सिंगल मदर हूँ, बच्चों को सही राह कैसे दूँ?

Acharya Prashant

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सिंगल मदर हूँ, बच्चों को सही राह कैसे दूँ?
कोई भी कर्म तब सही है जब सत्य से उठता हो ज्ञानी के मामले में, या सत्य की ओर ले जाता हो अज्ञानी के मामले में। प्रथा भी अच्छी हो सकती है, अगर वो सत्य की ओर ले जाती हो, समझदारी की ओर, ज्ञान की ओर ले जाती हो तो वो प्रथा अच्छी है। पर जिस प्रथा के साथ कोई समझ जुड़ी ही नहीं है, उस प्रथा में क्या रखा है? यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। पहली बार आपको ऑफ़ द स्क्रीन देखा है। पहली बार आई हूँ और पहली बार मेरा सौभाग्य है कि मुझे प्रश्न पूछने का मौका मिला।

आचार्य प्रशांत: स्वागत है।

प्रश्नकर्ता: प्रश्न मतलब अपनी जिज्ञासा आपके समक्ष रखने का। तो मेरी ये जिज्ञासा है, जैसे-जैसे हम अध्यात्म में अपने प्रति जागरूक होते हैं तो दुनिया के झूठ हमारे सामने खुलने लगते हैं और हम समझने लगते हैं कि जो भी हमें बचपन से परोसा गया है, उसमें कितना झूठ है और कितनी काल्पनिक चीज़ें हैं।

तो जैसे हमने देखा है, हम हर कोई किसी न किसी धर्म या संस्कृति से आते हैं, तो उसके घर में जन्म के समय, मृत्यु के समय पर्टिक्युलर्ली कुछ ऐसे रिचुअल्स होते हैं, अदरवाइज़ घर में पूजा पाठ इत्यादि होते हैं। तो बीइंग अ सिंगल मदर, आई जस्ट वांट टू आस्क यू द क्वेश्चन, बिकॉज़ आई हैव रेस्पॉन्सिबिलिटी ऑफ़ टू किड्स, आई एम रेज़िंग, तो ऐसी बहुत सारी चीज़ें। अभी कुछ दिनों पहले ही मेरे घर में एक घटना हुई जिसमें किसी की मृत्यु हुई, तो वहाँ पर जैसे कि होता है, सभाएँ बुलाकर सबको दूसरी दुनिया की कहानियाँ सुनाई जाती हैं कि ऐसे आत्मा एण्ड ऑल दैट।

तो हमको इतना समझ में आता है कि आत्मा सिर्फ़ एक कांसेप्ट होता है, तो ऐसी कोई कहानियाँ नहीं चलती हैं। तो ऐसी चीज़ें जब होती हैं हमारे घर में, तो नेक्स्ट जनरेशन के लिए या बच्चों के लिए हमारा क्या दृष्टिकोण होना चाहिए। क्या हमें ये सारे रिचुअल्स जो भी होते हैं घर में या हमारे समाज में, जो भी हम अपने जीवन में फेस करते हैं, सबका त्याग कर देना चाहिए? बिकॉज़ वी आर अवेयर ऑफ़ इट। हाउ डू वी मेक आवर चिल्ड्रन अवेयर ऑफ़ दैट। क्या उनको बोल दें कि सब त्याग दें? तो फिर मतलब जस्ट नो कि क्या दृष्टिकोण होना चाहिए हमारा उनके प्रति?

आचार्य प्रशांत: जो ज़रूरी है वो करो, बाक़ी मत करो। मैं यहाँ आया तो आपने गुरु वंदना करी है क्या कोई?

प्रश्नकर्ता: नहीं, नहीं। मेरा ये था कि…

आचार्य प्रशांत: मैं समझ गया आपकी बात को। बहुत आप जो बात कह रही हैं वो दूर तक जाती है और उसके जो परिणाम होते हैं बहुत ख़तरनाक होते हैं। अच्छा करा सवाल पूछा है आपने, जो ज़रूरी है वो करो न।

प्रश्नकर्ता: तो फिर मुझे ये नहीं समझ में आता कि इसमें ज़रूरी क्या है।

आचार्य प्रशांत: ज़रूरी है कि शादी कर रहे हो तो जाकर रजिस्टर करा लो, पर उसमें बाक़ी तामझाम ज़रूरी थोड़ी है।

प्रश्नकर्ता: नहीं, जैसे कि सपोज़ फॉर दैट मैटर ओनली कि सबसे ज़्यादा जब किसी की मौत होती है।

आचार्य प्रशांत: मेरी मौत होगी तो मैं कह रहा हूँ, मुझे जला के इलेक्ट्रिक क्रिमिटोरियम में फूँक देना। मेरी लाश फूँकना ज़रूरी है, नहीं तो सड़ेगी, गंधाएगी। वो भी रिचुअल ही है न, ले जाओ शरीर को वहाँ पर फूँक रहे हो। यही रिचुअल है, यही चाहिए। बाक़ी जो कर रहे हो, क्या करोगे उसका, उससे क्या होता है।

प्रश्नकर्ता: हाँ, तो मतलब वही न कि त्याग देना चाहिए सब।

आचार्य प्रशांत: ये भारी बंधन रहता है। मैं गया था अभी एससी एसटी क्लब, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में, तो उसके बाद वहाँ बात होने लगी। वहाँ के लोग थे, बोले हम ऐसे गाँवों से भी आते हैं हम में से कुछ लोग, जहाँ पर भारी जातिगत दुर्व्यवहार है। बोले अभी भी स्थिति ये है कि गाँव है ऐसे और गाँव के साथ एक सेटेलाइट जैसा एरिया जो है, वो बाहर है गाँव के, जो कहने को गाँव का हिस्सा है पर वो गाँव से बाहर है, जैसे शहरों के सबर्ब्स होते हैं न तो ऐसे ही गाँव के बाहर एक अलग बस्ती है। बोले हम अभी भी उसमें रहते हैं, वो अछूत बस्ती होती है।

लेकिन हम हर गाँव के साथ होते ज़रूर हैं क्योंकि बहुत सारे काम हैं गाँव के जो हम ही लोग करते हैं, तो हर गाँव के साथ ऐसी एक बस्ती जुड़ी होती है। अब हर गाँव के साथ नहीं होती होगी, वो जिन पिछड़े गाँव की बात कर रहे हैं वहाँ होती होगी। बोल रहे हर गाँव के साथ एक ऐसे जुड़ी होती है अछूत बस्ती और वहाँ हम लोग रहते हैं और वो हमें छोड़ भी नहीं सकते गाँव वाले क्योंकि कुछ काम हैं जो सिर्फ़ हम ही करते हैं। तो ऐसी बस्ती होती है। बोले हम बहुत कोशिश करते हैं पहले तो समझाने सुधारने की, बात करी, क्योंकि हमारे यहाँ से कुछ बच्चे हैं वो पढ़-लिख भी गए हैं। बोले, समझाना, सुधारना नहीं इनको। बोले, हमने ये तक करा कि हम बौद्ध हो जाएँ। हम में से कुछ लोग बौद्ध हुए भी, पर फिर वो वापस आ जाते हैं इसी नरक में सड़ने के लिए।

मैंने पूछा, क्यों, बताइए विस्तार में। बोले, रिचुअल्स। बोले, हम गरीब गाँव छोटा सा, कोई बौद्ध मंदिर ही नहीं है आसपास। तो बच्चा पैदा हो रहा है तो जन्म के संस्कार कहाँ कराएँ? शादी ब्याह कहाँ कराएँ? मौत हो रही है तो किस हिसाब से उसको जलाएँ? तो रिचुअल्स करने वाला कोई नहीं है। तो रिचुअल्स करने वाला कोई नहीं है, तो हम वापस वहीं आ जाते हैं। रिचुअल्स का ये काम रहा है लोकधर्म को बनाए रखने में।

अभी भी क्या कहा जाता है, लड़का नहीं पैदा होगा तो लाश को आग कौन देगा। समझ में आ रहा है? भारत में जो करोड़ों भ्रूण हत्याएँ हुई हैं। भारत की आबादी में से चार करोड़ महिलाएँ गायब हैं, ये चार करोड़ मारी गई हैं, ज़्यादातर गर्भ में ही मारी गई हैं। ये चार करोड़ इस रिचुअल के मारे मारी गई हैं, ये जो कपाल क्रिया होती है वो पुत्र ही करता है और मुँह में आग भी पुत्र ही देता है। और अगर पुत्र ने नहीं करा ये तो तुम्हारी जीवात्मा भटकेगी, और तुम्हें बताया जाता है कि तुम बुरे तरीक़े से मरने के बाद तड़पोगे। तो बाप कहता है, ‘बाप रे बाप, ये बेटा चाहिए बेटा, नहीं तो मैं अनंत समय तक तड़पता रहूँगा।’ और बेटा चाहिए तो इस मारे चार करोड़ लड़कियाँ कम से कम मार दी गई हैं, क्योंकि ये रिचुअल है कि पुत्र ही करेगा ये काम।

मेरे तो न पुत्र, न पुत्री, मैं तो अब अनंत समय तक अंतरिक्ष में भूत बनके भटकने वाला हूँ। खुफ़िया घटनाएँ होंगी आपके घरों में मेरे मरने के बाद, वो जान लेना मैं ही हूँ।

मतलब देख रहे हो, बात कितनी दूर तक जाती है। गीता की पूरी शुरुआत ही किससे है? अर्जुन क्या कह रहे हैं, अर्जुन कह रहे हैं, ‘ये सब क्षत्रिय अगर मर गए तो ये जो हमारी महिलाएँ हैं, ये जाकर के निचले वर्णों से विवाह कर लेंगी, संबंध बना लेंगी, उनसे वर्ण संकर पैदा हो जाएँगे, प्रतिलोम विवाह हो जाएगा। विशेषकर अगर शूद्रों से जाकर के इन्होंने संबंध कर लिया तो। उनसे जो औलादें पैदा होंगी, वो जब जाकर के श्राद्ध वग़ैरह में और तर्पण देंगे तो जो हमारे पितरों की जीवात्माएँ हैं, वो स्वीकार नहीं करेंगी। वो स्वीकार नहीं करेंगी तो भूखी रह जाएँगी, भूखी रह जाएँगी तो क्रुद्ध हो जाएँगी। क्रुद्ध हो जाएँगी तो श्राप दे जाएँगी।’

एक रिचुअल के मारे महाभारत का युद्ध हारने की नौबत आ गई थी, युद्ध करते ही नहीं अर्जुन। ये जो पूरा कर्मकांड होता है न, कर्मकांड, बड़ी ख़तरनाक चीज़ होती है। समझिएगा इसको। ये वास्तविक धर्म से कोसों दूर की बात है। ये आपको सांत्वना दे देता है कि आप धार्मिक आदमी हो, जबकि आप धार्मिक हो नहीं सच में। पर आप कुछ क्रियाओं का, प्रथाओं का पालन कर रहे हो तो आपको लगता है, आपको भ्रम हो जाता है कि मैं धार्मिक हूँ। जबकि वास्तविक धार्मिकता बिल्कुल दूसरी बात है।

वास्तविक धार्मिकता गीता के दूसरे अध्याय से अठारहवें अध्याय तक है। और आप हो गीता के पहले अध्याय वाले अर्जुन, पर आपको ये भ्रम हो जाता है कि आप भी धार्मिक हो। गीता के पहले अध्याय में जो अर्जुन हैं, वो कहाँ श्रीकृष्ण की सुन रहे हैं। वो तो श्रीकृष्ण को बोल चुके हैं कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा,’ ये स्पष्ट शब्द हैं। ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा,’ ये कहकर अर्जुन धड़ाम से रथ पर बैठ गए। आप गीता के पहले अध्याय वाले हो, आप रिचुअलिस्टिक आदमी हो। लेकिन फिर भी आपने अपने आपको ये सांत्वना दे रखी है कि आप धार्मिक आदमी हो। आप धार्मिक हो ही नहीं, आप धार्मिक तब हो जब आप श्रीकृष्ण की बात सुनो।

दूसरे अध्याय से अठारहवें अध्याय तक धार्मिकता है, और आप कभी पहले अध्याय से आगे बढ़े ही नहीं हो। मुझे बड़े मजे की बात लगती है कि गीता में जिस अध्याय का सबसे कम उल्लेख होता है, वो पहला अध्याय है। जबकि पहला अध्याय ही सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। पहले अध्याय में ही आपको आईना दिखाया जाता है कि ये तुम हो। देखो अर्जुन की दशा, ये तुम्हारी दशा है। मोह, भ्रम, अंधविश्वास, अज्ञान — सब तुम पर हावी है। ये अर्जुन की दशा है पहले अध्याय में और इसीलिए विषाद है — अर्जुन विषाद योग।

कभी सुना है कोई पहले अध्याय से कुछ उद्धृत कर रहा है? नहीं करा जाता आमतौर पर। बात आगे की होती है, ज्ञान की होती है। अरे ज्ञान सदा किसी को लक्ष्य करके दिया जाता है, वो ज्ञान अर्जुन को लक्षित था। आपने क्या माना कि आपकी अर्जुन की दशा है? आपने वो तो माना ही नहीं, तो वो ज्ञान भी आपके काम नहीं आएगा।

और रिचुअल चली किस हिसाब से है?

अभी आप लोग फुले पिक्चर देख के आए। उसमें आपने देखा कि वहाँ पर जो दलित वर्ग था, उनका विवाह महात्मा फुले बोले, ‘मैं ही करा देता हूँ।’ तो ख़ुद ही करा लिया। तो जो पुरोहित वर्ग था, उसने मुकदमा करा और मुकदमे में क्या बोला? मुकदमे में बोला, ‘ये तो हमारा एकाधिकार है, हमारी मोनोपोली है, ये तो हम कराते हैं।’ तो उन्होंने कहा, ‘ये कोई बात है? ये तो उसका व्यक्तिगत मामला है दाढ़ी बनाने जैसा, उन्होंने ख़ुद कर लिया तो कर लिया। तुम काहे को बीच में आ रहे हो?’

तो आगे जो वो बात बोलते हैं, वो कितनी रोचक है। वो बोलते हैं, ‘ये हमारी रोज़ी-रोटी है। तुम्हें ख़ुद शादी करनी है तो कर लो, लेकिन दक्षिणा हमें भिजवा देना।’ ये है रिचुअल — बिना कुछ कामधाम किए आय का स्रोत। समझ में आ रहा है? क्यों इतना ज़रूरी माना जाता है लोकधर्म में कि तुम रिचुअल का पालन करो, क्योंकि पता नहीं कितने लोगों की आमदनी उससे जुड़ी हुई है। और उन्हें बिना कुछ करे-धरे पैसा मिलता रहा है सदियों से।

तो जो अंग्रेज़ जज था, वो क्या बोलता है उस पिक्चर में, ‘नो वर्क, नो मनी।’ ये बात लेकिन हमें कभी समझ में नहीं आती कि उसने करा क्या है, जिस बात का मैं इतना मोटा पैसा उसको दे रहा हूँ। उसने रिचुअल करी है । और ये करके हमने उस पैसा पाने वाले को भी बर्बाद कर दिया, क्योंकि अगर वो यूँ ही बैठे-बैठे जंतर-मंतर करके पैसा कमा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी भी तो बर्बाद कर रहा है न वो, कि नहीं कर रहा है? उसकी ज़िंदगी में भी उसे कहाँ अब संघर्ष का आनंद चखने को मिलेगा, उसे भी स्वयं वास्तविक धर्म या वास्तविक सत्य मिलेगा? नहीं मिलेगा न। तो आपने दोनों को बर्बाद किया, ख़ुद को भी और उसको भी, जिसको आप बुलाते हो कि आओ रिचुअल करा दो।

पर रिचुअल तो हर धर्म में चलती है। माना जाता है कि संस्कारों के बिना धर्म हो ही नहीं सकता और सब धर्म के अलग-अलग संस्कार होते हैं। और इन्हीं पर खूब लड़ाइयाँ भी होती हैं। दूसरे पर हँसते भी हैं, देखो ये लोग ऐसा करते हैं। पता है इनके यहाँ शादी में क्या करते हैं, कैसे करते हैं? पता है पारसी लोग कैसे होते हैं? इनका नहीं होता है टावर्स ऑफ़ साइलेंस। ये न मुर्दे को जलाते भी नहीं, गाड़ते भी नहीं, मुर्दे को जाकर वहाँ छोड़ आते हैं, छी छी! एक-दूसरे का मज़ाक भी बना लेते हैं। समझ में आ रही है बात?

और आदमी बहुत डरता है इस बात से कि अगर मेरी फलानी रिचुअल नहीं हुई तो मेरा क्या होगा? और ऐसी बारीक रिचुअल्स बनाई गई हैं कोई भरोसा! अब ये होता है आपका यज्ञोपवीत संस्कार। पता है जो धागा ब्राह्मण का होता है, वो धागा क्षत्रिय का नहीं हो सकता। उनके अलग होते हैं। वो वैश्य का अलग होगा बिल्कुल, और ये सब बारीकियाँ किसको पता होती हैं? वो कराने वाले को। इसी बात का फिर आप उसको…। और इन बारीकियों में कुछ रखा है? ये कोई ज्ञान है जो पता होना भी चाहिए? पर आप इसी बात का उसको दे रहे हो।

और आपको जब वो सब नहीं होता आपकी ज़िंदगी में, तो आप ही सहम जाते हो। कहते, ओ माय गॉड, मेरे बच्चे की तो फलानी चीज़ हुई ही नहीं, ज़रूर अब इस पर कोई बुरी आत्मा का साया पड़ने वाला है।

हमें धार्मिक होना है, अंधविश्वासी नहीं। हम सत्य को पूजते हैं, मान्यता को नहीं।

हमें श्रीकृष्ण पसंद है, साकार श्रीकृष्ण हैं गीता के रूप में हमारे सामने। श्रीकृष्ण के नाम पर कल्पनाएँ थोड़ी चाहिए। हमें कोई पूछे कि सगुण कृष्ण देखे हैं कभी? हाँ, हमने देखे, हम रोज़ देखते हैं। भगवद गीता है न, भगवद गीता सुनाई देती है ना, और जो चीज़ सुनाई देती है वो सगुण हो गई न। तो बस हो गया।

सारी मुझसे भी उनको समस्या यही है। ‘तुम बताओ, तुम्हारी दीक्षा हुई है?’ अब मैं इन्हें कैसे बताऊँ कि कैसे हुई है और किसने कराई थी? तुम्हारी समझ में ही नहीं आएगा। तुम्हारे बूते से आगे की बात है मेरी दीक्षा। ‘ये बताओ, वो वाली अंगूठियाँ कहाँ हैं? और धागा बांधे तुम्हें कभी देखा नहीं?’ ये कलाई ही धागा है। अच्छी है। कोई समस्या है? प्रकृति माँ की दी हुई कलाई है। कोई समस्या है इसमें? यही धागा है, इससे बड़ा क्या धागा चाहिए मुझे? और वो कहाँ है सब (कानों की ओर इंगित करते हुए)? और वो कहाँ है (नाक की ओर इंगित करते हुए)? और वो कहाँ है (गले की ओर इंगित करते हुए)? और वो कहाँ है (जनेऊ)?

मुझे मेरे शरीर को लेकर कोई समस्या नहीं है। महामाँ का दिया हुआ शरीर है, मैं इसको अपर्याप्त नहीं मानता। हाँ कपड़े पहन लेता हूँ ठंड, गर्मी वग़ैरह से बचने के लिए, पर मुझे नहीं लगता कि मुझे इसकी शुद्धि के लिए बाहर प्रतीक धारण करने की ज़रूरत है या कि किसी को कुछ इंगित करने के लिए, किसी को जताने के लिए, मुझे किसी रिचुअल की या प्रतीक की ज़रूरत है। आ रही है बात समझ में?

आदमी को जड़ बना देता है कर्मकांड के प्रति अंधा अनुशासन।

छोटे बच्चे होते हैं, मैंने देखा है उनको, ‘चलो ऐसा करो, ऐसा करना होता है, करो।’ तुमने डर बैठा दिया उसके भीतर। ‘चलो बेटा जे जे बोलो, जे जे बोलो।’ मैंने उन्हें सही में जे जे बोलते सुना है। उन्हें तुम डाल तो रहे हो इंटरनेशनल मीडियम में, हिंदी तुमने उनको सिखाई नहीं। वो सचमुच जे जे बोल रहे होते हैं। उनसे कुछ पूछोगे तुम, गॉड माने क्या? तो लिखेंगे जे जे।

न वो जय जानते हैं, न पराजय जानते। तुम क्या करवा रहे हो उनसे? तुमने बचपन से ही उनकी चेतना पर प्रहार कर दिया, उन्हें लकवा मार जाएगा भीतर से। समझाना एक बात होती है और प्रथा का अंधा अनुकरण बिल्कुल दूसरी बात होती है। फिर आप अगर हिंदू हो तो आप श्रुति के धर्म से हो। बताओ, श्रुति में कहाँ लिखा है ये सब? ये सब प्रथाएँ तो किसी समय पर किसी जगह पर शुरू हुईं और इसीलिए प्रथाएँ जगह-जगह पर इतनी बदलती रहती हैं। कहीं कुछ चलता है, बोलते हैं न, हमारे यहाँ ऐसा करते हैं, हमारे यहाँ ऐसा।

सबके यहाँ शादी-ब्याह एक तरीक़े से होते हैं? सब जगह अलग-अलग तरीक़े से हो सकते हैं। तो इसमें क्या सनातन है? जो चीज़ हर चार कोस पर बदल रही है, उसमें सनातन क्या है? बहुत सारे तो अब तेरहवीं भी तीसरे दिन कर देते हैं। क्या सनातन है? वो पंडित ही आके करा जाता है। तीसरे दिन तेरहवीं। मैंने कहा, ये देखो, ये असली आध्यात्मिक आदमी है। इन्होंने समय की गति ही बदल दी, तीन का तेरह। मैंने कहा, देखा, समय मिथ्या है, माया है।

और फिर जब पाते हो कि तुम्हारी इन प्रथाओं में कुछ रखा नहीं है, तो तुम उनके लिए झूठे वैज्ञानिक आधार गढ़ते हो। बिल्कुल झूठे, ताकि किसी तरीक़े से ये जो भी पुराना प्रवाह है, इसको तुम कायम रख सको। ‘वो लड़की का कान छिदवाने से उसकी कामवासना कम हो जाती है, नहीं तो वो ना व्यभचारिणी बन जाएगी, पराए मर्द के पास चली जाएगी।’ ये तुक है! लड़की के दोनों कान छेद दो, इससे उसकी कामवासना नियंत्रण में रहती है। तो कामवासना ज़्यादा पुरुष में होती है, बलातकारी तो वही घूम रहे होते हैं इन सबका पकड़ के सब छेद ही दो। अगर इसी से कामवासना नियंत्रण में आती है तो।

कोई भी कर्म तब सही है जब सत्य से उठता हो ज्ञानी के मामले में, या सत्य की ओर ले जाता हो अज्ञानी के मामले में। प्रथा भी अच्छी हो सकती है, अगर वो सत्य की ओर ले जाती हो, समझदारी की ओर, ज्ञान की ओर ले जाती हो तो वो प्रथा अच्छी है। पर जिस प्रथा के साथ कोई समझ जुड़ी ही नहीं है, उस प्रथा में क्या रखा है?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं अभी एक हफ्ते से गुवाहाटी से यहाँ पर आई हूँ, जॉब के लिए जॉब जॉइन किया। और मेरा जो बचपन रहा है वो हर तरह के डोमेस्टिक वायलेंस को देखते हुए बड़ी हुई हूँ। तो वो सब बातें मुझे हमेशा डराती रहती हैं और मैं यहाँ जॉब पर भी आने के लिए बहुत बहुत कुछ हुआ घर पे। लगभग एक-दो महीने से ऐसी चीज़ें चल रही थीं और इसके वजह से मैं बहुत अंदर से डरी रहती हूँ और एक भीतर हीन भावना रहती है हमेशा कि मैं कुछ कर नहीं पाऊँगी या जो भी है। तो एंड में तो उन लोगों को मैं मना ली, लड़के या जो भी उनको अपनी बातें कह गई कि मैं तो करूँगी और मैं जाऊँगी जॉब के लिए। लेकिन मेरे भीतर वो सब बातें हमेशा, मतलब मुझे हीन भावना जो रहती है कि मैं बहुत कुछ कर नहीं सकती, वो ख़त्म नहीं होती है।

आचार्य प्रशांत: उसको प्रमाणित कर दीजिए भावना को कि आप कुछ कर सकती हैं। वो भावना काल्पनिक है। पर कुछ और कल्पना करके आप पुरानी कल्पना को नहीं हटा पाएँगी, क्योंकि पुरानी कल्पना ज़्यादा पुरानी, ज़्यादा गहरी है। तो कोई तर्क उसको काटने में उतना मददगार नहीं होगा। प्रमाणित ही कर दीजिए न। वो यही तो कहती है भावना, कि तेरे बस की नहीं है, तुझसे कुछ नहीं होगा। करके दिखा दीजिए। आप येाँ नौकरी के लिए आइए। नौकरी करिए, जम के करिए। अच्छी नौकरी करिए। पहली नौकरी ठीक नहीं है तो उससे बेहतर नौकरी करिए, सार्थक काम करिए। पैसा कमाइए। ख़ुद को भी साबित हो जाएगा, दुनिया को भी साबित हो जाएगा कि हाँ, मैं कर सकती हूँ। कौन कहता है नहीं कर सकती।

और फालतू के विचार तभी तक दिमाग़ में आते हैं जब जीवन खाली होता है। जीवन को सार्थक काम से भर दीजिए तो आगे-पीछे के पुराने, आगे के, न तो स्मृतियाँ आएँगी, न आगे की आशाएँ आएँगी। काम रहेगा, उसी में डूब जाइए। वो जब काम रहता है तो उससे अपने आप प्रगति हो जाती है। खाली बैठेंगे तो यही सब अनुभव हैं पुराने और यादें वही कचोटती रहेंगी। जान लगा करके जो आज संघर्ष है, उसको स्वीकारिए, भिड़ जाइए।

एक योद्धा जो जूझ रहा हो, उसको समय मिलेगा क्या पुरानी बातें सोचने का? अर्जुन बाण चला रहे हैं और याद कर रहे हैं कि भीम ने कैसे एक बार पटकी मारी थी। याद आएगा? और भीम तो रहे ही होंगे ऐसे। ऐसा हो ही नहीं सकता। सोचो ऐसे तीर लगा रखा है सामने वाले के और इधर देखा तो वहाँ भीम खड़े हैं। यानी बचपन में न, ये बहुत मारता था। आगा पीछे कुछ नहीं याद आता।

जॉब मिल गई है न? और अभी जिस भी तरह की मिली हो, और बेहतर जॉब खोजिए। ऐसी-ऐसी नौकरी करिए कि श्रीकृष्ण भी जिस पर कहे कि हाँ, ये काम ठीक कर रहे हो। ठीक है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक छोटा सा क्वेश्चन और था कि अभी अपने खाने को लेकर बात करी थी। तो मैं अपने आप को अगर ऑब्जर्व करती हूँ, तो मैं देखती हूँ कि मेरा ज़्यादातर दिमाग़ न खाने को लेकर ऑक्युपाइड रहता है। मतलब अगर मैं ऑफिस में भी हूँ, तो मुझे ये रहता है कि लंच होने वाला है, तो मतलब वैसा वाला रहता है, या फिर ऑफिस से जा रही हूँ तो शाम में मुझे क्या खाना है। और मतलब ये जनरली ऐसा होता है कि ये ज़्यादातर तब होता है जब मैं मेरा मूड ऑफ़ रहता है या फिर किसी चीज़ से एस्केप करने की कोशिश में रहती हूँ। अगर सब कुछ सही चल रहा है, तो फिर ऐसा माइंड न।

आचार्य प्रशांत: इतना ज़्यादा खा लिया करो कि बद्दुआएँ दो खाने को। कोई खाना लेके आए तो उसे मारने दौड़ो। ऐसे गैस बन जाए, ऐसे फूल जाओ। बिस्तर पर पड़े हो, इनो ले रहे हो, सर्जरी हो रही है। इतना खा लिया। क्या बोलूँ मैं? और क्या?

छोटे-छोटे मील्स लेके चलो और क्या, ज़्यादा लग रहा है अभी लंच में एक घंटा है, कुछ निकाल के खा लो उसमें से। और अपने साथ खेल खेलने पड़ते हैं, झाँसा दो ख़ुद को। एक डब्बा ले लीजिए, उसमें तीन-चार छोटे-छोटे पैकेट्स बना लीजिए, कि हर एक को दो-दो घंटे बाद उठाती जाऊँगी। चार पैकेट हैं, हर दो घंटे में एक उठा के खा लूँगी। हो गया, और क्या करोगे? यही सब होता है।

मैंने कभी नहीं करा, मैं ऐसे ही बोल रहा हूँ। मुझे ये नहीं पता, ये सब क्या होता है। ठीक है? पता नहीं, देखिए।

प्रश्नकर्ता: सर, ऐसा लगता है कि जैसे माइंड किसी चीज़ को एस्केप करने की कोशिश कर रहा है। मतलब कुछ ऐसा है।

आचार्य प्रशांत: हाँ तो वही है, और क्या है? अब मुझे तो नहीं लग रहा आपको देख के कि बहुत खाते हो। पर जो असली काम है, जो सामने से बचने के लिए सोच रहे हो, एक घंटे बाद लंच होगा। ताकि जो ये काम है, ये न करना पड़े। यही है और थोड़ी कुछ। आगे नहीं पता मुझे, इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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