आपको खुद एक बाप जैसा होना पड़ेगा। बात इसकी नहीं है कि उसको बाप ने सिखाया क्या, बात इसकी है कि बाप बाप जैसा हुआ कि नहीं हुआ, सिखाना तो पड़ता ही नहीं है। और हमारे साथ क्या विडंबना है कि हम बाप जैसे होते नहीं, पर बेटे को सिखाने की होड़ में रहते हैं। कुछ भी नहीं सिखाना है, इतना सा भी नहीं सिखाना है; सिखा देंगे तो गड़बड़ हो जाएगी। कभी वो अपनी स्वेच्छा से कुछ पूछने आ गया तो आपने बता दिया वो अच्छी बात है। सिखाने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, मौजूद रहिए, उपस्थित रहिए, एक साक्षी की तरह रहिए, देखते रहिए।
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प्रश्नकर्ता: सर, सादर नमस्ते! सर, मेरा प्रश्न मेरे और मेरे बेटे से जुड़ा हुआ है। अपनी समझ से मेरे उसके प्रति तीन कर्तव्य हैं — एक तो उसकी भौतिक पढ़ाई के लिए धन की व्यवस्था करना, रहने के लिए छोटा मकान, फिर तीसरी बात आती है उसके विवाह की। आपने भी कहा था कि ये तीन चीज़ें आपको तोड़ देती हैं — कामवासना, इज़्ज़त और पैसा। सर, मेरा बेटा अभी दो साल का है। एक पिता होने के नाते मैं अपने आप को और अपने बेटे को क्या शिक्षा दूँ जिससे मैं और मेरा बेटा जीवन में सही फ़ैसले ले सकें? और एक पिता का अपने बेटे के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देखिए, मैंने अपने जीवन में जो निर्णय लिए, वो एक दृष्टि से सब बहुत उल्टे-पुल्टे थे। अब ले लिए हैं तो फिर भी ऐसा लगता है कि हाँ, ले लिए, वरना अगर आप उस समय में लौटे जब वो निर्णय लिए जा रहे होते हैं, जब प्रक्रिया चल रही होती है, तो उस समय पर वो निर्णय बड़े खतरनाक, बड़े नागवार लगते हैं। कोई अपरिचित भी वैसा निर्णय ले रहा हो तो आप उसको रोकना चाहेंगे। और मैं वैसे निर्णय एक-के-बाद एक कई लेता चला गया — उसमें एक निर्णय विवाह संबंधित भी था।
मेरे पिताजी ने मुझे कभी न इस तरफ़ का कुछ बोला, न उस तरफ़ का कुछ बोला। परसों उनका जन्मदिन है, हम एक स्कूल में कुछ करने जा रहे हैं। मुझे एक वाक्य याद नहीं आता जब मेरी उनसे विवाह को लेकर कोई चर्चा हुई हो कभी। उन्होंने मुझे सलाह नहीं दी, उन्होंने मुझे किताबें दे दी थीं — और वो भी उन्होंने दी नहीं थीं, उन्होंने रख दी थीं कि मुझे दिखती रहें। अपने हाथ से भी ऐसे थमाने (देने का संकेत करते हुए) तो शायद वो कभी भी नहीं आए। ऐसी जगह रख देते थे, लाइब्रेरी थी और ला-लाकर रखते रहते थे, मुझे दिख जाती थीं, मैं खुद ही उठा लेता था। और मैंने नहीं उठाई तो मुझसे कहते नहीं थे कि पढ़ो। किसी भी चीज़ का ज़ोर डालने कभी आए ही नहीं, ऐसे जैसे हों ही नहीं, अनुपस्थित।




