मिलिए इस इंसान से - इसपर सबसे ज़्यादा ज़ुल्म हुआ है (चौंक जाएँगे!) || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जो सोसाइटी (समाज) के द्वारा हमारे ऊपर कंडीशनिंग (अनुकूलन) करी गयी है, गलत मूल्यों को हमारे अंदर बैठा दिया गया है। लेकिन मुझे एक चीज़ समझ में नहीं आती है कि यह सोशल (सामाजिक) कंडीशनिंग इतनी बुरी तरह कैसे हम पर हावी होती चली गयी? अगर हम पहले के युगों से अपने को कंपेयर (तुलना) करें, अगर सोशल कंडीशनिंग देखें तो वह बढ़ती चली जा रही है और मतलब हम लेस् फ्री (कम मुक्त) होते जा रहे हैं पहले से। तो…
आचार्य प्रशांत: बैठिए। तो सवाल पूछा है कि 'यह सारी सोशल कंडीशनिंग आ कहाँ से गयी?' हम जंगल से निकले हैं तो फिजिकल कंडीशनिंग (शारीरिक अनुकूलन) तो समझ में आती है। हम जानवर हैं, तो जो फिजिकल टेंडेंसीज़ (शारीरिक वृत्तियॉं) हैं उसका मामला तो सीधा है। वही जानवर में पायी जाती है, वही हममें पायी जाती है। तो यह सोशल कंडीशनिंग कहाँ से आ गयी? यह सोशल कंडीशनिंग वास्तव में हमारी कोशिश है उस फिजिकल कंडीशनिंग को हटाने की।
हर तरह की सोशल कंडीशनिंग, ऐसे समझ लीजिए कि एक तरह की शिक्षा होती है, शिक्षा। आप कहते हो न, ‛हम बच्चों को संस्कार देते हैं।' आप वह संस्कार उनको क्यों देते हो? संस्कार होते हैं वृत्ति का प्रतिकार करने के लिए। कौनसी वृत्ति? वही जो जंगल की वृत्ति है हमारी।
तो इसलिए बच्चे को संस्कार बताए गये हैं ताकि उसमें जो कुछ जंगली है उसको हटाया जा सके। और बच्चे को इंसान ही नहीं, दैवीय, डिवाइन् बनाया जा सके। यह जो संस्कार हैं, इनका उद्देश्य तो यह है कि यह आपकी फिजिकल कंडीशनिंग को हटा सकें। जो हमें संस्कार दिये जाते हैं, जो शिक्षा दी जाती है बच्चे को या जो उस पर प्रभाव डाले जाते हैं — सीख, नसीहत यह सब चलता है — वह आदर्श रूप में,



