
ज़्यादा सोचने की समस्या ही तब होती है जब आप कर्म का स्थान विचार को दे देते हैं। जो कर्म में डूबा हुआ है, उसको सोचने का अवकाश कहाँ? जितनी ऊर्जा, जितना समय सोच को दे रहे हैं, यदि आप उस काम को दें, जो करणीय है, जो उचित है, तो आपको फ़ुरसत ही नहीं मिलेगी सोचने की! आप जीवन के जिस भी मुक़ाम पर खड़े हैं, जितनी भी रौशनी है, उस पर आगे बढ़िए। व्यर्थ सोचना-विचारना अपने आप ख़त्म हो जाएगा।



प्रश्नकर्ता: गुरू जी, अपनी बातों से सबके जीवन का रस क्यों ख़त्म कर रहे हो? कुछ तो एक्साइटिंग (रोमांचक) रहने दो। सब ज्ञानी हो जाएँगे तो दुनिया बड़ी अजीब हो जाएगी।








होश का मतलब यही होता है — अपनी वर्तमान हालत के प्रति ईमानदारी। सब जानते हैं पर भीतर इतनी तामसिकता भरी हुई है कि कौन संघर्ष करे इस कैद, इस पिंजड़े, इस कसाई के ख़िलाफ़।मदद मिलती है, सहारे आते हैं, चमत्कार होते हैं थोड़ा भरोसा तो रखो। और नहीं होंगे चमत्कार तो अधिक–से–अधिक क्या होगा? मर ही तो जाओगे, मर तो वैसे भी रहे हैं। तो भविष्य की नहीं सोचनी है, वर्तमान के ख़िलाफ़ विद्रोह करना है। जो भविष्य की सोचते हैं, उनका वर्तमान वैसा ही चलता रहता है जैसा चल रहा है।
प्रश्नकर्ता: मेरे पति एक ऐड इंडस्ट्री (विज्ञापन उद्योग) में काम करते हैं। तो उनका पूरा समय जवान और सुन्दर महिलाओं के साथ बीतता है। जिसके वजह से मैं बहुत स्ट्रेस (तनाव) में रहती हूँ, पजेसिव (अधिकारात्मक) हो जाती हूँ, इनसिक्योर (असुरक्षित) हो जाती हूँ। तो मैं सारे हथकंडे अपना चुकी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आचार्य जी मुझे असफलता से बहुत डर लगता है। मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ। मन पढ़ते-पढ़ते परिणाम के बारे में सोचने लगता है और फिर बिल्कुल जम जाता है, डर लगता है आगे बढ़ने में। मैं डांसिंग ब्वाय कैसे बनूँ जिससे पढ़ाई भी…
भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।
तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।
आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

ज़्यादातर लोग बाहर जी-तोड़ मेहनत करते हैं। लेकिन उनकी भीतरी दुनिया खाली, खोखली, कुछ नहीं, क्योंकि वो सारी मेहनत भीतर के केन्द्र को बदलने के लिए नहीं की गई होती है। वो जो आप बाहर खूब सारी मेहनत करके खूब सारे पैसे कमा रहे हैं, वो सिर्फ़ इसलिए कमा रहे हैं, क्योंकि आप अपनी आन्तरिक असुरक्षा को बचाए रखना चाहते हैं। आप भीतरी तौर पर एक डरे हुए आदमी हैं, इसीलिए बाहरी तौर पर आप बहुत मेहनत करते हैं। तो करते रहो बाहर कितनी भी मेहनत, आन्तरिक प्रगति कुछ नहीं होगी।

पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…

ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर।

आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।

हमारी खाल का रंग क्या है? हमारी हाइट क्या है? हमारा जेंडर क्या है? हम किस घर में पैदा हुए? इनका हम कुछ नहीं कर सकते। तो अगर इसको लेकर आपको तनाव होता है या ईर्ष्या होती है, तो इसका मतलब है कि जो प्राकृतिक चीज़ें हैं, उससे ज़्यादा आइडेंटिफ़ाइड हैं। ऐसी चीज़ से हमें आइडेंटिफ़ाई ही नहीं करना है, जिसमें हमारा कोई रोल ही नहीं है। हमारा बस कहाँ चलता है? हमारे चुनाव में। चेतना का काम है चुनाव करना, आप अपने चुनावों की फ़िक्र करो कि मैं सजग रहूँ और ज़िंदगी में सही चुनाव करती चलूँ।

सतत् अवलोकन ऐसा होता है – लगातार चलता रहे। अपने आप को देखते रहो। देखते रहो – क्या चल रहा है? क्या कर रहे हो? क्या बोल रहे हो? कहाँ अपने आप को धकेल रहे हो? किन बातों में निवेशित हो रहे हो? किस बात से बिल्कुल घबरा के भाग ही जाते हो? क्या इरादे बना रखे हैं? योजनाएँ क्या हैं? यही सब। जो कुछ भी चल रहा है जीवन में, उसका सतत् निरीक्षण करना होता है। पिनपॉइंटेड निरीक्षण नहीं करना होता, फुल बॉडी स्कैन चाहिए।

समझ आ गया जैसा कुछ नहीं होता है, समझते रहना होता है, एक सतत प्रक्रिया है। दुनिया को समझना है न, तो स्वयं को समझ लो, पर्याप्त होता है।

कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

ये जीने का एक नया तरीक़ा है, क्योंकि हम तो हासिलियत की ही भाषा और ज़िंदगी जानते हैं न। हम कहते हैं, कहीं गए हैं, तो वहाँ से कुछ प्राप्ति हो जाए। यहाँ खेल प्राप्ति का है ही नहीं। यहाँ से भी उठ के जाओ तो ये मत कहना, कि ये प्राप्ति हो गई, ये जान लिया, ये समझ लिया। तुम थे, वो ज़रूरी है, तुम्हारा होना क़ीमती है, वही निष्कर्ष है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

जब तक अपना कुछ नहीं होगा जीवन में, तब तक तो परायों पर आश्रित रहोगे ही न। अपने आप को किसी भी चीज़ से बाँधकर, जोड़कर मत देखो — जिससे भी जुड़ोगे, गुलाम हो जाओगे। क्योंकि गुलामी का मूल कारण होता है — धारणा। तुमने अपने और संसार के बारे में किसी मान्यता को सच का दर्ज़ा दे दिया है, जो सत्य तो छोड़ दो, तथ्य भी नहीं है। आज़ादी तो अकारण होती है। अपने आप को अपनी सारी मानसिक उठा-पटक से अलग रखो। अपनी निजता को अक्षुण्ण रखो, अस्पर्शित रखो।

तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

जब भीतरी बदलाव आता है तो बाहरी बदलाव की भी माँग करता है, और जो बाहरी बदलाव से बचेंगे, उनका भीतरी बदलाव बाधित हो जाएगा। बाहर से आज़ादी की प्रेरणा आ रही होगी पर भीतर आपने क्या बैठा रखा है? ग़ुलामी। वो जो बाहरी प्रेरणा है, उसे भी बहुत-बहुत लंबे साल लग जाते हैं आपकी भीतरी ग़ुलामी को हराने में। जिन्हें भीतरी बदलाव चाहिए, उन्हें बाहरी बदलाव के लिए तैयार रहना पड़ेगा। वो क़ीमत है — चुकानी पड़ती है।

मन एक रस्सी की तरह है, जिसे दस दिशाओं से — भविष्य, अतीत, रिश्ते, सोशल मीडिया जैसी ताक़तें खींचती हैं। हर कोई हमें ग़ुलाम बनाना चाहता है, और हम बनते जाते हैं; यही तनाव है। इससे मुक्त होना कठिन नहीं, बस यह भ्रम छोड़ो कि कोई सहारा चाहिए, क्योंकि जो भी आएगा, वह अपने अनुसार ही खींचेगा। इसलिए साहस जुटाओ और अपने क़दमों पर चलो — दो-चार बार गिरो, चोट खाओ, पर रस्सी की तरह मत बनो: बेजान, मुर्दा, ग़ुलाम।

अध्यात्म के बिना, चाहे हम बाहर कितना भी कुछ पा लें — पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान — फिर भी डर और तनाव से नहीं बच पाते। व्यक्ति के पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिसे संसार का कुछ भी छू न सके — जिसका उल्लेख श्रीकृष्ण अर्जुन से करते हैं: ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’; न शस्त्र उसे काट सकते, न अग्नि जला सकती है। पहले झूठ काटना पड़ेगा। जैसे-जैसे वो कटता जाता है, वैसे-वैसे तुम उसको पाते जाते हो जो बिल्कुल तुम्हारा अपना है। उसके बाद कोई बाहरी दबाव तुमको परेशान नहीं कर पाएगा।

आत्म माने ‘सेल्फ’ की जितनी गतिविधियाँ हैं, जिनमें विचार और कर्म शामिल होते हैं, उनको जानना ही आत्म-ज्ञान है। मन क्या कर रहा है, क्या कह रहा है — इस पूरी प्रक्रिया का ज्ञान। देखो कि कोई सामने से गुज़र जाता है तो क्या विचार आता है? टी.वी. में कोई कार्यक्रम आ रहा है तो उसे किस दृष्टि के साथ देखते हो? जो कर रहे हो, वही देख लो — यही आत्म-ज्ञान है।

इसका कोई इलाज़ नहीं है न। अगर तुम जानवर ही हो तो इसका कोई इलाज़ नहीं है। इसका इलाज़ तो सिर्फ़ तभी है, जब ऊँची चेतना के इंसान बन पाओ। और उसके लिए तुमको आना होगा वेदान्त की ओर, उपनिषदों की ओर और कोई तरीका नहीं है। वरना ये जो बात है चकाचौंध में फसने की, हीन भावना में फसने की, ईर्ष्या में फसने की, ये सब तो एक छोटे बच्चे में भी होती है।

काम तनाव तभी देता है जब आप काम सही कारणों से न कर रहे हों। जब आप सही कारणों से काम नहीं करते तो आप दो ही चीज़ों का इंतज़ार करते हो — एक रविवार का और दूसरा सैलरी डे का। काम का अंतिम उद्देश्य पैसा नहीं हो सकता। आपको काम में अर्थ ढूँढना पड़ेगा। कुछ ढूँढिए जिसमें सौंदर्य हो, सार्थकता हो, बड़ी कोई चुनौती की बात हो। तब फिर उस काम में आप घंटे नहीं गिनते, उस काम में आप परिणाम की ओर भी नहीं देखते।

और वो जो नियति है वो आपके चाहने से, कहने से बदलनी नहीं है। कौन जाने जितना भी है यूज़ मी। पूरा इस्तेमाल कर लो। मेरी परवाह नहीं करो। मेरा इस्तेमाल करो। पूरे तरीके से निचोड़ लो मुझको। और वही मैं चाह रहा हूं। इसमें कुछ ऐसा नहीं है कि मेरा शोषण हो जाएगा। मैं वही चाह रहा हूं। पूरे तरीके से एक-एक बूंद निचोड़ लो। शरीर जले तो बस शरीर जले। कुछ बचा नहीं। पहले ही सब निचुड़ गया था। यमाचार्य आके खड़े हुए। उन्हें कुछ मिला ही नहीं। खाली हाथ लौटना पड़ा। कहां गया इसका सारा माल? वो मैंने बांट दिया था। पहले ही बांट दिया था।

साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।

एक रुपया अपने ऊपर मत खर्च करो अगर तुम्हारी ज़िंदगी किसी बुलबुले की तरह है। पर ज़िंदगी को ही अगर मिशन बना सकते हो, तो तुमने अपने ऊपर नहीं, मिशन के ऊपर खर्च करा है। वही कन्वर्जेंस, तुम्हारी ज़िंदगी ऐसी हो जाए अगर कि तुम्हारे लिए है ही नहीं, तो फिर कर सकते हो अपने ऊपर खर्च। तुम्हारी ज़िंदगी अगर इसीलिए है कि तुम्हें व्यक्तिगत तौर पर रसास्वादन करना है, चाट-पकौड़े झाड़ने हैं, तो फिर लानत है कि तुम यहाँ बैठकर चाट उड़ा रहे हो और बगल में कोई भूखा मर रहा है।

स्वार्थी होना गलत नहीं है, गलती तब है जब आपको अपना स्वार्थ पता ही न हो। जब मन पर डर और पुराने संस्कारों की धूल होती है, तब साफ़-साफ़ नहीं समझ में आता कि अपना स्वार्थ कहाँ है। इसलिए अध्यात्म चाहिए, जो आपको बताता है कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है। एक बार जब जान जाओगे कि अच्छा क्या है, तब ये परवाह नहीं करोगे कि कीमत क्या देनी पड़ेगी, कौन अच्छा बोलेगा, कौन बुरा बोलेगा? क्योंकि अपने लिए कुछ अच्छा करना बहुत अच्छा काम है। यही जीने का तरीका है।

विधि तो एक ही है, जो भीतर बैठ कर के बोलता रहता है, मैं हूँ, मैं हूँ, उसके झूठ को बार बार रंगे हाथों पकडते रहो। इरादा नेक हो तो हर चीज़ विधि बन जाती है। घर पर जाएँगें अपने भाई बहनों को देखेंगे कहेंगे मैं कैसे कह दूँ मेरी शक्ल मेरी है, ये मेरा भाई है नालायक, इसकी शक्ल भी मेरे जैसी है। फिर दादा को देखेंगे कहेंगे कैसे कह दूँ कि मेरी जो चपटी नाक है, यह मेरी है, ये तो दादा की नाक है। तो जब मेरा सब कुछ किसी और का है तो मैं कहाँ हूँ या तो मैं कह दूँ, ‘मैं हूँ ही नहीं या मैं कह दूँ कि सब मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ,’ जैसे मुनि अष्टावक्र कहते हैं न, या तो मैं कुछ नहीं हूँ या फिर मैं सब कुछ हूँ।

दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केचुए की तरह थोड़े ही है कि किसी भी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, ऑंखों में ताक़त झलकनी चाहिए! कुछ बोलो तो उसमें साहस हो और संकल्प हो! आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए…

जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…

तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम्हें सही और गलत का ज्ञान नहीं है, बल्कि यह है कि सही राह सामने होने पर भी तुम उस पर दो कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। तुम्हें केवल अंतिम मंज़िल की उत्सुकता होती है, और आलस तुम पर हावी रहता है। जो सही और उचित प्रतीत होता है, वहां तक होशपूर्वक चलो और उसके प्रति निष्ठा रखो। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, राह स्वयं खुलती जाएगी।

डर और तनाव मूलतः इसी भाव से निकलते हैं कि कोई दूसरा है जो मेरा कुछ छीन सकता है और कोई दूसरा है जो मुझे कुछ दे सकता है। जब तक तुमने यह धारणा बाँध रखी है, डर और तनाव से मुक्ति संभव नहीं। सदा अपने आपको यही बताओ — मैं लाख गिरूँ तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। जब इस भाव में जियोगे, तब न डर रहेगा न तनाव।

जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।

तुम्हारी जिज्ञासा को ही मार दिया गया है, तुम्हारी धार को कुंठित कर दिया गया है। तुम्हारा मन कोई प्रश्न करने लायक ही नहीं बचा है, तुम डर गये हो। तुम्हें लगता है, सवाल कर देंगे तो भगवान जी नाराज़ हो जाएँगे। याद रखना कि जो मन इन कथाओं पर सवाल नहीं कर सकता, जो इन कथाओं के मर्म तक नहीं पहुँच सकता, वो फिर अपने जीवन पर भी सवाल नहीं उठा पाएगा।

हम कहते हैं न कि ये पाँच इन्द्रियाँ तो झूठ दिखाती हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ सब झूठ हैं। ‘सच देखना है तो दो आँखों से नहीं, तीसरी आँख चाहिए होगी।’ कहते हैं न ये सब? और हम कहते हैं, ‘कानों से सच सुनाई नहीं देता, सच तो मौन में है, शब्द में नहीं।’ कहते हैं? वास्तव में वो बातें भी अतिश्योक्ति जैसी हैं। इन्हीं दो आँखों से सच दिखाई देता है, इन्हीं दो कानों से सच सुनाई भी देता है। अनहद इन्हीं दो कानों से सुनोगे, नीयत होनी चाहिए।

ये जितनें धूर्त हैं, ये कभी ये नहीं बताने आएँगे कि हम जितनें मूर्खतापूर्ण रास्तों पर चले हैं उनका हमने क्या कष्ट भोगा है, क्या अंजाम सहा है, उल्टे ये तुमको बताने आएँगें कि सही रास्ते न, अरे रे रे रे; काँटे ही काँटे बिछे हैं। तुम ऐसे रास्ते का ज्ञान दे रहे हो जिस रास्ते पर तुम कभी चले ही नहीं, तुम होते कौन हो? मत करो फ़ालतू लोगों की संगति वो तुम्हें कुछ नहीं भी बोलेंगे न तो उनके मुँह पर कुछ ऐसा होगा कि तुम थोड़े बिगड़ जाओगे; सिर्फ़ उसकी शक्ल देखने भर से बिगड़ जाओगे।

दुनिया आपको तोड़े वो एक संयोग होगा। हम उस संयोग से घबराते रहते हैं कि बाहर निकलेंगे, न जाने किस पग पर, किस चौराहे पर, कोई हम पर आघात कर दे और हम सह नहीं पाएँगे, हम बिखर जाएँगे। इतना क्यों इन्तज़ार कर रहे हो कि कोई और आकर आपको तोड़े? खुद ही खुद को तोड़ लो और देख लो कि बिखरते हो कि नहीं। पाओगे कि बिखरते तो हो, पर फिर सिमट भी जाते हो।

किसी अपने ही नीचे वाले से तुलना करके अपने आप को बस धोखा दिया जा सकता है। अपनी तुलना किसी ऐसे से करो, जो तुलना के पार चला गया हो। ये वो लोग होंगे, जिन्होंने जो कुछ भी तोला जा सकता है, उसके पार कुछ अर्जित करना चाहा। अपनी तुलना ऐसों से करो, जिन्होंने प्रेम, करुणा, आनंद और मुक्ति को ज़्यादा कीमत दी हो।

आप एक बन्धन छोड़ते हो तो दूसरा पकड़ लोगे। आप जब तक हो बन्धन अनिवार्य है। बन्धन को छोड़ने को तो एक बार को हम फिर भी रज़ामन्द हो जाएँगे, बँधे हुए को छोड़ने को रज़ामन्द नहीं होते। और जिसे बँधना ही है वो बेड़ियाँ तलाश लेगा, तुम लाख कोशिश करो उसे आज़ाद रखने की वो बेड़ियाँ तलाश लेगा। उसे बहाने मिल जाएँगे और उसके बहाने तर्कयुक्त होंगे, तुम उसके बहानों को गलत नहीं साबित कर पाओगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन पर लगी चोट से कैसे उबरें?
आचार्य प्रशांत: दूसरे काम करो। तुम्हें हर्ट (दर्द) पसंद है इसीलिए उसको पकड़ के बैठे हो। वो बंदर याद है न? एक मर्तबान था जिसका मुँह बड़ा सँकरा था, बंदरिया भी हो सकती है (श्रोतागण हँसते हैं।), चलो बंदर, चलो…