पृथ्वी से मनुष्य विलुप्त हो जाएँ? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को कोटि-कोटि प्रणाम। पिछले दो सालों से आपको सुन रहा हूँ। मेरा सवाल कुछ इस प्रकार से था कि अभी हम लोग देख रहे हैं कि तकनीकी बहुत बढ़ गई है। हम बहुत चरम पर हैं अभी मनुष्यता, और आध्यात्मिक रूप से भी हमारे इर्द-गिर्द बहुत प्रपंच हैं। ख़ास करके हमारे उत्तराखंड में भी; देवभूमि हम इसे कहते हैं, पर मैं देखता हूँ घर में, समाज में और हर जगह बहुत पाखंड है। ख़ुद मैं भी इस चीज़ का शिकार हुआ हूँ। हमारा जो मनुष्य जीवन है एक अभिशप्त जीवन है। हमारा जीवन ही ग़लती है। वो इस ओर भी इशारा करता है कि क्या पृथ्वी से मनुष्यता को विदा हो जाना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: आपने तीन-चार बातें कहीं, उनको एक-एक करके लेंगे। पहली बात का उत्तर दे लूँ तो दूसरी-तीसरी याद दिलाइएगा। आपने देवभूमि उत्तराखंड की बात करी, आपने इंसान के पैदा होने की ग़लती की बात करी। और एक-दो बातें और।
तो ये वास्तव में तीन या चार प्रश्न हैं, इनको याद दिलाइएगा। पहले मैं यहीं से शुरू कर देता हूँ कि अगर इंसान का पैदा होना ही ग़लती है तो क्या पृथ्वी से मनुष्य जाति को विलुप्त हो जाना चाहिए। समझिएगा। जो पैदा नहीं हुए हैं उनको अनाप-शनाप पैदा मत करो, यह ग़लती होगी। जो अभी अस्तित्व में है ही नहीं उसे व्यर्थ ही अस्तित्व में मत लाओ, यह बहुत बड़ी ग़लती होगी। इस बात को एक आवश्यक नियम की तरह नहीं कह रहा। इस बात को मैं शर्तों के साथ कह रहा हूँ।
किसी जीव को दुनिया में लाने से पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि क्या आप उसे वाक़ई एक ऊँचा जीवन देने की स्थिति में हैं।
जीव को जन्म देना वैसा ही होना चाहिए जैसे कोई ऊँचा लेखक एक नयी किताब लिखे, जैसे कोई चित्रकार या शिल्पकार अपने एक नए उपक्रम, एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम शुरू करे। बहुत सोच-समझकर, बड़ी बारीकी से, बड़े बोध और विवेक के साथ; अन्यथा वह ग़लती होगा। तो मैं नहीं कह रहा हूँ कि बच्चे का जन्म लेना ही ग़लती है। ग़लती है अनाप-शनाप और अनियोजित, अविवेकी जन्म देना।



