बेटों को अगर वही सब कुछ करना है जो पूरी दुनिया करती है, तो आप वीकेंड पर गोवा में ये गीता क्यों पढ़ रही हैं? पूरी दुनिया ये तो नहीं करती। या मीठा-मीठा ख़ुद खाना है और इधर-उधर की गड़बड़ बच्चों को खिलाना है? पूरी दुनिया जो कर रही है, अगर वही करना है तो आप यहाँ क्यों मौजूद हैं? आपकी छोड़िए, मैं यहाँ क्यों मौजूद हूँ? मैं भी वही करता हूँ जो पूरी दुनिया कर रही है। मुझे यहाँ क्या करना है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी जो आप भावना की बात कर रहे थे, मेरा प्रश्न वही है कि मेरे दो बेटे हैं। उनको मैंने गीता–सत्रों से जोड़ा हुआ है। तो वो पढ़ाई–लिखाई सब अच्छे से करते हैं। अक्चुअली मेरे बड़े बेटे ने संस्था भी ज्वाइन की थी, बट उसकी पढ़ाई नहीं हो रही थी तो वो छोड़ के वापस आ गया। तो मतलब मैं बहुत स्वार्थी हो जाती हूँ इस बात में कि बाक़ी के बच्चे जैसे कर रहे हैं, मतलब आउटर वर्ल्ड में, तो मैं ये चाहती हूँ कि वो सब करें। फिर एक बात आ जाती है कि उनको जो यहाँ पर मिल रहा है, वो समझ जो मैं देख पा रही हूँ उनमें, बहुत समझ आ गई है दोनों में, तो वो भी चाहिए होता है।
और एक मेरा स्वार्थ जो रहता है कि वो मतलब बाक़ी चीज़ों में जैसे अदर बच्चे जो करते हैं वो करें; जॉब करें, अच्छी लाइफ़स्टाइल तो वो भी चाहती हूँ। वो मेरा स्वार्थ ही है, समझ में आता है। और मैंने पढ़ा था कि जो ममता होती है, वो मतलब जो प्रकृति ने हमको जो दिया हुआ है ज़्यादा, तो वो हमारा हथियार बनना चाहिए। बट ये मेरा बंधन बन रहा है, मेरी कमज़ोरी बन रहा है। तो मार्गदर्शन करिए, प्लीज़।
आचार्य प्रशांत: तो बेटों को अगर वही सब कुछ करना है जो पूरी दुनिया करती है, तो आप




