सिर्फ़ उनके लिए जिन्हें अपने माँ-बाप पसंद नहीं || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक बेटे या बेटी का माँ-बाप के प्रति क्या ऋण होता है? मेरे पिता भ्रष्ट व्यक्ति हैं, मुझे पसंद नहीं हैं। लेकिन बार-बार यह ऋण चुकाने वाली बात मन पर हावी हो जाती है। कुछ कहें!
आचार्य प्रशांत: संतान का और माँ-बाप का रिश्ता दो तलों पर होता है। पहला तल है- शरीर का। आपको शरीर माँ-बाप से मिला है और इस रिश्ते में एक बात बिलकुल निर्णित रहती है, एकदम तय कि शरीर तो माँ-बाप से ही मिलेगा।
दूसरे तल पर जो रिश्ता होता है- वह चेतना का होता है। आपकी चेतना को कितनी स्पष्टता, कितनी सफ़ाई, कितनी ऊँचाई माँ-बाप से मिली, इस तल पर बात कुछ तय नहीं रहती। कुछ पक्का नहीं है कि माँ-बाप बच्चे को मानसिक तौर पर, चेतना के तल पर कितना सहयोग, कितनी सामर्थ्य, कितनी ऊँचाई दे पा रहे हैं।
इन्हीं दोनों तलों के योग से तय होता है कि मातृऋण-पितृऋण क्या है और कितना है।
शरीर के तल पर तो बात सीधी है, तयशुदा है। कोई भी बच्चा जन्म माँ-बाप से ही लेता है। जैसे उसको शरीर माँ-बाप से मिला है, जैसे उसे अपना भौतिक अस्तित्व माँ-बाप से मिला है, उसी तरीक़े से माँ-बाप को शारीरिक तल पर सेवा देना, सहयोग देना बच्चे की ज़िम्मेदारी है। बच्चे की भौतिक हस्ती ही माँ-बाप से आयी है, तो माँ-बाप की भौतिक ज़रूरतें पूरी करना संतान का दायित्व हुआ। इस दायित्व से पीछे नहीं हटा जा सकता। यह दायित्व निश्चित रूपेण है।
संतान बड़ी होती है, माँ-बाप तब तक प्रौढ़ हो रहे होते हैं, फिर वृद्ध हो जाते हैं। उनको भौतिक, शारीरिक, आर्थिक सहयोग की ज़रूरत पड़ने लग जाती है। संतान का दायित्व है कि उस तल पर उनको जितना सहयोग दे सकता है, दे। पर याद रखा जाए कि मैंने ज़रूरतों की बात करी है, माँगों की नहीं।



