पहली चीज़ जो मुझे मेरे पिता से मिली, वह है — किताबें। मुझे दुनिया भर की हर दिशा की किताबें मिलती रहीं। जब भीतरी विकास हो रहा था और दुनिया के प्रति एक दृष्टि विकसित हो रही थी, तो मैं उन किताबों का बहुत-बहुत महत्त्व पाता हूँ। दूसरी चीज़ जो मैंने उनसे सीख ली, वह थी — अथॉरिटी के सामने कभी न दबना। जब सच बोल रहे हो, तो डरने की ज़रूरत नहीं है। तीसरी चीज़ — मैंने उनसे चुप रहना सीखा। तब बोलो जब बोलने की ज़रूरत हो।
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आचार्य प्रशांत: श्री अवधेश नारायण त्रिपाठी जी। मेरे पापा उनका जन्मदिन है आज। तो मैं उनके लिए कुछ लेकर जाया करता था तो कुछ उपहार भेंट तोहफा तो उनके लिए जो है वो उनको तो कैसे दें? पुष्पांजलि हो गई कुछ क्यों ना फिर आप में बांट दें। और मैं आपको कोई उपहार देना चाहता हूँ तो मुझे लगता है सबसे अच्छा वही होगा जो मुझे उनसे मिला है। आप सब क्लास 8th से 12th के बीच के है ना?
श्रोतागण: हाँ।
आचार्य प्रशांत: तो बड़ा मज़ेदार और बड़ा संवेदनशील यह समय होता है। आठवीं से बारहवीं। मुझे अपना यह समय अच्छे से याद है और यह भी पता है कि मैं आज जहाँ भी हूँ, जैसा भी खड़ा हूँ, अच्छा बुरा उसमें वह जो 8 से 12th का समय था उसका बड़ा योगदान है। तो बहुत अच्छा है कि इस समय पर आप लोगों के साथ, इस सेंसिटिव समय पर आपका जो है, उस समय पर आप लोगों के साथ मैं वो बातें कह सकता हूँ जो मुझे लगता है मेरी ज़िन्दगी में बहुत अहम थी।
जब मिल रही थी उस वक़्त तो शायद पता भी नहीं था कि यह कितनी ज़रूरी चीजें हैं। पर आज मैं इस स्थिति में हूँ कि पीछे देखकर और ख़ुद को देखकर उसे पहचान सकता हूँ और फिर आपसे बाँट सकता हूँ। तो जो पहली चीज़ मेरे ध्यान में आती है जो मुझे मिली पापा से और आमतौर पर उतनी ज़्यादा बच्चों को मिलती नहीं है उनके अभिभावकों से, पैरेंट्स से वह है — किताबें। शुरुआत वहीं से करूँगा।




