प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने देखा पिछले कुछ सालों में, तो मैं थोड़ा सा रिलेशनशिप को लेकर थोड़ा ब्लंटली (दो टूक) अपनी चीज़ें शेयर करना किसी भी टॉपिक को लेकर डिस्कशन हो रहा है। तो रिलेटिव्स भी मुझसे कतराने लगे फिर बात करने से।
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप क्यों ये सब शेयर कर रहे हैं?
प्र: मैंने खुद ही सुधार किया कि ठीक है जो बात गलत लग रही है उसको एक दूसरे तरीके से भी कहा जा सकता है।
आचार्य: नहीं, मैं नहीं समझ पा रहा हूँ। ये सब मेरे सामने बैठे हैं, इनसे बात मैं बिलकुल दिल की बात कर रहा हूँ, ये सब मेरे रिलेटिव्ज हैं क्या? दिल की बात उनसे की जाए न जिनसे दिल का रिश्ता हो, रिलेटिव्ज से तो तन का रिश्ता होता है, तो उनसे आप तन की बातें कर लीजिए।
प्र: मेरा ये प्रश्न है, जो अज्ञानी आदमी होता है वो बड़ा कॉन्फिडेंट (आत्मविश्वासी) होता है, उसको कोई डाउट (सन्देह) नहीं होता। तो मैं पिछले चार-पाँच साल से जब से थोड़ा सा सेल्फ-एनक्वायरी आत्म-जिज्ञासा कर रहा हूँ, तो मैं पाता हूँ कि मैं रोज भ्रमित होता हूँ। रोज कोशिश करता हूँ सुलझाने की लेकिन फिर से अगले दिन और चुनौती होती है। तो मुझे कहीं स्वयं पर सन्देह भी होता है कि मैं कहीं उलझ तो नहीं रहा हूँ और एम आई वॉकिंग द राइट पाथ (क्या मैं सही रास्ते पर चल रहा हूँ)?


![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
