अपने बच्चों का भला कैसे करें?

Acharya Prashant

21 min
1.5k reads
अपने बच्चों का भला कैसे करें?
आपके बच्चों को आपसे ठीक वही मिलेगा, जो आप हैं। जो चाहते हों कि उनके बच्चे निखर कर सामने आएँ, उन्हें सबसे पहले अपना उपचार करने की ज़रूरत है। बच्चे का भला चाहते हों, तो सर्वप्रथम अपना भला कीजिए। जैसे उसकी प्रगति उत्तरोत्तर है, वैसे ही आपकी प्रगति को भी उत्तरोत्तर होना होगा। जब भी बच्चे में समस्या होती है, तो उसका प्रथम कारण घर का माहौल होता है। घर अच्छा रखिए — घर में ईमानदारी की बात और प्रेम हो; हिंसा, कटुता और तमाम तरीकों के दुष्प्रभावों का आमंत्रण ना हो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: पैरेंटिंग(परवरिश) को निपुणता से कैसे किया जाए? कभी-कभी हम चाहते भी हैं करना, पर हम कर नहीं पाते, क्योंकि बाहर की स्थितियाँ ऐसी होती हैं।

आचार्य प्रशांत: जो आपने बाहरी स्थितियों के बारे में कहा, वो बिल्कुल ठीक है। लेकिन निष्कर्ष दूसरा भी हो सकता है। आप यूँ ही किसी अपार्टमेंट के पास से गुज़र रहे होते हैं या किसी बाज़ार के बीच से गुज़र रहे होते हैं, वहाँ चका-चौंध होती है, वहाँ चारों तरफ रोशनी है, बहुत सारी बत्तियाँ जगमगा रही हैं, तो किसी विशेष बत्ती पर ध्यान जाता है क्या? किसी रोशनी पर ध्यान जाता है? क्यों नहीं जाता? क्योंकि हर तरफ रोशनी-ही-रोशनी है। ध्यान जाता ही नहीं न? आप कहते हो, साधारण-सी बात है। जहाँ इतनी रोशनियाँ हैं, वहाँ पर कोई एक रोशनी विशेष कैसे हो सकती है? कोई एक बल्ब, दिया, ख़ास कैसे हो सकता है?

अब ज़रा एक दूसरा दृश्य देखिए, कभी आप पहाड़ों पर गए होंगे, और रात में पहाड़ी मार्ग से यात्रा कर रहे होंगे, तो दिखाई पड़ता है कि सामने पहाड़ पसरा हुआ है, और उस पर सिर्फ दूर-दूर दो प्रकाश स्रोत दिखाई दे रहे हैं। ऐसा कभी हुआ है? घुप्प अँधेरा है, रातों में पहाड़ों में घुप्प अँधेरा हो जाता है। मान लीजिए चाँदनी रात नहीं है, और कोई दो रोशनियाँ दिखाई देती हैं। पूरा विस्तृत पहाड़ है, कालिमा और कोई दो जगह पर प्रकाश-स्रोत दिखाई दे रहा है। ऐसा होता है? कभी देखा है? तब उन दोनों रोशनियों पर नज़र जाती है कि नहीं जाती? आपकी आँख कहाँ जाकर ठहरती है? फैली हुई कालिमा पर, या उन टिमटिमाते बिंदुओं पर?

प्रश्नकर्ता: जहाँ रोशनी है।

आचार्य प्रशांत: अब वही रोशनी तो बाज़ार में थी, तब वो महत्त्वपूर्ण क्यों नहीं लगी?

प्रश्नकर्ता: बहुत सारी रोशनियाँ थीं।

आचार्य प्रशांत: मतलब अँधेरा जितना घना होता है, रोशनी की क़ीमत उतनी ही ज़्यादा हो जाती है। हो जाती है न? तो बच्चों और परिवार में भी यही होना होता है। बच्चा भले ही ये देख रहा हो कि बाहर अँधेरा घना है पर अगर उसे भीतर उजाला दिखाई देगा, एक भी प्रकाशबिंदु दिखाई देगा; तो वो अब उस प्रकाशबिंदु की और इज़्ज़त करेगा, इसलिए क्योंकि बाहर अँधेरा घना है।

जैसे आप जब पहाड़ को देखते हो, तो उस छोटी-सी, टिमटिमाती हुई रोशनी की इज़्ज़त इसलिए करते हो, क्योंकि वो अँधेरे के बीचों-बीच है, कि इतने अँधेरे के होते हुए भी, एक रोशनी है, क्या बात है। वैसे ही जब आपका बच्चा ये देखेगा कि बाहर कितना अँधेरा है, लेकिन आप में फिर भी रोशनी है, तब वो आपकी और ज़्यादा इज़्ज़त करेगा। तो बाहर के अँधेरे को, आप प्रतिकूल परिस्थिति ना मानें। बाहर का अँधेरा आपकी रोशनी को, और ज़्यादा मुखर करके, प्रखर करके दिखा देगा। आप समझ रहे हैं?

कोई दिन भर झूठ में जीता हो, उसके बाद उसे मिल जाए कोई सच बोलने वाला, तो उस सच बोलने वाले की क़ीमत और ज़्यादा हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी? और वो जो एक व्यक्ति जो सच में है, वो दिन भर के झूठ पर भारी पड़ेगा या नहीं पड़ेगा? तो ये तो मौका है आपके पास, ये अवसर है आपके पास।

प्रश्नकर्ता: कभी-कभी ये परिस्थिति उल्टी हो जाती है। अब जैसे, मैं अगर अपनी बेटी को बोलूँ कि, "बेटा, आप ये काम ग़लत कर रहे हो," तो मैं माँ हूँ, मैं सच बोलूँगी। बाकी लोग बोल सकते हैं, "नहीं बेटा बिल्कुल सही कर रही हो।" तो वो मेरा सच बाकी के लोगों के कहने पर भारी हो जाएगा क्या? मेरी बेटी बोल रही है कि, "और किसी को तो नहीं है दिक़्क़त, आपको ही है बस।" तो यहाँ ये सच बिल्कुल नीचे हो गया।

आचार्य प्रशांत: रोशनी की परिभाषा ये है – कि जो आपको देखने में मदद करे, जिसके होने के कारण आप देख पाओ।

वो रोशनी किसी काम की नहीं, जो दावा तो करे होने का, पर जिससे किसी को देखने में मदद ना मिलती हो।

आप अपने-आपको रोशनी कहने के हक़दार सिर्फ़ तब हैं, जब आपके कारण जो आपके सम्पर्क में आए उसकी दृष्टि खुल जाए। इस ट्यूब-लाइट की क़ीमत तभी है न जब ये जले तो मुझे दिखाई दे? आप अगर अपने बच्चों के पास हैं लेकिन आपकी उपस्थिति की वजह से आपके बच्चे देखने में मदद नहीं पा रहे, तो आप अभी प्रकाशवान नहीं हैं। आप अभी स्वयं ही प्रकाश नहीं हैं, तो आप अँधेरे से कैसे लड़ेंगे? तो ये मत कहिए कि कई बार रोशनी अँधेरे से हार जाती है। ये कहिए कि अभी हमारी ही रोशनी प्रज्ज्वलित नहीं हुई है।

प्रश्नकर्ता: तो फिर उस रोशनी को कैसे प्रज्ज्वलित करें?

आचार्य: हाँ, वो अगला सवाल है। लेकिन उसके लिए पहले ये समझना पड़ेगा कि रोशनी का महत्त्व कितना है।

देखिए अँधेरा जीतता ही तब है, जब आप पहले रोशनी का तिरस्कार करते हो। रोशनी तो स्वभाव है, वो अपने-आप आ जाएगी। लेकिन उसके लिए पहले उसका महत्त्व समझना होगा और सम्मान करना होगा। हमें ग़ौर से देखना होगा कि घना अँधेरा कितना भी बड़ा हो, और कितना भी हावी होता दिखे, और प्रभावशाली-बलशाली दिखे, लेकिन ज़रा-सी रोशनी उस पर भारी पड़ती है। पड़ती है कि नहीं पड़ती है?

अब यहाँ पर भी आप देखिए, तो हर जगह तो प्रकाश-स्रोत नहीं है न? वो ज़रा-सा एक प्रकाश-स्रोत है और यहाँ ये दो हैं इन दोनों को भी बंद कर दीजिए, तो इस कमरे का आकार देखिए, और उस बत्ती का आकार देखिए। लेकिन वो भारी पड़ता है अँधेरे पर। यही सच की ताक़त होती है कि वो छोटा-सा होकर भी जीत जाता है। इसलिए कहते हैं, “सत्यमेव जयते,” कि वो छोटा होगा तब भी जीतेगा, अँधेरा बड़ा होगा तो भी हारेगा। पहले वो इज़्ज़त हमारे दिल में आए न सच्चाई के लिए। जब वो इज़्ज़त हमारे दिल में आएगी सच्चाई के लिए, तो हम रोशनी बनते हैं, फिर हमारे बच्चे भी हमारे माध्यम से देख पाते हैं। उनकी दृष्टि खुलती है।

पहले हमारे जीवन में वो इज़्ज़त उतरे, और वो इज़्ज़त जो है, सिर्फ़ शाब्दिक या क़िताबी नहीं हो सकती। हम कह तो सकते हैं, होंठों से, कि, "मुझ में भी प्यार है सफाई के लिए, निर्मलता के लिए, सच्चाई के लिए, ईमानदारी के लिए," पर क्या हमारा जीवन ऐसा है? क्योंकि बच्चा, बच्चा तो होता ही है, वो एक छोटा वयस्क भी होता है। बच्चा, बच्चा तो है ही, पर उसको आप एक छोटे बड़े आदमी की तरह भी देखिए, कि है वो पूर्ण वयस्क, जो अभी छोटा है। बहुत कुछ समझता है, उसकी भी दृष्टि है। वो भी आपके शब्दों से ज़्यादा आपके कर्मों से, आपके जीवन से सीखता है।

रो- श- नी, को रोशनी नहीं कहते, दी-या, दीया नहीं है — दीया मात्र तब दीया है, जब उसकी उपस्थिति में दूसरा सजग हो जाए। रोशनी मात्र तब रोशनी है, जब उसकी उपस्थिति में दूसरा जान पाए, बोध पाए। रोशनी सिर्फ़ तब रोशनी है, जब उसके होने के कारण कोई ठोकर खाने से बच जाए। अगर रोशनी मौजूद है, फिर भी लोग ठोकर खा-खा कर गिर रहे हैं, तो वो रोशनी है ही नहीं। तो वो रोशनी फिर अपने रोशनी होने का दावा ना करे, फिर तो ज़रा अंतर्गमन करना होगा। अपने भीतर जाकर के देखना होगा, कि क्या हमारा जीवन ऐसा है जो दूसरे को भी प्रकाशित कर सके? और याद रखिएगा, जो आपके पास होता है, वो स्वत: ही दूसरों तक पहुँच जाता है।

अगर यहाँ कोई ज़ुखाम के विषाणु ले कर बैठा होगा, तो पक्का है कि कल तीन-चार और लोग भी छींक रहे होंगे, भले ही वो चाहे या ना चाहे दूसरों को प्रभावित करना। लेकिन, जैसे सत्य का स्वभाव है फैलना, वैसे ही माया का स्वभाव भी फैलना है। वो भी फैलती है, और खूब फैलती है। आपको कोशिश नहीं करनी पड़ती आप बस प्रचारक बन जाते हो, उसके, जो आप हो।

आप सही हो जाओ, आप से सही चीज़ें फैलेंगी। आप अँधेरे हो आपसे अँधेरा फैलेगा। आप बीमार हो, आपसे बीमारी फैलेगी। आप स्वस्थ हो, आपसे स्वास्थ्य फैलेगा, आपके बच्चों को आपसे ठीक वही मिलेगा, जो आप हो। तो बच्चों तक पहुँचाने की जिन्हें फ़िक्र हो, जो चाहते हों कि उनके बच्चे खिल कर, निखर कर सामने आएँ, उन्हें सबसे पहले अपना वर्धन, अपना उपचार करने की ज़रूरत है। एक बार आप स्वस्थ हो गए तो फ़िर आपको ज़्यादा श्रम करना ही नहीं है।

आप जैसे हो, आपके बच्चों तक वही चीज़ स्वयं ही पहुँच जाएगी।

बुद्ध होते थे, तो उनका जो बुद्ध-क्षेत्र होता था, कहते थे उसमें शान्ति अपने-आप फैल जाती थी। बुद्ध को कुछ करना नहीं होता था, उनके होने भर से, दूर-दूर तक शान्ति फैल जाती थी। आप भी अगर प्रकाशित हो, तो आपको कुछ करना नहीं पड़ेगा। दीया कुछ करता है क्या? दीया तो बस दीया होता है। उसके होने भर से, आस-पास के लोग दृष्टि पा जाते हैं। आप भी वैसे हो जाओ, आपको भीतर मुड़ना पड़ेगा।

होता क्या है, कि हम जिनका भला चाहते हैं, हम उन्हीं की ओर देखना शुरू कर देते हैं। ये ऐसी-सी बात है, कि कोई ड्राइवर(चालक) गाड़ी चला रहा हो, और सवारियों की ओर देखना शुरू कर दे कि, "कितनी प्यारी सवारियाँ हैं, और मुझे इनका ख़याल रखना है, मुझे इन्हें मंज़िल तक पहुँचाना है। मुझे बड़ा प्रेम है इनसे।" क्या होगा ऐसी गाड़ी का, जिसमें ड्राइवर(चालक) ग़लत दृष्टि में देख रहा हो? और यही कहकर कि "मुझे इतना प्यार है कि मैं सवारियों को ही निहारे जा रहा हूँ।" क्या होगा ऐसी गाड़ी का?

प्रश्नकर्ता: ऐक्सीडेंट(दुर्घटना)।

आचार्य प्रशांत: आप बाइक चला रहे हैं, और जो आपके पीछे बैठा है, उसकी रक्षा करना चाहते हैं, और रक्षा के ख़ातिर आप उसी को पकड़े हुए हैं। "मैं तुझे ही पकड़कर चलाऊँगा क्योंकि मुझे तेरी रक्षा करनी है।" अब क्या होगा? जो अपने-आप को नहीं बचा सकता, वो दूसरों को क्या बचाएगा? बात समझ रहे हैं?

जो अभिभावक बच्चों की भलाई चाहते हों, जो कि सभी चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने ऊपर ध्यान देना होगा।

लेकिन अभिभावकों का तर्क क्या होता है? “हम बच्चों की भलाई में, इतने उद्दत और इतने व्यस्त रहते हैं कि हमें अपने ऊपर ध्यान देने का वक़्त ही नहीं मिलता।"

सत्र होते हैं हमारे, शिविर होते हैं, और तमाम माध्यम हैं जिनसे हम लोगों से मिलते हैं। उनमें अक्सर अभिभावक ना आने का यही कारण बताते हैं, कहते हैं, “बच्चा बड़ा करना है न, बच्चे की बेहतरी करनी है, इसलिए हम नहीं आ पाते।" मैं हँसकर उनसे पूछता हूँ, कि तुम अगर यहाँ नहीं आ रहे हो, तो बच्चे की भलाई कर कैसे लोगे?

पर देखिए, माया कैसे-कैसे बहाने देती है! “हमें बच्चे की भलाई करनी है, इसी में तो हम व्यस्त हैं। इसी कारण तो आचार्य जी, हम आपके पास आ नहीं पाते।" अच्छा! और देखा यही गया है, जो ज़रा बच्चों को छोड़कर आ जाते हैं, उनके बच्चे फूल जैसे खिलते हैं, और जो बच्चों की भलाई को ही कारण बताकर के नहीं आते, अपने पर ध्यान नहीं देते, अपनी सफ़ाई पर ऊर्जा और समय नहीं लगाते, उनके बच्चे भी अधखिले ही रह जाते हैं। बच्चे का भला चाहते हों तो सर्वप्रथम अपना भला कीजिए। समझ रहे हैं?

माँ होना, बाप होना, करीब-करीब परमात्मा होने जैसा है। वो पूरी दुनिया चलाता है, सबका बाप है, आप भी, सबके नहीं पर बाप तो हो। तो कुछ तो परमात्मा का अंश आप में होना ही चाहिए। कुछ तो आपके मन में, आचरण में, परमतत्त्व की झलक होनी चाहिए। तभी आपका बच्चा एक स्वस्थ नौजवान या नवयुवती बनकर निकलेगा। दूसरा जन्म होता है, माँ-बाप बनना, इसी अर्थ में नहीं कि जन्म की प्रक्रिया जटिल होती है, इस अर्थ में, कि जब आप बच्चे को बड़ा कर रहे होते हो न, तो साथ-साथ अपने-आप को भी बड़ा करना होता है क्योंकि अगर आप बड़े नहीं हुए — ‘बड़े’ मतलब बड़प्पन, वयस्कता, मैच्योरिटी — अगर आप बड़े नहीं हुए, तो बच्चा बड़ा कैसे होगा?

अगर माँ की और बाप की ही मानसिक उम्र अभी दस या बारह साल की है, जो कि अक्सर होती है — आप जानते हैं न? शारीरिक उम्र अक्सर बढ़ जाती है और मानसिक उम्र थम जाती है — अगर माँ की और बाप की ही मानसिक उम्र अभी दस-बारह साल की है तो बच्चा कहाँ से बीस साल का हो जाएगा? हमने ऐसा बच्चा आज तक देखा नहीं, जो माँ-बाप से ज़्यादा उम्र का हो लेकिन कोशिश और अरमान हमारे यही होते हैं, कि हम तो बारह साल के हैं, बेटा बीस साल का हो जाए। ये असम्भव है।

आपको अपने बच्चे से कम-से-कम पाँच-दस साल आगे-आगे चलना होगा। जैसे-जैसे वो बड़ा हो, आपको भी क्रमशः बड़े होते रहना होगा।

जैसे उसकी प्रगति उत्तरोत्तर है, वैसे ही आपकी प्रगति को भी उत्तरोत्तर होना होगा। ऊपर बढ़ना कभी रुके नहीं। इस दंभ में मत रह जाइएगा कि, “हम तो माँ बाप हैं, हमें थोड़े ही आगे बढ़ना है। विकास तो बच्चों का होना है।” नहीं! आपका होना है। सुविकसित माँ-बाप तो, सुविकसित बच्चे, और अर्धविकसित माँ-बाप, तो? फिर बच्चे को दोष दें, समाज को दोष दें, और शिक्षा को दोष दें? उन्हें भी दे दीजिएगा, लेकिन सर्वप्रथम?

प्रश्नकर्ता: अपने को दीजिए।

आचार्य प्रशांत: मैं इतने लोगों से मिलता हूँ, मैंने आज तक नहीं देखा, ऐसा घर जहाँ माँ-बाप स्वस्थ हों, सहज हों, और बच्चा उद्दंड हो और अर्धविक्षिप्त हो। नहीं देखा। मैंने तो सदा यही देखा है कि जब भी कभी बच्चे में समस्या रही है, उसका प्रथम कारण घर का माहौल है। जब भी कभी किसी बच्चे की समस्या को हल करना होता है, मैं बच्चे को तो बिल्कुल हटा देता हूँ, मैं घर पर जाता हूँ, मैं घर की बात करता हूँ। घर बताओ, कैसा चल रहा है? घर यदि ठीक चल रहा होता, तो ये तो घर से ही पैदा हुआ है, घर का ही फूल है। घर की मिट्टी ठीक होती, तो फूल कैसे ख़राब हो जाता?

घर अच्छा रखिए। घर में परमात्मा का नाम हो, घर में ईमानदारी की बात हो, घर में जैसा आपका आचरण हो, बोल हो, व्यवहार हो, उसमें प्रेम हो। घर में हिंसा ना हो, घर में कटुता ना हो। घर में तमाम तरीके के दुष्प्रभावों को आमंत्रण ना हो। ये जो टीवी है न, ये टीवी नहीं है, ये एक पाइपलाइन है जिससे दुनिया भर का मल बह-बह कर घरों में आता है, इसको एक नाला जानिएगा, ये एक वैश्विक-नाला है। इट्स अ ग्लोबल ड्रेनेज पाइप दैट एम्प्टीज़ इटसेल्फ इन टू एवरी हाउसहोल्ड।(यह एक वैश्विक नाला है जो हर घर में ख़ुद को खाली करता है)।

प्रश्नकर्ता: सबको मालूम है, लेकिन छोड़ता कोई नहीं है।

आचार्य प्रशांत: बच्चे नहीं छोड़ते या...?

प्रश्नकर्ता: अभिभावक नहीं छोड़ते। पता सबको है, पर छोड़ता कोई नहीं।

आचार्य प्रशांत: जब सब कुछ पता हो, और स्वयं से ना होता हो, तो जानते-बूझते अपने-आप को किसी ऐसे के हाथों सौंप दो, जो पता है कि आपको अनुशासन में रखेगा। आपमें से कुछ लोग जिम(व्यायामशाला) वग़ैरह जाते होंगे। आप अच्छे से जानते हैं कि क्या करना होता है, किन-किन नियमों पर करना होता है, वहाँ कोई विशेष विज्ञान नहीं लगता। लेकिन फिर भी ट्रेनर(प्रशिक्षक) की ज़रुरत होती है क्योंकि ट्रेनर(प्रशिक्षक) हाथ पकड़ कर करा देता है। वो आपके बहानों को झुठला देता है। ज़रुरत पड़े, तो वो आपको थोड़ा डाँट भी देता है। वो आपसे कहता है, "बहाना मत बनाओ, चलो दौड़ लगाओ।" दौड़ लगानी चाहिए, ये आपको भी पता है, पर आप स्वयं करेंगे नहीं, आप पर आलस और वृत्तियाँ हावी हो जाएँगी। तो इसलिए फिर कोई चाहिए होता है जो स्वयं अनुशासित हो और आपको अनुशासन में रखे।

वैसी व्यवस्था अगर आप ख़ुद आयोजित कर लें, तो बहुत अच्छा। आत्म-अनुशासन से अच्छा तो कुछ होता ही नहीं और अगर ख़ुद आयोजित ना कर पाएँ तो किसी और से आग्रह करें कि वो आपकी मदद कर दे, पर करें ज़रूर। क्योंकि उसको करे बिना जीवन में कुछ रस नहीं है, खुशबू नहीं है।

ऐसा समझ लीजिए कि बच्चे का आना माने दूसरी पारी का शुरू होना और दूसरी पारी का शुरू होना माने? अब वो गलतियाँ मत दोहराना जो पहली पारी में करी थीं। तुम भी कभी बड़े हो रहे थे, और जब तुम बड़े हो रहे थे, उन वर्षों में कुछ चूक, कुछ कमी रह ही जाती है। अब तुम जानते हो, अब तुम उसको पूरा करो, अपने-आप में, बच्चे के साथ-साथ बच्चे के मित्र की तरह बड़े होते रहो। माँ-बाप हैं, और बच्चा पैदा होता है, तो समझ लीजिए कि घर में एक नहीं, तीन नए बच्चे आएँ हैं। तीनों को अब बड़ा होना है, एक साथ। तीन माने, कौन-कौन? बच्चा तो है ही, और माँ-बाप जो हैं इनको भी बच्चा ही मानिए कि इन्हें भी अब बड़ा होना है, और ये बड़े नहीं हुए, तो बड़ी दिक़्क़त हो जाएगी।

हमें ये कहना बड़ा अच्छा लगता है न, 'माँ-बाप भगवान समान होते हैं।’ तो अगर भगवान समान होते हैं तो फिर भगवान समान उनका जीवन भी तो होना चाहिए।

स्थान तो, जैसा जीवन होगा वैसा स्थान हो जाएगा। बच्चे को भी कई बार बड़ी हैरानी होती है, कि, "ये कहते हैं कि माँ-बाप भगवान होते हैं! ऐसे होते हैं भगवान? हम देवासुर संग्राम तो सुनते थे, देव-देवी संग्राम कभी सुना नहीं। देवों की असुरों से लड़ाई तो होती है, पर हमने ऐसा तो कभी सुना नहीं कि देवी और देवता आपस में भिड़ गए। तो फ़िर मेरे ये दो भगवान आपस में क्यों भिड़ते हैं? घर में तो लगातार श्री भगवान और श्रीमती भगवान का धर्मयुद्ध लगा रहता है, तो फ़िर कैसे होगा?"

प्रश्नकर्ता: सर इंसान ही हैं, लड़ेंगे तो सही। भगवान तो नहीं हैं हम।

आचार्य प्रशांत: हाँ, बढ़िया है। हाँ, तो जो इंसान है, उसका धर्म होता है, भगवान के सामने सर झुकाना ताकि भगवत्ता की कुछ बूँदें उस पर भी पड़ें, ताकि शांत हो सके, सहज जी सके। दुख से ज़रा आज़ादी मिल सके। है न? तो वो जो विनम्रता होती है सर झुकाने की, वो एक बार आ गई माँ-बाप में, तो माँ-बाप भी आनंद पाते हैं और बच्चा भी।

वो विनम्रता रखिएगा, कि जहाँ से सीखने को मिले सीखेंगे, और कभी भी ये दावा, ये गर्व, ये दंभ नहीं रखेंगे कि हमें तो सब पता है, हम अच्छे हैं, और दुनिया ही ख़राब है, और दुनिया मेरे बच्चे को भ्रष्ट किए दे रही है। विनम्रता का अर्थ होता है — सर्वप्रथम अपनी ओर देखना। “अपने माही टटोल” — दोनों बातें, माया भी, ब्रह्म भी। सब भीतर ही है।

आज आप जान लीजिए कि यहाँ बैठे हैं, मैं बच्चे तो एक-दो ही देख रहा हूँ, बाकी तो सब वयस्क हैं। लेकिन आप जान लीजिए, कि आज आप लौट कर जाएँगे, तो आप बच्चों के लिए बड़ी भेंट लेकर जा रहे हैं। शांत अभिभावक से ज़्यादा अच्छी भेंट बच्चों के लिए कोई हो ही नहीं सकती। आप बच्चे को ले जाकर के लाखों के तोहफ़े दे दें, वो तोहफ़ा कम क़ीमत का है। ज़्यादा बड़ी क़ीमत का जानते हैं क्या तोहफ़ा है? आप स्वयं शांत हो करके, सुंदर हो करके, सहज हो करके अपने बच्चों के सामने जाएँ। इससे बढ़िया तोहफ़ा क्या हो सकता है? तो आज आप अपने बच्चों के लिए बड़ी अमूल्य भेंट ले करके जा रहे हैं।

ये आशीर्वाद होगा आपका उनको, कि "देखो हम तुम्हारे लिए उपहार लाए हैं।" वो कहेंगे, "क्या?" आप कहेंगे, ‘मैं’। चाहें तो एक रिबन भी बाँध लीजिएगा, ठीक है। इसीलिए जो हम टीनएजर्स(किशोर) के लिए और बच्चों के लिए जो शिविर आयोजित करते हैं, उसमें ये सुविधा रखी है कि अभिभावक भी आएँ बच्चों के साथ। जो अभिभावक बच्चों को अकेले भेज रहे हैं, ठीक है, और जो साथ आना चाहें, उनका पूर्ण स्वागत है क्योंकि बच्चा और सीखता है जब उसके साथ उसकी माँ सीखती है।

ये गुरुकुल का एक नया प्रयोग है। पुराने आश्रमों में, गुरुकुलों में तो बालक को रख लिया जाता था, माँ-बाप से कहा जाता था कि “बच्चा अब हमारी ज़िम्मेदारी।” हमारे पास जब कोई आता है, बालक को लेकर के तो हम बालक को तो पकड़ते ही हैं, माँ-बाप को भी पकड़ लेते हैं। हम कहते हैं, "तुम भी बैठो! तीनों बच्चे हो, हम बड़ा माने किसको? बच्चे का भला चाहते हो, तो तीनों दाख़िला लो।" और प्रयोग के नतीज़े बड़े अच्छे हैं, होने ही हैं।

आप सब लोग एक कड़ी में जुड़े हुए हो, सबने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ है। उबरोगे तो सब एक साथ, और डूबोगे तो सब एक साथ। पत्नियाँ आती हैं अकेले-अकेले, उन्हें असुविधा हो जाती है। उनकी प्रक्रिया एक सीमा पर जाकर रुकने लग जाती है। उससे आगे तभी जाती है, जब फिर वो पति को घसीट कर लाती हैं, कि “तुम भी चलो।” पति आते हैं अकेले, तो एक सीमा के बाद उन्हें भी पत्नियों को साथ लाना ही पड़ता हैं क्योंकि आप जुड़े हुए हो। आपने अब रिश्ता तो जोड़ ही लिया है, हाथ तो पकड़ ही लिया है। अब जब पकड़ लिया है तो बढ़ो तो साथ-साथ आगे बढ़ो, और रुको तो फिर साथ-साथ रुके रहो। ऐसे ही बच्चों का है, हाथ तो पकड़ा ही हुआ है न? सब एक साथ बढ़ेंगे।

हम सब जानते हैं, होशियार हैं। हम सबको पता है कि अशांति पैदा करने वाले तत्त्व कौन-से होते हैं जीवन में। जानते हैं न? संकल्प पक्का कर लीजिए और उनसे दूर हो जाइए। चाहे जो क़ीमत देनी पड़े और हम सब ये भी जानते हैं कि शान्ति लाने वाले तत्त्व कौन-से होते हैं। वहाँ भी संकल्प कर लीजिए कि जो भी क़ीमत अदा करनी पड़े, इनको घर लेकर आएँगे। बस इतना-सा खेल है, इतनी-सी बात है।

और संकल्प तोड़ने वाले मत बनिएगा। हमारा चित्त, इतना कमज़ोर होता है न कि संकल्प लेता है और कुछ दिनों में तोड़ भी देता है। संकल्प उठाइए, छोटा उठाइए, तो उसके साथ चलिए। बड़े-बड़े संकल्प करिए ही मत। कोई लाभ नहीं है स्वयं से ही वादा कर के वादा तोड़ देने का।

छोटा-सा संकल्प उठाइए, जो कि पता है निभा लेंगे। फिर उसको निभाइए। ज़्यादा बड़ा संकल्प उठाना भी अहंकार है। वो बताता है कि आप अपने-आप को वो समझते हो, जो आप हो नहीं।

सही काम के रास्ते में, बुद्धि को और तर्क को मत आने दीजिएगा। बुद्धि और तर्क का इस्तेमाल करिएगा सही काम करने के लिए, ये दो अलग-अलग बातें हैं। बुद्धि, तर्क और स्मृति, आपके ग़ुलाम होने चाहिए, मालिक नहीं। जब आप जान जाएँ कि सही क्या है, तब पूरी बुद्धि लगाइए, पूरा तर्क लगाइए ताकि जो सही है, आप उसको कर पाएँ। लेकिन जब बुद्धि, कुबुद्धि होती है, और तर्क, कुतर्क होता है, तो वो सही लक्ष्य के आड़े आता है, वो विरोधी बन जाता है। उसको विरोधी नहीं बनने देना है, उसको सेवक रखना है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories