क्या महिलाएँ बुद्धि का कम इस्तेमाल करती हैं? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

प्रश्न: फरीदाबाद से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, महिला हैं। कह रही हैं कि "मैंने देखा भी है कि घर-परिवार में महिलाओं को बड़े फैसले लेने या राय देने से रोका जाता है और उनको इतना महत्त्व भी नहीं दिया जाता हैं, बड़े मसलों में। पूछ रही हैं कि क्या वाकई महिलाएँ अपना बुद्धि का कम इस्तेमाल करती हैं?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जो बच्चा पैदा होता है, चाहे वो लड़का हो, चाहे लड़की, उसके पास कुछ जन्मगत गुण होते हैं। ठीक है?
शिक्षा, परवरिश, इनका उद्देश्य ये होता है कि आप जिस तरह से पैदा हुए हैं, उसको ध्यान में रखते हुए आपको ऐसे संस्कार दिए जाएँ कि आप बोध की ओर, ऊँचाई की ओर फ़िर मुक्ति की ओर बढ़ सकें। ऐसा हमारे यहाँ होता नहीं है। जो बच्ची पैदा होती है, उसका एक बच्चे से, एक लड़के से, बालक से, ज़रा प्राकृतिक अलगाव होता है, वो दोनों अलग–अलग होते हैं। ये बातें सब माएँ जानती हैं। एक लड़की पैदा हुई है, एक लड़का पैदा हुआ है, उनके व्यवहार में बचपन से ही अंतर होता है, बल्कि गर्भ से ही अंतर होता है। ये अंतर अपने-आप में ना अच्छी बात है, ना बुरी बात है। बात ये है कि उस बच्ची को एक बहुत सही तरह की शिक्षा दी जानी चाहिए थी।
देखिये, बुद्धि जीवन का उद्देश्य नहीं है, जीवन का उद्देश्य मुक्ति है। लेकिन ये जो बच्ची है, इसको बहुत देह केंद्रित वातावरण मिलता है और शिक्षा मिलती है। इसका नतीजा ये होता है कि उसमें भावनाओं का उबार आ जाता हैं और बुद्धि उसकी कुंद हो जाती है। तो व्यवहारिक तौर पर हमें यह देखने को मिलता है, विशेषकर भारत में, विदेशों में भी, पर भारत में विशेषकर कि महिलाएँ बहुत भावुक होती हैं, बहुत देह-केंद्रित होती हैं और चेतना का और बुद्धि का अपेक्षाकृत कम इस्तेमाल करती हैं। ऐसा होना अनिवार्य बिलकुल नहीं है, ऐसा होना बड़े दुर्भाग्य की बात है। ऐसा नहीं है कि कोई महिला ऐसी हो नहीं सकती या बहुत सारी, बल्कि बहुसंख्यक महिलाएँ ऐसी हो नहीं सकतीं जो मुक्ति की ओर उतनी ही गति से बढ़ रही हों, उतने ही बोध में स्थापित हो जितने पुरुष। बल्कि पुरुषों से आगे ही निकल गईं हो मुक्ति की दिशा में, ऐसा बिलकुल संभव है, ऐसा होना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है।



