आचार्य प्रशांत: यश बर्मन हैं, कहते हैं, नई शिक्षा नीति, दो-हज़ार-बीस, न्यू एजुकेशन पॉलिसी घोषित हुई, उसमें पाँचवीं कक्षा तक मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा पर ज़ोर दिया गया। तो कई लोगों ने बड़ा विरोध किया है, कहा जा रहा है कि जब पूरा देश, सब छात्र और उनके अभिभावक भी, अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल माँग रहे हैं तो फिर मातृभाषा पर ज़ोर देने की ज़रूरत क्या है।
तो नई शिक्षा नीति कहती है कि कम-से-कम पाँचवीं कक्षा तक, शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को रखा जाए। इसको अनिवार्य नहीं किया गया है, चीज़ वैकल्पिक है, राज्यों के ऊपर है कि इस बात पर वो कितना महत्व देना चाहते हैं। शिक्षा वैसे भी पूरे तरीक़े से नियम बनाने के लिए, कानून के लिए, केंद्र का विषय नहीं है। कान्करेंट लिस्ट में आता है, केंद्र और राज्य, दोनों ही, इस पर विधि बना सकते हैं।
तो ऐसा भी नहीं है कि, एकदम अनिवार्य, कंपल्सरी कर दिया गया है लेकिन फिर भी विरोध बहुत हो रहा है। और जैसा यश ने कहा कि कहा जा रहा है कि सब लोग तो अंग्रेज़ी माँग रहे हैं, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों में भी अंग्रेज़ी माध्यम के ही स्कूलों की माँग बढ़ रही हैं, वही खुल रहे हैं। तो फिर ये हिंदी पर ज़ोर देने से फ़ायदा क्या है।
नहीं यश, ऐसा नहीं है कि सब लोग अंग्रेज़ी ही माँग रहे हैं, या भारतीयों में अंग्रेज़ी के प्रति कोई ज़बरदस्त हार्दिक आकर्षण है। सब अभिभावक भागते हैं इंग्लिश मीडियम स्कूलों की ओर तो इसके पीछे एक कृत्रिम, आर्टिफिशियल कारण है। वो कारण बनाया गया है, तैयार किया गया है।
वो कारण बहुत सीधा है, भारत में जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं और हिंदी इनको रोज़गार से काट दिया गया है। अब भाषाई महत्व या गौरव अपनी जगह होता है, बड़ी बात होती है। लेकिन रोज़गार, पेट, रोटी उससे थोड़ी बड़ी बात हो जाते हैं। मातृभाषा, चाहे वो हिंदी हो या कोई और क्षेत्रीय भाषा हो, में शिक्षा के बहुत फ़ायदे हैं, और वो फ़ायदे सबको पता हैं।




