कोई भी कर्म तब सही है जब सत्य से उठता हो ज्ञानी के मामले में, या सत्य की ओर ले जाता हो अज्ञानी के मामले में। प्रथा भी अच्छी हो सकती है, अगर वो सत्य की ओर ले जाती हो, समझदारी की ओर, ज्ञान की ओर ले जाती हो तो वो प्रथा अच्छी है। पर जिस प्रथा के साथ कोई समझ जुड़ी ही नहीं है, उस प्रथा में क्या रखा है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। पहली बार आपको ऑफ़ द स्क्रीन देखा है। पहली बार आई हूँ और पहली बार मेरा सौभाग्य है कि मुझे प्रश्न पूछने का मौका मिला।
आचार्य प्रशांत: स्वागत है।
प्रश्नकर्ता: प्रश्न मतलब अपनी जिज्ञासा आपके समक्ष रखने का। तो मेरी ये जिज्ञासा है, जैसे-जैसे हम अध्यात्म में अपने प्रति जागरूक होते हैं तो दुनिया के झूठ हमारे सामने खुलने लगते हैं और हम समझने लगते हैं कि जो भी हमें बचपन से परोसा गया है, उसमें कितना झूठ है और कितनी काल्पनिक चीज़ें हैं।
तो जैसे हमने देखा है, हम हर कोई किसी न किसी धर्म या संस्कृति से आते हैं, तो उसके घर में जन्म के समय, मृत्यु के समय पर्टिक्युलर्ली कुछ ऐसे रिचुअल्स होते हैं, अदरवाइज़ घर में पूजा पाठ इत्यादि होते हैं। तो बीइंग अ सिंगल मदर, आई जस्ट वांट टू आस्क यू द क्वेश्चन, बिकॉज़ आई हैव रेस्पॉन्सिबिलिटी ऑफ़ टू किड्स, आई एम रेज़िंग, तो ऐसी बहुत सारी चीज़ें। अभी कुछ दिनों पहले ही मेरे घर में एक घटना हुई जिसमें किसी की मृत्यु हुई, तो वहाँ पर जैसे कि होता है, सभाएँ बुलाकर सबको दूसरी दुनिया की कहानियाँ सुनाई जाती हैं कि ऐसे आत्मा




