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ये लोरी सुनकर जगेगा भारत || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: यश बर्मन हैं, कहते हैं, नई शिक्षा नीति, दो-हज़ार-बीस, न्यू एजुकेशन पॉलिसी घोषित हुई, उसमें पाँचवीं कक्षा तक मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा पर ज़ोर दिया गया। तो कई लोगों ने बड़ा विरोध किया है, कहा जा रहा है कि जब पूरा देश, सब छात्र और उनके अभिभावक भी, अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल माँग रहे हैं तो फिर मातृभाषा पर ज़ोर देने की ज़रूरत क्या है।

तो नई शिक्षा नीति कहती है कि कम-से-कम पाँचवीं कक्षा तक, शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को रखा जाए। इसको अनिवार्य नहीं किया गया है, चीज़ वैकल्पिक है, राज्यों के ऊपर है कि इस बात पर वो कितना महत्व देना चाहते हैं। शिक्षा वैसे भी पूरे तरीक़े से नियम बनाने के लिए, कानून के लिए, केंद्र का विषय नहीं है। कान्करेंट लिस्ट में आता है, केंद्र और राज्य, दोनों ही, इस पर विधि बना सकते हैं।

तो ऐसा भी नहीं है कि, एकदम अनिवार्य, कंपल्सरी कर दिया गया है लेकिन फिर भी विरोध बहुत हो रहा है। और जैसा यश ने कहा कि कहा जा रहा है कि सब लोग तो अंग्रेज़ी माँग रहे हैं, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों में भी अंग्रेज़ी माध्यम के ही स्कूलों की माँग बढ़ रही हैं, वही खुल रहे हैं। तो फिर ये हिंदी पर ज़ोर देने से फ़ायदा क्या है।

नहीं यश, ऐसा नहीं है कि सब लोग अंग्रेज़ी ही माँग रहे हैं, या भारतीयों में अंग्रेज़ी के प्रति कोई ज़बरदस्त हार्दिक आकर्षण है। सब अभिभावक भागते हैं इंग्लिश मीडियम स्कूलों की ओर तो इसके पीछे एक कृत्रिम, आर्टिफिशियल कारण है। वो कारण बनाया गया है, तैयार किया गया है।

वो कारण बहुत सीधा है, भारत में जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं और हिंदी इनको रोज़गार से काट दिया गया है। अब भाषाई महत्व या गौरव अपनी जगह होता है, बड़ी बात होती है। लेकिन रोज़गार, पेट, रोटी उससे थोड़ी बड़ी बात हो जाते हैं। मातृभाषा, चाहे वो हिंदी हो या कोई और क्षेत्रीय भाषा हो, में शिक्षा के बहुत फ़ायदे हैं, और वो फ़ायदे सबको पता हैं।

आप जानते होंगे, मैं दोबारा गिनाए देता हूँ — मातृभाषा में अगर आपकी पढ़ाई हो रही है तो आप जल्दी सीखते हैं, मातृभाषा में अगर आप पढ़ रहे हैं तो आप पर बोझ, तनाव कम आता है, मातृभाषा में अगर आप पढ़ रहे हैं तो स्कूल में भी जो पास पर्सेंटेज होता है, उत्तीर्ण होने वाले छात्रों का प्रतिशत, वो बेहतर रहता है। मातृभाषा में अगर आप पढ़ रहे हैं तो घर पर अभिभावक आपकी बेहतर सहायता कर सकते हैं; बच्चे की। और मातृभाषा में अगर आप पढ़ रहे हैं तो जो ड्रॉप आउट रेट होता है माने स्कूल को, शिक्षा को छोड़ देने वाले छात्रों का अनुपात वो कम हो जाता है।

भारत में समस्या यही नहीं रही है कि एनरोलमेंट रेट, दाखिला लेने वाले छात्रों का अनुपात है, वो कम रहा है। भारत में एक बड़ी समस्या ये भी रही है कि बच्चे दाखिला तो ले लेते हैं लेकिन फिर वो धीरे-धीरे करके स्कूल छोड़ने लग जाते हैं, ड्रॉप-आउट करने लग जाते हैं। तो जब मातृभाषा में शिक्षा होती है तो उससे, ड्रॉप-आउट रेट को भी कम करने में मदद मिलती है, और बेहतर समझ पाते हैं विषयों को बच्चे ये तो बताने की ज़रूरत ही नहीं है, साधारण-सी बात है।

मातृभाषा में शिक्षा को लेकर के जो देश आज भौतिक उन्नति के चरम पर हैं, उनकी सूची बहुत लम्बी है, उससे भी आप परिचित ही हैं।

जापान का नाम लें, जर्मनी का नाम लें, फ्रांस का नाम लें, स्पेन का नाम लें और अब तो चीन का नाम भी लिया जा सकता है। तो ये जानी-मानी और सिद्ध बात है कि मातृभाषा में शिक्षा के हर तरीक़े के फ़ायदे हैं, यहाँ तक कि देश की उन्नति-प्रगति, मटेरियल प्रोग्रेस में भी जो मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा होती है एजुकेशन इन द मदर टंग और नेटिव लैंग्वेज उसके फ़ायदे सर्वविदित हैं।

तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ, भारतीयों में अंग्रेज़ी के प्रति ऐसा क्या मोह जागा हुआ है कि यहाँ हर आदमी लगा हुआ है कि अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम में ही दाखिला दिलाना है। और जैसा कहा होगा यश ने कि अब तो छोटे-छोटे कस्बों और गाँवों में भी स्कूल खुलते जा रहे हैं अंग्रेज़ी माध्यम के। तो शुरू में ही मैंने कहा था, 'उसका कारण कृत्रिम है वो कारण पूरे देश पर थोपा गया है और वो कारण है – पेट और रोज़ी-रोटी।'

रोज़गार के सारे मौकों को ज़बरदस्ती, अंग्रेज़ी के साथ बाँध दिया गया। जहाँ ज़रूरत नहीं भी है, वहाँ भी परीक्षाएँ अंग्रेज़ी में ली जा रही हैं, साक्षात्कार अंग्रेज़ी में हो रहे हैं। अभी कुछ साल पहले, मेरे ख़्याल से दो हज़ार चौदह या पंद्रह में, उत्तर प्रदेश और बिहार के छात्रों ने बड़ा प्रदर्शन किया था। और वो पूरा इसी बात पर था कि जो संघ लोक सेवा आयोग है, यूपीएससी उसकी पूरी प्रक्रिया हिंदी माध्यम के छात्रों के ख़िलाफ़ खड़ी हुई है। बड़ा मुश्किल हो गया है हिंदी भाषियों के लिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में, एक बराबर का खेल खेलना, सही तरीक़े से प्रतिस्पर्धा कर पाना। तो यही हो रहा है।

आप देखिए न, कि कितना गहरा ताल्लुक़ जोड़ दिया गया अंग्रेज़ी का और रोटी का कि कोई साधारण-सी नौकरी होगी, उसके लिए जो परीक्षा ली जा रही है, वो किस माध्यम से ली जा रही है, अंग्रेज़ी में ली जा रही है। अंग्रेज़ी में नहीं भी ली जा रही है, तो अंग्रेज़ी उसमें एक अनिवार्य हिस्सा ज़रूर है, कि ठीक है आप बाक़ी सारे अपने उत्तर आप जिस भी विषय को चुन रहे हैं, गणित हो, इतिहास हो, कुछ भी हो, वो आप अपनी मातृभाषा में लिख दीजिए। मातृभाषा कुछ भी हो सकती है, हिंदी, तमिल, बंगाली, पंजाबी लेकिन साथ ही साथ अंग्रेज़ी क्या है? एक अनिवार्य वैकल्पिक विषय। कि अंग्रेज़ी नहीं आएगी तब तो साहब, आपको नौकरी मिल ही नहीं सकती।

मैं पूछ रहा हूँ कि जो साधारण नौकरियाॅं होती हैं देश में, उनको करने के लिए मुझे समझाइए कि अंग्रेज़ी की ज़रूरत क्या है? बताइए, ऐसा कौनसा काम है, जो अंग्रेज़ी जाने बिना नहीं किया जा सकता? आप भारतीय विदेश सेवा में हों, आईएफएस में हों, तो अलग बात है। आप किसी ऐसे व्यवसाय में हों, जिसका ताल्लुक़ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से हो, आप फाॅरेन ट्रेड में डील करते हैं तो भी बिलकुल अलग बात है।

पर निन्यानवे-दशमलव-नौ लोगों को अगर ईमानदारी से देखा जाए तो अपने काम-धंधे में अंग्रेज़ी की कोई ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। लेकिन माहौल ऐसा तैयार कर दिया सरकारी नीतियों ने कि शायद आपको चौकीदार भी बनना है तो आपको अंग्रेज़ी आनी चाहिए।

खिलौना बनाने वाली, चादरें बनाने वाली, जूता बनाने वाली कोई छोटी-सी फैक्ट्री होगी जो अपना कच्चा-माल, रॉ-मटेरियल भी हिंदुस्तान से ही लेती है और उसका जो बाज़ार है, जो मार्केट जहाँ वो अपना माल बेचती है वो भी हिंदुस्तान के अंदर है। लेकिन उसके भीतर भी जो बातचीत हो रही होगी, इंटरनल कम्यूनिकेशन होगा वो अंग्रेज़ी में हो रहा होगा; सब ईमेल अंग्रेज़ी में लिखी जा रही हैं, क्यों भाई?

और अगर ग़ौर से देखा जाए तो ये करने की वजह से उस फैक्ट्री के, उस कंपनी के कॉम्पिटिटिव (प्रतिस्पर्धी) होने पर भी फ़र्क पड़ता है। क्योंकि जो बात आसानी से समझ में आ जाती आपके लोगों को, कर्मचारियों को वो बात अब मुश्किल समझ में आ रही है। इसके अलावा आप कहना कुछ और चाह रहे थे, कह कुछ और गए।

शॉप-फ्लोर पर आपने जो निर्देश हैं वो चिपका रखे हैं अंग्रेज़ी में, वो आपके कर्मचारियों को और मज़दूरों को, श्रमिकों को समझ में ही नहीं आ रहे, उन्होंने कुछ का कुछ समझ लिया। अब मुझे बताइए कि इससे आपका माल और सस्ता तैयार होगा, और बेहतर गुणवत्ता का तैयार होगा या इससे आपकी कॉम्पिटिटिवनेस, प्रतिस्पर्धात्मकता और गिर जाएगी, गिर ही जाएगी न?

चीन दुनिया भर को माल निर्यात करता है, जापान भी करता है, दक्षिण पूर्व एशिया के न जाने कितने देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था ही निर्यात केंद्रित है। मलेशिया हो गया, वियतनाम हो गया, फिलीपीन्स हो गया, कोरिया कुछ हद तक इंडोनेशिया भी, कम्बोडिया भी। क्या इन देशों में जो अंदरूनी कामकाज है वो अंग्रेज़ी में चलता है? बिलकुल नहीं। जबकि ये तो एक्सपोर्ट ओरिएंटेड इकोनॉमिक (निर्यात केंद्रित अर्थव्यवस्था) हैं; लेकिन ये फिर भी अपनी स्थानीय भाषा या मातृभाषा में काम चला लेते हैं।

भारत में न जाने वही ग़ुलामी की मानसिकता थी या नए-नवेले भारतीय शासकों का अंग्रेज़ी प्रेम था कि अंग्रेज़ी को ज़बरदस्त तरीक़े से अनिवार्य करके रखा गया। नौबत ये आ गई है कि हमारे दिमाग़ में रिश्ता जुड़ गया है रोटी का और अंग्रेज़ी का। हमारे दिमाग़ में ये बात बैठ गई है कि अगर हमें अंग्रेज़ी नहीं आती है तो हम अपने काम के क्षेत्र में पीछे रह जाएँगे, हमारी आर्थिक उन्नति नहीं होगी, हम कैरियर में तरक्की नहीं कर पाएँगे; ये बात एकदम गहरे घुस गई है हमारे दिमाग में।

तुम देखते नहीं हो, हिन्दी फ़िल्म का कोई कलाकार होता है, वो तो अपनी रोज़ी-रोटी भी हिंदी से ही कमा रहा है। लेकिन उसका कोई साक्षात्कार देखना, वो इंटरव्यू में सारी बात अंग्रेज़ी में कर रहा होगा, उसको ये जताना ज़रूरी है कि मुझे अंग्रेज़ी आती है। और ये वो आदमी है जो कि अपनी रोटी के लिए अंग्रेज़ी पर आश्रित भी नहीं है। अंग्रेज़ी देखने वालों से इसे दो कौड़ी का कोई लाभ नहीं हो रहा लेकिन फिर भी इसका सारा काम-काज अंग्रेज़ी में चल रहा होगा।

मज़ाल है कि तुम किसी अदाकारा को सार्वजनिक रूप से हिंदी बोलते देख लो; हिंदी लिखना तो बहुत दूर की बात हो गई, उसकी तो आप पूछिए भी मत। हिंदी बोलते नहीं देख सकते। हिन्दी फ़िल्म की अदाकारा होगी और उसका आप इंटरव्यू देखेंगे तो वो अंग्रेज़ी बोल रही होगी, वो भी न्यूट्रल या भारतीय एक्सेंट में नहीं, उसको एक्सेंट भी आयरलैंड का चाहिए। तभी तो ये पता लगेगा कि हमारी भी कोई हैसियत है, औका़त है, नहीं तो हिंदी तो, भिखारियों की भाषा है। और हिंदी को भिखारियों से जोड़ा गया नीतियों के द्वारा, हिंदी में या किसी अन्य भारतीय भाषा में अपनेआप में कोई बुराई नहीं है। मुझे ये बताइए, ये जो सर्किट होता है, इलेक्ट्रिकल सर्किट इसकी अपनी कोई भाषा होती है क्या? अंग्रेज़ी, चीनी, जर्मन, फ्रेंच कुछ भी।

विज्ञान और टेक्नोलॉजी भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं पढ़ाए जा सकते थे? या किताबें नहीं उपलब्ध हैं। कौनसी ऐसी ज्ञान की क़िताब है जो दुनिया की दूसरी भाषाओं में उपलब्ध है और भारतीय भाषाओं में नहीं उपलब्ध हैं, और अगर नहीं उपलब्ध है तो अनुवाद किया जा सकता है। कुछ महीनों के अन्दर बताइए कौनसी किताबें हैं जो नहीं मिल रही हैं, वो अनुवादित हो जाएँगी। बोलिए?

गेंद और बल्ले की क्या भाषा होती है। क्रिकेट खेलते हैं आप, उसमें गेंद अंग्रेज़ी बोलती है क्या, बल्ला ज़र्मन बोलता है क्या? लेकिन मैच हो और मैच के बाद जो पुरस्कार वितरण, जो प्रेजेंटेशन सेरेमनी होती है उसमें वो बेचारा नया-नया लड़का आया है, वो उत्तर प्रदेश के किसी कस्बे से राष्ट्रीय टीम में नया-नया चयनित हुआ था, उसको अंग्रेज़ी नहीं बोलनी आती, उसको मिल गया मैन ऑफ द मैच। और रवि शास्त्री उससे धाकड़ फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में कुछ बोल रहे हैं, जानते हुए भी कि उस बेचारे को आएगी नहीं। वो कुछ बोल नहीं पाया, अब वो पूरे देश के लिए उपहास का विषय बन जाएगा, मीम की सामग्री मिल गई है, तैयार हो जाओ।

वो बॉलर है, भाई! वो बीस साल का नया-नया लड़का बॉलर आया है। लेकिन यहाँ भी तुमने, उसकी हैसियत को, उसके प्रदर्शन को अंग्रेज़ी से जोड़कर देख लिया। आपको सिर्फ़ बॉलिंग नहीं आनी चाहिए, आपको बॉलिंग के साथ-साथ अंग्रेज़ी भी आनी चाहिए, ये क्या बेवकूफ़ी है।

चिकित्सा-विज्ञान की भाषा अंग्रेज़ी क्यों हो, मुझे बताओ। सब डॉक्टर अपनी मेडिसिन की किताब़ें क्यों अंग्रेज़ी में पढ़ रहे हैं, क्या वो हिंदी में उपलब्ध नहीं किताबें; और नहीं उपलब्ध तो मैं पूछ रहा हूँ, क्या लिखी नहीं जा सकतीं, अनुवादित नहीं हो सकतीं।

तो अगर सब अभिभावक भागते हैं इंग्लिश मीडियम स्कूलों की ओर, तो कारण साफ़ है। वो देखते हैं कि रोज़गार के, व्यवसाय के सारे रास्ते खुले ही सिर्फ़ एक भाषा में हैं किस भाषा में हैं, किस भाषा में, अंग्रेज़ी में। तो सब भाग रहे हैं कि अंग्रेज़ी पढ़ाओ, अंग्रेज़ी पढ़ाओ, अंग्रेज़ी पढ़ाओ। किसी को मैं दोहरा के बोल रहा हूँ कि हिंदुस्तान में वरना किसी को अंग्रेज़ी से कोई प्यार नहीं है, प्यार तो सबको देशी भाषाओं से है।

आपमें से कितने लोग जब प्यार में होते हैं तो अंग्रेज़ी गाने गाते हैं, बताइएगा? आप होंगे बड़े अंग्रेज़ी-परस्त, दिनभर आप हो सकता है, इधर-उधर अंग्रेज़ी में गिटपिट करते रहते हों लेकिन आशिक़ी तो आप भी ज़मीन की भाषा में ही करते हैं, करते हैं कि नहीं करते हैं। अंग्रेज़ी की गज़ल सुनेंगे, तो कैसा लगेगा, कहिए?

और जब आपका प्रेम प्रसंग छिड़ता है, तो शुरुआत में आप भले अंग्रेज़ी बोलते हों, पर जैसे ही थोड़ी निकटता बढ़ती है, बात शुद्ध देशी में होने लग जाती है; कहिए हाॅं या ना? तो दिल में तो हमारे हमारी ज़मीन की भाषा ही बैठी हुई है लेकिन हम करें तो करें क्या? हमारे साथ ज़बर्दस्ती की गई है। हमें मज़बूर किया गया है। अंग्रेज़ी की ओर हमें ढ़केला गया है और कहा गया अंग्रेज़ी की ओर नहीं जाओगे तो रोटी नहीं देंगे तुमको। और ये बहुत जबरदस्त गुलामी है। किसी को बेबस कर देना अपनी ही मिट्टी से, अपनी ही ज़ुबान से, दूर हो जाने को।

एक बार ज़रा खुले दिमाग़ से सोचिए, आप जो भी काम करते हैं, मुझे बताइए वो आपकी क्षेत्रीय भाषा में क्यों नहीं हो सकता, बताइए न मुझे। एक डॉक्टर है जो सिर्फ़ पंजाबी जानता है, क्या इसके कारण वो बुरा डॉक्टर हो गया, कहिए? क्या कोई बहुत ऊँचे दर्ज़े का डॉक्टर नहीं हो सकता, जो सिर्फ़ पंजाबी जानता हो, बोलिए? लेकिन नहीं आपको अगर डॉक्टर बनना है तो अंग्रेज़ी पढ़कर ही डॉक्टर बनोगे साहब, ये बात क्या है?

कानून की पढ़ाई सिर्फ़ अंग्रेज़ी में ही हो सकती है? आप जानते हैं, बहुत लंबे समय तक न्यायालयों में भाषा सिर्फ़ और सिर्फ़ क्या चल सकती थी, अंग्रेज़ी में। इस पर भी धरना प्रदर्शन करना पड़ा तब जा करके थोड़ा बदलाव आया, ज़्यादा बदलाव अभी भी नहीं आया है। आपको न्याय सिर्फ़ अंग्रेज़ी में ही मिल सकता है, हिंदी हो, मलयालम हो, गुजराती हो, ये अन्याय की भाषा हैं क्या कि इनमें आपको इंसाफ़ नहीं मिल पाएगा, बोलिए?

और बड़ी भद्दी स्थिति पैदा हो जाती है। दो ऐसे लोग हैं आमने-सामने जो दोनों ही अंग्रेज़ी में पारंगत नहीं हैं — आपको मालूम है जितने भी शिक्षा बोर्ड हैं उनमें फेल होने वालों में अक्सर सबसे ज़्यादा अनुपात किस विषय का रहता है? उदाहरण के लिए यूपी बोर्ड के नतीजे़ घोषित होंगे दसवीं कक्षा के, उसमें देखा जाएगा कि ये जो सब फेल हुए हैं ये अधिकांशतः किस विषय में अटक गए। तो जानते हैं, नंबर एक या नंबर दो पर कौनसा विषय रहता है, अंग्रेज़ी।

अब ये अज़ीब बात है, नहीं आती भाई! वो हमारी ज़मीन की भाषा नहीं है, लोग उसमें सिद्धस्त नहीं हो पाते, वो हमारी ज़बान पर चढ़ती ही नहीं हैं, वो बाहरी चीज़ है, बाहरी ही चीज़ है। हालाँकि अब कोशिश बहुत की जा रही है ये कहने की कि साहब अब वो किंग्स इंग्लिश नहीं रही है अब वो सिंग्स इंग्लिश हो गई है, इट्स ऐन इंडियन लैंग्वेज नाउ, नहीं है, नहीं है भाई!

वो शून्य दशमलव शून्य एक प्रतिशत इलीट (उच्च वर्ग) के लिए होगी भारतीय भाषा। भारत के लिए अभी वो भारतीय भाषा नहीं है और उसकी कोई ज़रूरत भी नहीं है। बिलकुल कोई ज़रूरत नहीं है। अब आप खड़े हुए हैं वहाँ पर बैनर-पोस्टर लगे हुए हैं सब अंग्रेज़ी में, जिसमें से आधा तो आपको कुछ समझ में भी नहीं आ रहा कि लिखा क्या हुआ है, इसमें आपका भी नुकसान है आपको समझ में ही नहीं आ रहा, क्या लिखा हुआ है। और जिसने वो बैनर-पोस्टर लगाया है उसका भी नुकसान है। मान लीजिए वो किसी दुकान ने अपना विज्ञापन लगा रखा है या होर्डिंग लगा रखा है, बैनर कुछ लगा रखा है कुछ भी।

जो दुकान इतनी मूर्ख हो कि अंग्रेज़ी में लगाए और उसे पता है कि जो लोग पढ़ रहे हैं, उन्हें आधी बात तो समझ में ही नहीं आएगी, उसकी बिक्री बढ़ेगी या घटेगी? लेकिन दुकानदार भी तुला हुआ है कि अंग्रेज़ी में ही लगाना है, साहब। दुकानदार भी तुला हुआ है, ग्राहक भी तुला हुआ है, दोनों मिलकर के एक-दूसरे के सामने ढोंग कर रहे हैं, न जाने कौन किसको बेवकूफ़ बना रहा है? फ़ायदा क्या है ये करके?

एक-से-एक बड़े स्तम्भकार हैं, कॉलमिस्ट , ठीक है। नाम होगा किसी का गुप्ता, कोई मिश्रा, कोई झा, कोई कुमार, लिख किस भाषा में रहे हैं, अंग्रेज़ी में। और हिन्दुस्तान में ये भी बड़ी बात है; देखो, हिंदी में अगर तुम किसी थोड़े दुर्बोध शब्द का प्रयोग कर दो, दुर्बोध माने आसानी से न समझ में आने वाला, तो तुरंत तुम्हारी खिल्ली उड़ा दी जाती है, कि अरे साहब, हिंदी में बात करिए, ये कौनसी भाषा में बात कर रहे हैं आप। अब मैंने 'दुर्बोध' ही बोल दिया, बहुतों के लिए यही बहुत मुश्किल बात होगी, दुर्बोध; दुर्बोध बोल दिया। लेकिन अंग्रेज़ी में जब आप ऑब्स्क्योर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो आपकी इज़्ज़त बढ़ जाती है, ये अज़ीब बात है। ऑब्स्क्योर माने दुर्बोध।

आप अंग्रेज़ी में कोई ऐसा शब्द बोल दें जो किसी को समझ में न आये, मान लीजिए आप दस लोगों की महफ़िल में हैं और आपने पाॅंच ऐसे शब्द फायर कर दिए जो किसी की समझ में नहीं आए। तो अचानक आपकी इज़्ज़त बढ़ जाएगी, कोई आपसे बहस नहीं करेगा, क्या बात है, क्या बात है! बहुत लोंगों ने तो अपने कैरियर बनाए ही इस बात पर रखे हैं कि वो अंग्रेज़ी फायर किया करते हैं। उनके पास और ज़्यादा कुछ नहीं है, यही है। उन्होंने कोई और पढ़ाई की हो, न की हो यूनिवर्सिटी ऑफ थेसाॅरस से उनके पास डिग्री है। थेसाॅरस स्पेन में एक जगह है जहाँ एक बहुत विश्व विख्यात यूनिवर्सिटी है। ये बात भी मैं अंग्रेज़ी में बोल दूँगा तो मान लोगे, थेसाॅरस।

समझ में आ रही है बात?

और शुद्ध हिंदी बोल दो तुम, तो तुमसे कहेंगे, क्या भैया, क्या कहाँ से हो। बनारस से, गोरखपुर से, बलिया से कहाँ से हो। और ये बात जैसे उपहास की बन गई है, तुम्हें तुम्हारी ही नज़र में गिरा दिया गया है। मैं तुमसे जो बातचीत कर रहा हूँ, तुम्हें बेहतर कब समझ में आएगी, जैसे अभी बोल रहा हूँ ऐसे बोलूँ या अंग्रेज़ी में बोलूँ, कहो, बोलो? हम ये सारी बातचीत कर सकते हैं अंग्रेज़ी में भी।

भाषा का काम क्या है?

विचारों का आदान-प्रदान, सम्प्रेषण, संवाद, कम्यूनिकेशन है न; या भाषा का काम है दूसरे को दबाना, भाषा का काम है दूसरे में हीनता स्थापित करना, बोलो? तो अगर भाषा का काम बस यही है कि तुम जो कहना चाहते हो दूसरा समझे, दूसरा जो कहना चाहते हो तुम जानो। तो अंग्रेज़ी मुझे बताओ किस तरीक़े से अनुकूल भाषा है भारत के लिए। आज भी बीस में से उन्नीस हिन्दुस्तानियों को अंग्रेज़ी या तो बिलकुल समझ में नहीं आती, या आधी-अधूरी समझ में आती है। किस तरीक़े से अनुकूल भाषा है, बोलो तो?

बार-बार ज़बरदस्ती नारा लगाओगे इन्टरनेशनल लैंग्वेज, इंटरनेशनल लैंग्वेज — हिंदुस्तान में कितने लोगों को किसी इन्टरनेशनल चीज़ से ताल्लुक़ है मुझे ज़रा बताना, बोलो। कह तो ऐसे रहे हो जैसे यहाँ हर बंदा इन्टरनेशनल खिलाड़ी बनने जा रहा हो, इंटरनेशनल व्यवसायी बनने जा रहा हो, इंटरनेशनल फ्लाइट पर ही बस बैठने जा रहा है।

और दूसरी बात, जब ज़रूरत पड़ती है न विदेशी संपर्क की, विदेशों से व्यवहार की तो अगर तुमने अपने काम में निपुर्णता और ताकत हासिल कर रखी है तो जिनसे तुम बात करने जा रहे हो न विदेशों में, वो तुम्हारी भाषा सीखते हैं, तुम्हें उनकी भाषा नहीं सीखनी पड़ती। बात पारस्परिक ताकत की है, म्यूचुअल पॉवर इक्वेशन की है। तुम वो ताकत अर्जित करो, ताकत अर्जित करने की ज़गह तुम भाषा अर्जित करने में लगे हुए हो।

जापानियों को जब भारत में व्यापार करना होता है और जब वो भारत आते हैं और भारत में उन्होंने निवेश कर रखा है, फैक्ट्रियाँ लगा रखी हैं। तो वो लोग क्या भारत आए हैं इसलिए हिंदी, गुज़राती सीखते हैं? ऐसा कुछ नहीं करते, भारतीय उनके सामने अनुवादक, ट्रांसलेटर बनकर खड़े हो जाते हैं। भारतीय उनसे थोड़ी कहते हैं कि आप भारत आए हो न, आप अपना देश छोड़कर यहाँ आये हो — भारत उनके लिए क्या हुआ, भारत तो उनके लिए एक इंटरनेशनल डेस्टिनेशन हुआ न? जापान के लिए भारत क्या है, एक इंटरनेशनल डेस्टिनेशन है।

तो ये थोड़ी है कि जापानियों अगर भारत में व्यापार करना है तो उन्हें पहले हिंदी सीखनी पड़ेगी, वो तो जापानी लेकर आ जाते हैं। और चूँकि उनके पास ताकत है, पैसा है वो निवेश कर रहे हैं, वो इन्वेस्टर हैं, तो फिर भारतीय खड़े होते हैं, कहते हैं, 'आइए आप जापानी ही बोलिए, हम जापानी सीखेंगे।' आप जापानी बोलिए हम जापानी सीखेंगे और हम आपकी कही बात का अनुवाद करके उन्हें बता देंगे, जिन्हें जापानी नहीं आती। ये होती है सामर्थ्य। ताकत पैदा करो न।

तो पहली बात तो निन्यानवे प्रतिशत हिंदुस्तानियों को कोई अंतर्राष्ट्रीय काम करना ही नहीं है तो ये इन्टरनेशनल लैंग्वेज का गाना क्या गा रहे हो, कि अगर अंग्रेज़ी नहीं आती तो इन्टरनेशनल लैंग्वेज। तुम कितनी बार साल में इन्टरनेशनल वैकेशन लेने जाते हो — हिंदुस्तानियों, कि इन्टरनेशनल लैंग्वेज हमें नहीं आएगी। जाना तुमको चौबेपुर से मिर्जापुर है और सीख रहे हो इन्टरनेशनल लैंग्वेज, गज़ब!

घुग्घु लाल, बद्दू लाल के यहाँ रिश्ता लेकर के गए हैं और पूछ रहे हैं कि आपकी बिटिया को इन्टरनेशनल लैंग्वेज आती है कि नहीं आती है। करोगे क्या उस इंटरनेशनल लैंग्वेज का, मूर्ख?

कुछ समझ में आ ही है बात?

अंग्रेज़ी के नाम पर हमने अपनी ही भद्द पीट रखी है। दुनिया का मज़ाक बन गया है हिंदुस्तान ये अंग्रेज़ी के नाम पर — तो मैं स्तंभकारों की बात कर रहा था, तो साहब लिखेंगे अंग्रेज़ी में ज़बरदस्त। और तुम 'द गार्जीयन' उठाकर के पढ़ लो, या तो 'न्यूयॉर्क टाइम्स' उठाकर के पढ़ लो, उसको कई बार पढ़ना तुम्हें ज़्यादा सुगम लगेगा, आसान। और हिंदुस्तानियों के तुम कॉलम उठाकर पढ़ो, ऐसी हीन भावना बैठी हुई है कि जब तक वो उसमें अपनी थेसॉरस यूनिवर्सिटी का ज्ञान न डाल दें, तब तक उनको लगता ही नहीं कि कोई हमें इज़्ज़त देगा। इज़्ज़त तो हमें मिली ही तब, जब हमारे एक तिहाई वाक्य बिलकुल दुर्बोध हो जाएँ, किसी को समझ में न आएँ, तब लोग कहेंगे आहाहा! क्या बात बोली है चूँकि तुम्हारे बात में कोई बात नहीं है न, इसीलिए तुम्हें इस तरह की भाषा लिखनी पड़ती है।

समझ में आ रही है बात कुछ?

हम यहाँ जो कुछ भी कर रहे हैं मुझे बताओ क्या ऐसा नहीं है, इसमें जो किसी भारतीय भाषा में नहीं हो सकता। ये कुर्ता, बिना अंग्रेज़ी के नहीं बनेगा, ये माइक नहीं बनेगा, ये कैमरा नहीं बनेगा, येे छत नहीं बनेगी, ये पंखा नहीं बनेगा, बोलो क्या नहीं बनेगा? काग़ज़ नहीं बनेगा, कलम नहीं बनेगी, कम्प्यूटर नहीं बनेगा, कम्प्यूटर बोलता है कि बिना अंग्रेज़ी के मैं नहीं बनूँगा? कौन-सा लैपटॉप है वो, हो सकता है सोनी का हो; जिन्होंने बनाया, उन्हें तो अंग्रेज़ी आती भी नहीं। लेकिन बिलकुल हमारे भीतर ये बात, गहराई से बैठा दी गई है, क्या? कि अंग्रेज़ी नहीं तो भूखे मरोगे, नंगे मरोगे।

नीतिगत तौर पर हमारा दमन किया गया है, पॉलिसी बना-बनाकर हमें मारा गया है। और इसके लिए ज़िम्मेदार कौन, आज़ादी के बाद की सरकारें। जिनके भीतर खुद भारत के प्रति इतना अनादर था, इतना अपमान भाव था और अंग्रेज़ी के प्रति उनमें ऐसी दासता थी, ऐसी अंधभक्ति थी कि उन्होंने भारतीय भाषाओं को तो बिलकुल कचरे की तरह किनारे डाल दिया और काम-धंधे, पैसे का सारा ताल्लुक़ अंग्रेज़ी से ही जोड़ दिया।

समझ में आ रही है बात?

यही वजह है कि अब भी जब शिक्षा नीति आई है यश, और उसमें कहा गया है कि भाई, ज़्यादा नहीं तो कम-से-कम पाँचवी कक्षा तक अपनी भाषा में पढ़ाई कर लो और उस बात को भी अनिवार्य नहीं किया गया है वैकल्पिक छोड़ दिया गया है, तो भी अंग्रेज़ीदा लोगों को बड़ी तकलीफ़ हो रही है, वो कह रहे हैं, 'अरे! नहीं-नहीं-नहीं तुम नाम ही मत लो, हिंदी का, तमिल का, बंगाली का, नाम ही मत लो। गुनाह हो जाएगा अगर बच्चे ने 'अ' सीख लिया, न-न-न! इंग्लिश मीडियम।

आ रही है, बात समझ में कुछ?

देखो, दुनिया का कोई देश, कोई कौम, कोई राष्ट्रीयता नहीं आगे बढ़ सकती, अपनी भाषा अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति से कटकर के; नहीं सम्भव है। इन बातों को पिछड़ेपन की निशानी मत मान लो। जिसके पास भाषा नहीं, संस्कृति नहीं और अध्यात्म नहीं ऐसा समाज, ऐसे समुदाय कहीं के नहीं रहेंगे। ये मानसिक रोग के शिकार होंगे बस ये विक्षिप्त होकर घूमेंगे।

कितनी बार मैंने समझाया है कि संस्कृति के स्तंभों में से एक होती है भाषा। और अध्यात्म अचानक आसमान से नहीं टपक पड़ता, अध्यात्म किसी समाज में फले-फूले इसके लिए उस समाज में संस्कृति का होना जरूरी है। तो अध्यात्म माँगता है संस्कृति, अनुकूल संस्कृति और संस्कृति का संबंध है भाषा से। तुम भाषा बदल दो संस्कृति बदल जाती है, ऐसा नहीं होता कि अगर तुम भाषा बदल दोगे तो भी तुम वही इंसान रह जाओगे, जो तुम भाषा बदलने से पूर्व थे; ऐसा बिलकुल भी नहीं होता है। तुम भाषा बदल दो, तुम्हारे विचार बदल जाएँगे, तुम भाषा बदल दो, तुम्हारी भावनाएँ बदल जाएँगी।

मैं तो एक-दो दफे पहले ही बता चुका हूँ, जब आईआईटी में था तो 'एम्स' का एनुअल फेस्ट हुआ करता था 'पल्स' के नाम से। तो मैं उसमें बोलने के लिए गया, एक ही दिन में हिंदी आशुभाषण भी था और इंग्लिश एक्स्टेम्परी भी। आशुभाषण समझते हो, उसी समय पर तुमको विषय दे दिया जाएगा और दो-तीन मिनट के अंदर तुमको उस पर जा करके बोल देना है, तैयारी का मौका नहीं मिलेगा।

तो मैं पहले तो गया तो मैंने हिंदी में बोला, तो हिंदी में मुझे जो विषय दिये गये वो ऐसे थे कि भारत के किसानों की दुर्दशा के कारण, ठीक है, और फ़िल्मी गीतों का गिरता स्तर, इस तरह के कारण थे। या और ये था, त्यौहारों पर बढ़ती अराजकता और हुडदंग।

अब ये विषय दिए गए हैं हिंदी की प्रतियोगिता में, तो हम बोल आये उसमें। उसके बमुश्किल आधे घंटे बाद बिलकुल इसी के समकक्ष अंग्रेज़ी प्रतियोगिता में जा रहा हूँ, अब वहाँ पर मुझे क्या विषय दिए गए है व्हेयर आई अ लेस्बियन, वाॅट वुड यू प्रेफ़र राॅक ऑर जैज़ एण्ड व्हाई? मुझे समझ में नहीं आया, और मुझे बहुत कुछ समझ में आ गया।

मैंने कहा, ये भाषा नहीं बदली, ये संस्कृति ही बदल गई। अंग्रेज़ी में जो विषय दिए गए थे, वो हिंदी में नहीं दिए जा सकते थे, हिंदी में जो दिए गए हैं वो अंग्रेज़ी में नहीं दिए जा सकते थे। मैं लौट करके आया तो मैंने आईआईटी की मैगज़ीन में इस पर एक लेख लिखा, वो अंग्रेज़ी में ही लिखा, उसके अंत में मैंने लिखा, " आई वांट टू रीच द वंस मोस्ट ग्रेवली एफेक्टेड बाई दिस सिंड्रोम। " इसलिए अंग्रेज़ी में लिख रहा हूँ, तुम तक मेरी बात पहुँचे।

तुम भाषा नहीं बदलते हो, तुम विचार ही बदल देते हो, तुम बंदा बदल देते हो, इंसान ही दूसरा हो जाता है; जनार्दन 'जाॅनसन' हो जाता है। जो हिंदी कल तक बोलता था, वो अंग्रेज़ी का हो गया तो उसका सब बदल गया, उसकी भावनाएँ बदल गईं, विचार बदल गए, उसका प्यार बदल गया, उसकी निष्ठा बदल गई, वो इंसान दूसरा हो गया। ये बात हमें समझ में ही नहीं आ रही है।

हमको लगता है कि पहले हम हिंदी में बोलते थे, 'तुम से प्यार करता हूँ।' भाषा ही तो बदली है फिर अंग्रेज़ी में बोलने लगेंगे, 'आई लव यू,' नहीं ऐसा नहीं है। हिंदी में बोलता था, तुमसे प्यार करता हूँ, 'राधा' अंग्रेज़ी में बोलेगा, 'आई लव यू' डॉली। राधा डाॅली हो जाएगी; राधा खबरदार हो जाओ। भाषा ही नहीं बदलेगी, उसका प्रेम बदल गया, किसी से प्यार था पहले, अब किसी और से हो जाएगा।

साधारण इसका समाधान है, नीति (पॉलिसी) सही बना दी जाए। आप ऐसा माहौल तैयार कर दीजिए कि भारतीय भाषाओं में भी जो लोग पढ़ाई करके निकल रहे हैं, उनको 'लेवल प्लेइंग राउंड' मिल जाए, रोजगार के समान अवसर, प्रतिस्पर्धा करने के बराबरी के मौके।

फिर देखिए कि क्या हिंदुस्तानी माँ-बाप अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम भेजने के लिए आतुर रहते हैं, बिलकुल नहीं रहेंगे। अरे, उनके लिए भी एक सरदर्द होता है, वो आकर खड़ा हो गया है अपनी अंग्रेज़ी की क़िताब लेकर, न माँ को समझ में आ रहा, न बाप को समझ में आ रहा है; और फेल और हो रहा है वो, स्कूल के लिए भी सरदर्द है। तो कोई माँ-बाप फिर आतुर नहीं रहेगा अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा के लिए। आप बस हिंदी में और अन्य भारतीय भाषाओं में रोज़गार के खिलाफ़ पूर्वाग्रह बंद कर दो।

अभी तो हमने बड़ा अन्याय कर रखा है, जिन चीज़ों में जैसा मैंने कहा आसानी से देशी भाषा में भी काम चल जाएगा, हमने उन चीज़ों के लिए भी अंग्रेज़ी को कृत्रिम रूप से अनिवार्य बना दिया है, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं है। आप ये बंद करो फिर देखो कि कितने, इंग्लिश मीडियम स्कूल बचेंगे, सब रातों-रात बंद होंगे। इंटरनेशनल लैंग्वेज वगैरह, ये सब ज़ुमले साफ़।

प्र: एक छोटी सी बात इसमें आती है आचार्य जी, अंग्रेज़ी को कई बार एक लिंक लैंग्वेज की तरह भी कहा जाता है। और दूसरी बात ये है कि हम देखते हैं कि अगर अंग्रेज़ी हट गयी, तो फिर वो दूसरे तरह का पॉवर प्ले स्टार्ट हो सकता है।

आचार्य: जिसमें हिंदी चढ़ जाएगी, डरते हैं लोग।

प्र: उसके लिए क्या?

आचार्य: बड़े वो देखिए, दुर्भाग्य की बात है। हिंदी का जहाँ से सबसे पुरज़ोर विरोध आता है, मैं सीधे वहीं की बात करे लेता हूँ — तमिलनाडु की। अगर आप किसी तमिल बुद्धिजीवी से बात करेंगे तो वो आपको हँसकर बताएँगे कि तमिल की जो वास्तविक दुश्मन है वो हिंदी नहीं है, वो अंग्रेज़ी है। हिंदी को चलिए तमिलनाडु से दूर रखा गया तो क्या तमिल फल फूल रही है, कहिए। तमिलनाडु में भी क्या हो रहा है, अंग्रेज़ी छाई हुई है। तो ये तो वही हो रहा है कि बिल्लियों की लड़ाई में, बंदर मौज़ मार रहा है।

तमिलनाडु में हिंदी का इतना विरोध हो रहा है और सफल विरोध हो रहा है। साठ के दशक में जबर्दस्त विरोध हुआ था, उसके बाद से ये तय बात है कि तमिलनाडु में हिंदी नहीं चलेगी, और नहीं चल रही। भाई तमिल लोगों की स्वेच्छा की बात है, नहीं चल रही, तो नहीं चल रही। लेकिन उससे क्या तमिल भाषा को लाभ हुआ? नहीं, न तमिल को लाभ हुआ, न हिन्दी को लाभ हुआ, लाभ हुआ मात्र अंग्रेज़ी को।

अब ये जो मुद्दा है लिंक लैंग्वेज का, संपर्क भाषा का कि अगर किसी हिंदी भाषी को, किसी तेलुगू भाषी से बात करनी है तो कैसे करेगा? देखिए साहब, जब ज़रूरत पड़ेगी तो हिंदी वाले को तेलुगू वाले की ज़्यादा ज़रूरत होगी, तो क्या करेगा, तेलुगू सीखेगा। तेलुगू वाले को हिंदी वाले की ज़्यादा ज़रूरत होगी तो क्या करेगा, हिन्दी सीखेगा; और वो ज़्यादा आसान है।

देखिए, उत्तर भारत की और जो पश्चिम की भाषाएँ हैं, यहाँ तक कि लिपियाँ भी हैं वो आपस में बहुत मिली-जुली हैं, उन्हें सीखना भी बहुत आसान है। अनमोल के साथ बैठा था, तीन-चार रातों में पंजाबी, गुरुमुखी दोनों मैंने काम चलाऊ तौर पर ग्रहण कर ली थी। मुश्किल लगी ही नहीं क्योंकि हिंदी से और देवनागरी से उनकी बड़ी निकटता है, आप जल्दी सीख लेते हो।

इसी तरीक़े से जितनी भी द्रविड़ भाषाएँ हैं, वो भी एक दूसरे से बड़ी निकटता रखती हैं, सीखना आसान हो जाता है, तमिल, मलयालम, तेलुगु; आप सीख लोगे। उतना समय नहीं लगेगा, जितना कि आपको मैंडरिन सीखने में लगेगा या रशियन सीखने में लगेगा।

समझ में आ रही है बात?

तो हमारे लिए ज़्यादा आसान तो ये है न कि अगर हमें कोई दूसरी भाषा सीखनी ही है तो हम कोई भारतीय भाषा ही सीखें। और वो सीखनी पड़ेगी, वो अनिवार्य हो ही जाएगी। भई जैसे अभी बात कर रहा था मैं कि जब व्यापार होता है तो उसमें भाषाओं का भी आदान-प्रदान हो ही जाता है, अपनेआप हो जाएगा, उसमें कोई ऊपर नहीं चढ़ जाएगा, कोई नीचे नहीं चढ़ जाएगा। हाँ, इस बात में ईमानदारी और सतर्कता रखी जानी चाहिए कि नीतिगत तौर पर कोई भाषा, किसी दूसरे के ऊपर थोपी न जाए। ये बिलकुल सावधानी रखनी चाहिए।

अब उसमें भी किया क्या गया, ये जो थ्री लैंग्वेज फार्मूला है इससे परिचित होंगे आप। अब उसमें क्या कर दिया गया है जैसे उत्तर भारत में जब लगता है ये थ्री लैंग्वेज फार्मूला, तो वो जो थ्री है उसमें से एक जगह, एक स्लॉट अनिवार्य रूप ऐसी कौन ले जाता है, अंग्रेजी। एक स्लॉट कौन ले जाता है, संस्कृत। जो कि कोई बुरी बात नही है, संस्कृत पर हम अभी आयेंगे अभी थोड़ी देर में। जो एक बचता है स्थान, वो जो मातृभाषा है या क्षेत्रीय भाषा है उसके लिए हो जाती है। तो उत्तर भारत के जितने राज्य हैं, उसमें जो ये त्रिभाषाई सूत्र लगता है, थ्री लैंग्वेज फार्मूला, उसमें दक्षिण किसी भाषा के लिए जगह नहीं बचती। जगह क्यों नहीं बचती क्योंकि एक जगह घेरकर के कौनसी भाषा बैठी हुई है, अंग्रेजी।

अब इसी बात पर जो अपने तमिल बिरादर हैं, वो आपत्ति करते हैं। और मैं उनकी आपत्ति को बिलकुल जायज़ मानता हूँ। वो कह रहें हैं, एक बात बताओ, तुम उत्तर प्रदेश में बैठे हो, ये जो थ्री लैंग्वेज फार्मूला है, इसमें तमिल के लिए तो कोई जगह बची नहीं। उत्तर प्रदेश में तुम बैठे हो तो तुम क्या पढ़ रहे हो? हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल के लिए तुमने कोई जगह छोड़ी नहीं। वही तुम लगा रहे हो थ्री लैंग्वेज फार्मूला जब तमिलनाडु पर, तो उसमें तुम एक जगह किसको दे देना चाहते हो हिंदी को। वो कह रहे हैं, हम भी क्यों दे हिन्दी को जगह। तुम जब तमिल को जगह नहीं देते, तो हम हिंदी को जगह क्यों देंगे।

और न तमिल के लिए जगह बच रही है, न हिंदी के लिए जगह बच रही है क्योंकि एक जगह घेर कर के बैठी हुई है, अंग्रेज़ी। अरे अंग्रेज़ी को कर दो न पूरी तरह से वैकल्पिक। जिनको सीखनी होगी, वो शिक्षा की मुख्य धारा के बाहर भी सीख लेंगे। या कि आठवीं कक्षा के बाद उसको एक ऑप्शनल, वैकल्पिक विषय के रूप में उतार दो। क्यों नहीं हम ये कर सकते कि उत्तर भारत के राज्यों में भी एक दक्षिण भारतीय भाषा को सीखना अनिवार्य कर दिया जाए, कम-से-कम चार सालों के लिए?

भई, चार साल में आपको इतना ज्ञान तो आ जाएगा न कि आप थोड़ा कोई तमिल, तेलुगू की किताब पढ़ने लग जायेंगे। इतना तो हो जाएगा न कि आप तमिल गाने सुन के समझ पाएँगे, उनका भी रस ले पाएँगे, नाच पाएँगे, इतना तो हो पाएगा कम-से-कम, फ़िल्में देख पाएँगे और फ़िल्म देखना आपने एक बार शुरू कर दिया तो फिर भाषा आप अपने आप सीख जाते हैं, तो जो ये उत्तर और दक्षिण के मध्य में भी भाषाई विवाद है, इसका भी असली कारण अंग्रेज़ी ही है, तमिल और हिंदी में आपस में नहीं लड़ाइए।

ये तो मुझे बात ही बड़ी अजीब लगती है कि एक भारतीय भाषा बोल रही हो कि उसे दूसरी भारतीय भाषा से खतरा है। अरे बाबा तुम सबको एक साथ खतरा है। तमिल हिंदी से क्या डर रही है, तमिल हो, हिंदी हो, बंगाली हो, गुज़राती हो, ये सब एक साथ खतरे में हैं, ये सब भाषाएँ आपस में बहनें हैं। और इन सब भाषाओं को एक साथ खतरा है लेकिन वही जो हिंदुस्तान में हमेशा से होता रहा है, हम आपस में लड़ते रहे हैं और इसका फ़ायदा बाहर वाले उठाते रहे हैं।

तो तमिल हिंदी में खतरा देख रही है, और इसका फ़ायदा मिल रहा है, किसी और को। और सबसे खेद की बात कि तमिल जब हिंदी का विरोध करते हैं तो उससे तमिल को भी कोई लाभ नहीं हो जाता, तो थोड़ी इसमें हमें वयस्कता की ज़रूरत है, थोड़ी खुली सोच की ज़रूरत है। और उत्तर भारतीयों को इस बात से सहमत होना पड़ेगा कि तमिलनाडु से जो विरोध उठता है, वो अकारण नहीं है।

जब तक आप उत्तर भारत में एक स्थिति नहीं पैदा करते, जहाँ दक्षिण भारतीय भाषाएँ सीखना संभव हो सके, तब तक दक्षिण भारतीय भाषाओं को संदेह रहेगा, उन्हें खतरा रहेगा ही कि हमारे खिलाफ़ देखो यहाँ अन्याय किया जा रहा है। ये आपस का मुद्दा है, मिल बैठ के सुलटाया जाए। वही हालात क्यों पैदा कर रहे हो, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी। हाँ, कहिए और कुछ?

प्र: आचार्य जी, मैं एक राजस्थान के छोटे शहर से हूँ, और शुरू में मैंने दसवीं-बारहवीं कक्षा तक हिंदी में ही पढ़ाई की। और मैं विज्ञान और गणित में काफ़ी अच्छा था, लेकिन मेरा अंग्रेज़ी और इन की वजह से काफ़ी पढ़ाई में पीछे हो जाता था और रैंक केवल अंग्रेज़ी की वजह से पीछे हो जाती थी।

शुरू में मेरे माता-पिता ने मेरे को अंग्रेज़ी मीडियम में डालने की कोशिश की क्लास कक्षा तीन के आस-पास तो मैं फेल हो गया था, उस स्कूल की पढ़ाई में, और मैं काफ़ी खुश था क्योंकि उस स्कूल में गणित और विज्ञान बहुत ही घटिया स्तर की पढ़ाई जाती थी मुक़ाबले जो हमारा हिंदी मीडियम स्कूल था।

तो मेरे को काफ़ी खुशी थी कि अब मैं चैन से ये पढ़ पाऊँगा। उसके बाद मैंने आईआईटी के लिए तैयारी शुरू की तो मेरे लिए सबसे बड़ा जो संघर्ष और स्ट्रगल था, वो ये था कि जो किताबें थीं वो सारी अंग्रेज़ी में थीं। तो पहले मैं जो फिजिक्स और उनकी किताबें भी पढ़ता था वो डिक्शनरी लेकर पढ़ता था। तो मेरा काफ़ी समय उसको समझने में लगता। धीरे-धीरे वो आ गई समझ में तो मैं अंग्रेज़ी किताबें पढ़कर समझ पाता था, विज्ञान फिर मेरा आईआईटी में भी चयन हो गया। तो मेरे को एक साल लगा आईआईटी में वहाँ का जो सिस्टम था, अंग्रेज़ी सिस्टम उसके साथ कोप-अप (सामना करना) करने के लिए।

जैसा कि आप बोल रहे थे कि — वहाँ पर एक सब्जेक्ट भी रखा गया था जो अंग्रेज़ी सिखाने के लिए था। जो छात्र अंग्रेज़ी नहीं जानते थे पर वो वो सब्जेक्ट ऐसा था कि वो अंग्रेज़ी सिखाने के लिए नहीं था वो बहुत ही हाई-फाई लेवल का अंग्रेज़ी था, जिसकी वजह से मैं काफ़ी पीछे हो गया था। तो अगर ये ना होता, मैं सोचता हूँ अगर ये एक साल बर्बाद न होता तो, क्या पता मैं और अच्छे से पड़ पाता, सब्जेक्ट को और समझ पाता अच्छे से और ये चीज़।

आचार्य: वही जीडीपी वगैरह की बात करते हैं देवेश जी। अगर कुछ अच्छे रिसर्चर हों जो कि ये गणना कर पाएँ कि हमारी भाषाई हीनभावना और मूर्खता के कारण भारत को आर्थिक कितना नुकसान हो रहा है, जीडीपी के तौर पर भी, तो एक ज़बरदस्त आँकड़ा आएगा। आप अकेले नहीं हैं जिसका एक साल ख़राब हुआ। पता नहीं कितने प्रतिभावान लोग होंगे जिनको वो स्थान वो, स्तर नहीं मिलता जिसके वो अधिकारी हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि अंग्रेज़ी में उनकी पकड़ मजबूत नहीं है। और ये कोई गुनाह हो गया क्या, कि अंग्रेज़ी में पकड़ मजबूत नहीं है, भाषा ही तो है, भाषा ही तो है।

किसी को संस्कृत न आती हो तो हम उसको नीची नज़र से नहीं देखते — यहाँ कितने लोग बैठे हैं साहब जिनको रशियन आती है? किसी को नहीं आती। अब रशियन नहीं आती तो मैं तो ये नहीं कहने लग गया कि तुम गिरे हुए आदमी हो। पर यही अंग्रेज़ी न आती हो, तो तुरंत ही हो जाता है कि अरे इसके साथ कुछ ठीक नहीं है। दूसरे ही नहीं बोलते, जिसको नहीं आती उसको भी दिल में ये बात बैठ जाती है कि मेरे साथ कुछ ठीक नहीं है, कुछ ठीक नहीं है।

आप देखिए न, कितने सारे पर्चे चिपके होते हैं दीवालों पर — अंग्रेज़ी बोलना सीखें। और ये अलग बात है कि जो अंग्रेज़ी बोलना सिखा रहे हैं, उनको न अंग्रेज़ी आती है, न हिंदी आती। कितने ही लोग इसी धंधे में लगे हुए हैं कि वो अंग्रेज़ी सिखा रहे हैं, और लोग साल-साल, दो-दो साल अंग्रेज़ी सीख रहे हैं। करोगे क्या?

आप समझ रहे बात को?

ऐसे-ऐसे संस्थान जिनके छात्र अन्ठानवे-निन्यानवे प्रतिशत भारत में ही नौकरी करने वाले हैं, उनकी भी प्रवेश परीक्षाएँ किस भाषा में हो रही हैं, अंग्रेज़ी में हो रही हैं। ये बात समझ में आने लायक़ नहीं है। और अंग्रेज़ी सिर्फ़ माध्यम भर नहीं है, यही नहीं कि 'मैथेमेटिक्स इस बीइंग टेस्टेड इन इंग्लिश,' ये सवाल गणित का या लॉजिक का है पूछा अंग्रेज़ी में जा रहा है। इंग्लिश एज़ सच, इंग्लिश एज़ ए लैंग्वेज इज़ बीइंग टेस्टेड, एक पेपर ही इंग्लिश का है, आपसे कहा जा रहा है अंग्रेज़ी के पर्चे में उत्तीर्ण हो जाइए नहीं तो प्रवेश नहीं मिलेगा।

और वो कोई वैकल्पिक विषय नहीं है, अनिवार्य, कम्पलसरी विषय है। कि पूछा जाए कि साहब इस संस्थान में प्रवेश लेने के लिए आपको क्या-क्या आना चाहिए। तो कहा जाएगा कि गणित, लॉजिक और अंग्रेज़ी। अंग्रेज़ी का एक अलग पर्चा ही है। अंग्रेज़ी का एक अलग पर्चा है और गणित और लॉजिक भी किस भाषा में जाँचें जा रहे हैं, अंग्रेज़ी में जाँचें जा रहे हैं। ये मूर्खता है भाई!

भाई, केस मेथड से पढ़ाई होती है, लॉ में होती है, मेडिसिन में होती है, मैनेजमेंट में होती है, होती है न। मुझे बताइए केसेज़ हिंदी में, बंगाली में क्यों नहीं लिखे जा सकते। उड़िया में केस लिखा होगा तो केस में कोई हीनता आ जाएगी। कहिए, एक मैनेजमेंट केस है जो किस में लिखा हुआ है, उड़िया भाषा में। तो उस केस में कोई हीनता आ गई, उसमें कोई कमज़ोरी आ गई, उसको पढ़ने से कोई बात समझ में नहीं आएगी छात्रों को।

पर वो केस भले ही हो पंचायती राज के बारे में या आँख की किसी बीमारी की नई दवाई पर शोध के बारे में वो लिखा अंग्रेज़ी में ही जाएगा, क्यों भाई। शंकर नेत्रालय पर एक केस था, शंकर नेत्रालय जानते हैं न। उस पर एक केस था, मैंने पढ़ा हुआ है। वो अंग्रेज़ी में पढ़ा है क्यों पढ़ा है अंग्रेज़ी में भाई। शंकर नेत्रालय का अंग्रेज़ी से क्या लेना-देना। लेकिन अजीब-सी गुलामी चित्त में बैठ गई है, वो सबकुछ जो भारतीय है हमको बहुत बुरा लगता है, वो सबकुछ जो भारतीय है उससे हमें घिन-सी आती है। जहाँ हमने कुछ ऐसा देखा जिससे हमारी मिट्टी का और भारत का, दूर का भी लेना-देना हो, वो हम बोलते हैं हटा, रद्दी।

अच्छा एक बात बताओ, दो लोगों के बीच में संपत्ति को, प्रॉपर्टी को लेकर विवाद हुआ है ये अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है क्या, जवाब तो दो। कानपुर के चंदूलाल और इंदौर के बंदूलाल इन दोंनो के बीच में मुकदमा चल रहा है एक मकान को लेकर के, और न्यायालय में उसपर ज़ीरह किस भाषा में हो रही है। गज़ब हो गया। समझ में न चंदुलाल को आ रही, न बंदुलाल को आ रही, मुझे तो लग रहा है, इस हॉनर को — छोड़िए बोलना नहीं चाहिए। वकीलों को भी समझ में आ रही कि नहीं आ रही कुछ पता नहीं, और चल रहा है। देश का समय नहीं खराब हो रहा इसमें, बोलिए। देश की प्रतिभा पर आघात नहीं हो रहा है ये।

और हम सवाल भी नहीं उठाते, हम कभी पूछते भी नहीं। भारतीय इतिहास अंग्रेज़ी में क्यों पढ़ा रहे हो, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है क्या। वो खड़े हो जाएँगे कहेंगे, 'इंटरनेशनल लैंग्वेज।' अरे दादा मैं 'पृथ्वी राज चौहान' के बारे में पढ़ रहा हूँ, वो मुझे इंटरनेशनल लैंग्वेज में क्यों पढ़ा रहे हो। वो कहेंगे, क्योंकि जो भारत के महान इतिहासकार हैं, उन्हें ही हिंदी से नफरत थी, तो उन्होंने ही सबकुछ अंग्रेज़ी में लिखा है, अजीब बात। जैसे कि हिंदी में लिखेंगे तो इतिहास लिखने में पक्षपात हो जाएगा।

अभी एक देवी जी हैं, उनका नाम शायद होगा सहगल, उपनाम। देख रहा हूँ तो उन्होंने लिख रखा है, 'सीगल'।

समझ में आ रहा है कि आप…। कुछ चिड़िया बनने का बहुत शौक है, सहगल, सीगल हो गया। भाषा बदली, सबकुछ बदला; बंदी ही बदल गई, सहगल सीगल हो गया, अब बताओ, पुराना कुछ बचा क्या। हम कहते हैं न कि इंडिया इज़ नाॅट कमिंग इंटू इट्स ओन , कि भारत जग ही नहीं रहा है। भारत तब तक नहीं जगेगा, जब तक उसे उसी की भाषा में लोरी नहीं सुनाई जाएगी।

एक लोरी होती है जो सुलाती है, भारत को वो लोरी चाहिए जो उसे जगा दे। वो लोरी तो उसी भाषा में होगी, जो हमारी है। और फिर देखिएगा कि भारत के पास दिमाग है कि नहीं, प्रतिभा है कि नहीं। फिर देखिएगा कि हम भी नई खोजें, नए आविष्कार कर सकते हैं कि नहीं कर सकते; वो सब काम अंग्रेज़ी में नहीं होने वाला। फिर हर मोहल्ले से पेटेंट निकलेंगे, एक बार आप हिंदी का ताल्लुक़ रोज़गार से उच्च शिक्षा से जोड़ो तो सही फिर देखो।

अभी तो हमने एक अनावश्यक बंधन, एक अनावश्यक अड़चन, खड़ी कर रखी है। जैसे कि कोई पहले से ही कमज़ोर हो और तुम उसके ऊपर एक बोझ और डाल दो। शिक्षा व्यवस्था वैसे ही चरमराई हुई है, स्कूलों की हालत जर्जर है, शिक्षक बेईमान हैं आधे, और उस पर तुमने एक ऐसा विषय लाद दिया है जो छात्रों के लिए बिलकुल दुसाध्य है। हटाकर देखो, मामला ज़रा हल्का करके देखो कि भारत में प्रतिभा है कि नहीं, कि भारत सरपट भागता है कि नहीं। जीडीपी-जीडीपी करते रहते हो, फिर देखना कि जीडीपी ग्रोथ रेट में भी, कम-से-कम दो प्रतिशत का इज़ाफा होता है कि नहीं होता है।

चीन साल दर साल नौ-दस प्रतिशत की विकास दर हासिल कर पाता क्या अगर वहाँ सारा कामकाज अंग्रेज़ी में हो रहा होता, सोच के देखो, हो पाता। एक सौ चालीस करोड़ लोगों का मुल्क है उनकी सारी ऊर्जा तो व्यय हो जाती सबको अंग्रेज़ी सिखाने में। और कोई उनको फ़र्क नहीं पड़ा अंग्रेज़ी नहीं जानते थे तो।

अभी जब ओलंपिक्स हुए थे चीन में तो एक आपत्ति अभी उठाई जा रही थी कि इनको अंग्रेज़ी तो आती नहीं, बाहर से इतने लोग आएँगे, घूमना फिरना चाहेंगे, तो कैसे करेंगे। उन्होंने कहा, कुछ नहीं छः महीने लगाये और कुछ हजार लोगों की फौज खड़ी कर दी, जिनको अंग्रेज़ी आती थी। बोले, जितने भी बाहर से लोग आयेंगे ओलंपिक्स के लिए, उनसे व्यवहार ये लोग करेंगे, कोई दिक्कत नहीं हुई, कोई समस्या नहीं।

कोई इन्टरनेशनल लैंग्वेज का उपद्रव नहीं, अपनी भाषा में सारा काम चलता है। हमारे भीतर ये भावना डाल दी गई कि तुम्हारी भाषा तो किसी काम की नहीं इस भाषा में जीओगे तो मर जाओगे, नंगे मरोगे।

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