आपके बच्चों को आपसे ठीक वही मिलेगा, जो आप हैं। जो चाहते हों कि उनके बच्चे निखर कर सामने आएँ, उन्हें सबसे पहले अपना उपचार करने की ज़रूरत है। बच्चे का भला चाहते हों, तो सर्वप्रथम अपना भला कीजिए। जैसे उसकी प्रगति उत्तरोत्तर है, वैसे ही आपकी प्रगति को भी उत्तरोत्तर होना होगा। जब भी बच्चे में समस्या होती है, तो उसका प्रथम कारण घर का माहौल होता है। घर अच्छा रखिए — घर में ईमानदारी की बात और प्रेम हो; हिंसा, कटुता और तमाम तरीकों के दुष्प्रभावों का आमंत्रण ना हो।
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प्रश्नकर्ता: पैरेंटिंग(परवरिश) को निपुणता से कैसे किया जाए? कभी-कभी हम चाहते भी हैं करना, पर हम कर नहीं पाते, क्योंकि बाहर की स्थितियाँ ऐसी होती हैं।
आचार्य प्रशांत: जो आपने बाहरी स्थितियों के बारे में कहा, वो बिल्कुल ठीक है। लेकिन निष्कर्ष दूसरा भी हो सकता है। आप यूँ ही किसी अपार्टमेंट के पास से गुज़र रहे होते हैं या किसी बाज़ार के बीच से गुज़र रहे होते हैं, वहाँ चका-चौंध होती है, वहाँ चारों तरफ रोशनी है, बहुत सारी बत्तियाँ जगमगा रही हैं, तो किसी विशेष बत्ती पर ध्यान जाता है क्या? किसी रोशनी पर ध्यान जाता है? क्यों नहीं जाता? क्योंकि हर तरफ रोशनी-ही-रोशनी है। ध्यान जाता ही नहीं न? आप कहते हो, साधारण-सी बात है। जहाँ इतनी रोशनियाँ हैं, वहाँ पर कोई एक रोशनी विशेष कैसे हो सकती है? कोई एक बल्ब, दिया, ख़ास कैसे हो सकता है?
अब ज़रा एक दूसरा दृश्य देखिए, कभी आप पहाड़ों पर गए होंगे, और रात में पहाड़ी मार्ग से यात्रा कर रहे होंगे, तो दिखाई पड़ता है कि सामने पहाड़ पसरा हुआ है, और उस पर सिर्फ दूर-दूर दो प्रकाश स्रोत दिखाई दे रहे हैं। ऐसा कभी हुआ है? घुप्प अँधेरा है, रातों में पहाड़ों में घुप्प अँधेरा हो जाता है। मान लीजिए चाँदनी रात नहीं है, और कोई दो रोशनियाँ दिखाई देती हैं। पूरा विस्तृत पहाड़ है, कालिमा और कोई दो जगह पर प्रकाश-स्रोत दिखाई दे रहा है। ऐसा होता है? कभी देखा है? तब उन दोनों रोशनियों पर नज़र जाती है कि नहीं जाती? आपकी आँख कहाँ जाकर ठहरती है? फैली हुई कालिमा पर, या उन टिमटिमाते बिंदुओं पर?




