेगा, क्योंकि पशु शरीर मात्र है।

पर मनुष्य के पास चेतना भी है। आप बच्चे का व्यवहार, बच्चे की चेतना को बदल कर क्यों नहीं बदल पा रहे? क्योंकि आप ख़ुद पशु हो गए। हो गए आप माँ-बाप पर, आप ख़ुद पशु हो। तो आप एक ही तरीक़ा जानते हो, देह का। उसी देह के तरीक़े से आपने बच्चा जन दिया है। आगे भी आप देह का तरीक़ा ही जानते हो कि इसकी पिटाई लगा दो या फिर इसको लालच दे दो। ये तरीक़े तो जानवरों के साथ अपनाए जाते हैं, इंसानों के साथ ये तरीक़े अपनाने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। और पड़े भी तो एकदम अंत में पड़े कि जब पॉइंट ऑफ नो रिटर्न आ जाए किसीका, तब उस पर शारीरिक तरीक़े लगाए जाते हैं। कि अब ये ख़ुद ही इंकार कर रहा है कि इसे नहीं बदलना है, तब हम कहते हैं कि इसकी चेतना अब अड्ड चुकी है, ये नहीं बदलेगी। तो अब इस पर सिर्फ़ कोई शरीरिक विधि ही काम कर सकती है।

पर बच्चा तो पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर नहीं पहुँचा गया है न। लेकिन चूँकि आप सचेत नहीं हो तो इसलिए आपको बच्चे की चेतना को उठाना आता नहीं है। बच्चे का व्यवहार बदल जाएगा, आप उससे बात करो न। आपको बात करनी लेकिन आती नहीं। क्यों? क्योंकि आपने भी ज़िंदगी भर किसी ढंग के आदमी की बात सुनी नहीं। आपने अच्छी किताबें पढ़ी नहीं। आप अच्छे लोगों की संगत में बैठे नहीं। तो आपको पता ही नहीं कि अच्छी बात का कितना गहरा प्रभाव हो सकता है।

आपको बस ये पता है कि बात नहीं, लात काम करती है। तो आप लात लगाते रहते हो अपने बच्चों को। बात भी तो काम कर सकती है, बशर्ते आपको बात करना आता हो। “बेटा, तुम अपने खिलौने तोड़ रहे हो, ये बात गलत है। आओ मेरे साथ बैठो, थोड़ा समझते हैं कि हम क्या कर सकते हैं।” इन शब्दों को दोहराने की ज़रूरत नहीं है, पर जैसा भी आपका घर का माहौल हो, उसके अनुसार इसी भाव में बात क्यों नहीं हो सकती है? कि “जो तुम कर रहे हो, ये ठीक नहीं है। आओ बैठो, समझते हैं कि क्या कर सकते हैं हम।” और उसी के मुँह से निकलवाइए, “बताओ, क्या तुम्हें ये ठीक लग रहा है? नहीं ठीक लग रहा, तो बताओ कैसे बदले? कहाँ पर क्या गड़बड़ हो जा रही है? और मैं तुम्हारी कैसे मदद करूँ कि ये चीज़ बदल जाए। मैं पूरी मदद करने के लिए तैयार हूँ बताओ, कैसे मदद करूँ तुम्हारी।”

ये थोड़ी कि बच्चे ने खिलौना तोड़ा, आपने बच्चा तोड़ दिया। और आपको उसको कोई दंड देना भी है, तो ये पहले से बताकर रखिए, ताकि ये बात उसको न्यायसंगत लगे। “आपने अगर 8:00 बजे तक भी ये किताब पूरी नहीं करी या स्कूल का काम नहीं करा, तो आप 8:00 बजे जाएँगे और पूरी सोसाइटी के दो चक्कर लगाकर आएँगे। ठीक है न? हाँ ठीक है अभी 4:00 बज रहा है।” तो ठीक है, चलिए इसमें आप दे रहे हो उसे शारीरिक दंड, पर कम से कम उसको इसमें हिंसा नहीं दिखाई देगी और अन्याय नहीं दिखाई देगा।

आपने पहले ही बोल दिया है कि 8:00 बजे तक तुमने काम पूरा नहीं किया तो जाओगे और दो चक्कर पूरी सोसाइटी का लगाओगे, फिर हाफ्ते हुए यहाँ पर आना। तो ठीक है, अब ठीक है। इसकी भी नौबत आनी नहीं चाहिए, पर नौबत आए भी कि उसे आपको शारीरिक रूप से ही कुछ दंड देना है तो उसको ये नहीं लगना चाहिए कि हिंसा हुई है, अन्याय हुआ है। उसे स्पष्ट होना चाहिए कि बात क्या है।

यहाँ तो हालत ये रहती है घरों में कि बच्चे ने कई बार कुछ नहीं भी किया हो। माँ को सास ने रगड़ दिया तो माँ ने आकर बच्चे को रगड़ दिया और बच्चा सोच रहा है, मैंने क्या किया है? उसने कुछ नहीं किया। पर उसने एक सीख ले ली है, किसी को किसी भी बात पर रगड़ा जा सकता है। छोटी मछली को बड़ी मछली खाती है, मैं जैसे-जैसे बड़ा होता जाऊँगा, छोटियों को निगलता जाऊँगा। तुम बड़े बच्चे हो छ: साल वाले को जाकर रगड़ दो, वो दो साल वाली छोटी बहन को जाकर रगड़ देगा।

एक और पहलू है बहुत सारे बच्चों के व्यवहार जो आपको नापसंद होते हैं और जिसके लिए आप उसको दंडित करना चाहते हैं, वो व्यवहार उसने आपसे ही सीखे होते हैं। आप कहते हो, “छी, कितना चुगलखोर हो गया है! अभी न मेरी सारी बातें जाकर ये मदर-इन-लॉ को बताया। इसने मेरी चुगली करी सास के सामने।” पटाक!

और देवी जी, आप जो फोन पर अपनी सास की चुगली करती हैं अपनी माँ के सामने, वो बैठकर वहीं सुन रहा होता है। उसने आपसे ही सीखा है। चुगली बाँचना, झूठ बोलना भी उसने आपसे ही सीखा है। सौ तरीक़े के भावनात्मक प्रपंच करना भी उसने आपसे ही सीखा है। तो आप करें तो बढ़िया, और वो करें तो?

बच्चे को शिक्षा चाहिए, बिल्कुल चाहिए। और बच्चे का जो प्राकृतिक व्यवहार है, हम बिल्कुल समझते हैं कि उसको बदलाव की ज़रूरत होती है। उसको सिखाओगे नहीं, उठाओगे नहीं, उसका व्यवहार बदलोगे नहीं, तो फिर माँ-बाप किस काम के? बिल्कुल ये काम करना है। लेकिन उस काम को करने की आपमें पात्रता तो होनी चाहिए न। हम कहते हैं कि जितनी प्रजातियाँ हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि होती है। दंभ की बात है, पर हम कहते ऐसे ही हैं। तो चलो मान लिया, सबसे सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि ही है, तो उस सर्वश्रेष्ठ प्रजाति का आपको एक जीव मिल गया है आपकी गोद में। आपने कभी अपने आप से पूछा कि आपमें योग्यता है उस जीव का पालन-पोषण करने की? आपने पूछा कभी ये? या आपको लगा कि जैसे गाय-भैंस सब बच्चा-बछड़ा, पड़वा जन्म देती हैं और वो बड़े भी हो जाते हैं, वैसे ही आपका बच्चा भी बड़ा हो जाएगा?

बहुत घरों में तर्क चलता है, ख़ासकर जब और ज़्यादा बच्चे पैदा करने की बात आती है। कहते हैं “अरे, आने दो, सब पल बड़ जाते हैं। देखो मुझको और तुम्हारे दादाजी को तो पता भी नहीं चला कि हमने कब 12 पैदा कर दिए। हमें पता भी नहीं चलता था, हो जाता था। पर तुम सब बड़े हो गए न, तो ऐसे ही बस हो जाता है, सब पल बड़ जाते हैं।”

नहीं! सब पल बढ़ जाते हैं पशुओं में। मनुष्यों में बच्चे को बड़ा करना एक प्रोजेक्ट होता है, एक भारी-भारी ज़िम्मेदारी का काम होता है। और वो ज़िम्मेदारी उठाने के लायक नहीं हो तो बच्चा मत पैदा करो।

दुनिया की सारी समस्या उन बड़ों के कारण है, जो कभी बच्चे थे ऐसे माँ-बापों के, जिनको बच्चे पालना नहीं आया। हम कहते हैं न, “अरे दुनिया कैसी है लोग ख़राब हैं।” ये जितने ख़राब लोग हैं, सबको ही कहते हो सब ख़राब हैं। “99% लोग चोर हैं, भ्रष्ट हैं।” यही कहते हैं न हम? तो ये 99% लोग कभी बच्चे थे। तो अगर ये बर्बाद हैं आज के लोग, तो इसका श्रेय इनके माँ-बाप को जाता है, जो ख़ुद बर्बाद थे पर बच्चा ज़रूर पैदा कर दिया।

और पहले एक व्यवस्था चलती थी। उस व्यवस्था में पूरा समाज प्रतिभागी नहीं होता था, पर कम से कम कुछ लोग उसमें रहते थे। कि माँ-बाप समझते थे कि शरीर से हमने जन्म दे दिया है, पर हम ऐसे नहीं हैं कि हम एक चैतन्य वयस्क स्त्री या पुरुष खड़ा कर पाएँ। तो वो उसको ले जाकर गुरु को दे आते थे, घर से बहुत दूर। और 25 साल तक वो बच्चा गुरु के पास ही रहता था। माँ-बाप, घर-परिवार, इन सबके संस्कारों से एकदम दूर। कि घर का कोई प्रभाव, कोई छाया बच्चे पर नहीं पड़ेगी। बच्चा अभी उसके साथ है, उसकी शरण में है जो बच्चे को बड़ा करना जानता है। और जब 25 साल का हो जाएगा तो फिर वो गुरु से विदाई लेगा और अपने घर वापस आ जाएगा। इसमें मुझे थोड़ी विनम्रता दिखाई देती है, कि माँ-बाप ये स्वीकार करते थे कि हम नहीं इसको बड़ा कर पाएँगे। इसको दे दो किसी दूसरे को, जिसको कुछ ज्ञान हो, कुछ समझ हो।

तो अभी तो चलता है, माँ-बाप ही गुरु हैं, भगवान हैं। “गुरु तो गुरु, भगवान हैं, माँ-बाप ही भगवान हैं। हम ही बता रहे हैं। हम बता रहे हैं न, वो करो तुम।” दुनिया भर की माँ-बाप की कुंठाएँ, इनको ज़िंदगी में कोई इज़्ज़त देने वाला नहीं, कोई इन्हें सुनने वाला नहीं, कोई इन्हें गुनने वाला नहीं। तो ले देकर घर में एक नन्हीं-सी जान इनको मिलती है, जाकर उसके ऊपर चढ़ जाते हैं। दिन-भर जाकर ये दुनिया की मालिश करते हैं और लोगों के तलवे चाटते हैं। और जो सारी कुंठा और गुबार है, वो जाकर किसके ऊपर फोड़ देते हैं? बच्चे के ऊपर। कि किसी पर हमारा बस नहीं चलता, पर ये जो चार साल का है, इस पर तो बस चलता है न? इसको दबाकर रखेंगे। वो फिर दब ही जाता है।

“हमारी बात मानो बस” ये बहुत है। हमारे संस्कारों में, हमारी लोकधर्मिता में यह खूब हो गया है, “हमारी बात मानो,” नहीं मानोगे तो थप्पड़ मारेंगे। तुम्हारी बात मानेगा तो सवाल कैसे करेगा? देश में कहाँ से वैज्ञानिक पैदा होंगे? बिना प्रश्न किए तो कोई समाज, समुदाय, राष्ट्र, ये पूरा विश्व — कोई भी किसी दिशा में आगे नहीं बढ़ सकता। हमारे यहाँ तो सवाल करे तो थप्पड़ दे दो उसको। ख़ासकर अगर उसने कोई कचोटने वाला सवाल कर लिया है, या फिर सवाल का झूठ-मूठ का कोई जवाब दे दो ऐसे ही। और उसकी बुद्धि ख़राब कर दी, फिर वो कहे आपने जो जवाब दिया है वो ठीक नहीं है, तो उसको बोलो, “तुझे पाप लगेगा, ऐसे सवाल मत पूछा कर। ऐसे सवाल पूछना पाप होता है।”

अब इसमें कोई ताज्जुब है कि चाहे कला हो या विज्ञान हो, हम हर जगह पिछड़े ही नजर आते हैं? मेरे लिए आप सब भी बच्चे ही जैसे हो। हो न? तो क्या करा करूँ? बेल्ट लेकर आया करूँ सत्र में? हंटर? जैसे आप अपने बच्चों को बेहतर बनाना चाहते हो, मैं आपको बेहतर बनाना चाहता हूँ। ठीक है आपकी उम्र मुझसे ज़्यादा होगी, पर एक तल पर मैं उत्तरदायी हूँ आपको उठाने के लिए। तो बताओ, क्या करूँ?

फिर तो हमें ज़ूम नहीं बूम चाहिए। बिल्कुल हमें एक्टिव ऐप चाहिए, थ्री डायमेंशनल। ऐप पर क्लिक करो और सीधे वहाँ से ऐसे मुक्का निकले। नोटिफिकेशंस नहीं आने चाहिए, गालियाँ। खुला मैदान होना चाहिए, वहाँ पर सब संस्था के लोग लगे हुए हैं, सब हंटर लेकर के। और सब प्रतिभागी आते जा रहे हैं और दनादन हंटर चल रहे हैं। “ये देखो, इनके परीक्षा में 50% आए हैं, पटापट हंटर पड़ रहे हैं उनको।” क्यों? तुम्हारे बच्चों के कम नंबर आते हैं तो तुम अपने बच्चों को पीटते हो। गीता परीक्षा में तुम्हारे कम नंबर आए हैं, तुम्हें संस्था पीटेगी।

तुम्हारे बच्चे स्कूल में नालायकी करते हैं, सत्र नहीं सुनते। तुमने कितने सत्र सुने हैं? बताओ, कितने परसेंट अटेंडेंस है तुम्हारी? हम तुम्हें क्यों न पीटें? स्वैग से करेंगे सबका स्वागत।

जब ये नौबत आ जाए कि अब हाथ उठाना ही पड़ेगा तो दो बातें मानिएगा — या तो जिस पर हाथ उठाना पड़ रहा है वो पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर पहुँच गया है। पॉइंट ऑफ नो रिटर्न जानते हैं न? जहाँ चेतना अब इतनी गिर गई है और गिरने के बाद भी इतना हर्ट कर चुकी है कि अब मुझे उठना ही नहीं है, कि अब कुछ हो नहीं सकता। या फिर हाथ उठाने की घटना को अपनी नाकामी की तरह लीजिएगा, कि मैं इसको समझा नहीं पाया, इसलिए मुझे शारीरिक दंड देना पड़ रहा है। उसको अपनी विफलता मानिएगा।

आपको कोई एकदम ही दमित, कुंठित व्यक्तित्व दिखाई दे तो उसको ग़ौर से देखिएगा कहीं भी बाजार में, सड़क में कहीं भी दिखाई दे, उसको ग़ौर से देखिएगा। और अपने आप से पूछिएगा, इसकी परवरिश कैसी हुई होगी? और तब आपमें आक्रोश उठेगा ऐसे अभिभावकों के लिए, जिन्हें पालना नहीं आता पर पैदा झट से कर देते हैं।

उन्हीं अभिभावकों की नासमझी, बल्कि बदतमीजी का नतीजा है ये सारी जनसंख्या जो आपको दिखाई देती है। अशिक्षित, कुपोषित, पूर्वाग्रहों से भरी हुई, कभी दब्बू, कभी आक्रामक, कभी हिंसक, अंधविश्वास से ग्रस्त, ये सब इनके माँ-बाप की परवरिश का नतीजा है। सोचिए अब कि कितना बड़ा अपराध है, परवरिश की क्षमता रखे बिना पैदा कर देना।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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