प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे फादर का स्कूल है और उसमें मैंने अभी रिसेंटली लाइफ एजुकेशन नाम की एक क्लास स्टार्ट की है, जिसमें हम बच्चों को डॉक्यूमेंट्रीज और महापुरुषों की मतलब मूवीज जो हैं, वो दिखाते हैं।
तो मैंने ये सोचा है कि जैसे जो गीता है, उपनिषद् जो आपसे, आपकी किताबों से और आपके वीडियो सुनकर मुझे ज्ञान हुआ है, तो हम चाहते है कि बच्चों तक पहुँचे। तो मैं चाहता हूँ कि क्या इसका एक सिस्टेमेटिक प्रोसीजर हो?
कैसे हम उस चीज़ को सिस्टम तरीके से बच्चों तक पहुँचाए जिससे उसका बच्चों को फ़ायदा मिले और इसी के साथ मेरा एक और प्रश्न है आचार्य जी, जैसे अभी हमने लाइफ एजुकेशन क्लास में गीता और ये सारी चीजों को अभी नहीं सेलेक्ट कर पाए इसलिए कि जैसे स्कूल में और धर्म के भी बच्चे आते हैं।
तो पेरेंट्स (अभिभावक) की आपत्ति हो सकती है कि जैसे हमारे बच्चों को जो अदर (दूसरे) धर्म के हैं कि हमारे बच्चों को आप गीता पढ़ाकर उनको डायवर्ट करने का प्रयास कर रहे हो। इस तरीके की अगर मान लीजिए ऑब्जेक्शन आते हैं, तो कैसे हम डील करे? स्कूल किस तरीके से डील करे इसको?
आचार्य प्रशांत: देखिये, ज्ञान तो ज्ञान होता है। अगर आप सीधे यही कह रहे हैं इंपोर्टेंट स्क्रिप्चर्स ऑफ द वर्ल्ड, दुनिया के प्रमुख ग्रंथ। तो उसमें आप क्यों नहीं गीता को ला सकते हैं? पूरी गीता तो आप वैसे भी नहीं पढ़ा सकते, उपनिषद् भी आप कितने पढ़ाओगे, तो उनके जो प्रमुख श्लोक हैं, वो तो ला ही सकते हो और जो प्रमुख श्लोक होते हैं उनका सम्बन्ध दर्शन से होता है, वो




