आप एक बन्धन छोड़ते हो तो दूसरा पकड़ लोगे। आप जब तक हो बन्धन अनिवार्य है। बन्धन को छोड़ने को तो एक बार को हम फिर भी रज़ामन्द हो जाएँगे, बँधे हुए को छोड़ने को रज़ामन्द नहीं होते। और जिसे बँधना ही है वो बेड़ियाँ तलाश लेगा, तुम लाख कोशिश करो उसे आज़ाद रखने की वो बेड़ियाँ तलाश लेगा। उसे बहाने मिल जाएँगे और उसके बहाने तर्कयुक्त होंगे, तुम उसके बहानों को गलत नहीं साबित कर पाओगे।
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प्रश्नकर्ता: खलील ज़िब्रान कहते हैं कि हम मुक्त हैं, आज़ाद हैं लेकिन हमने बेड़ियाँ पहन रखी हैं और हम उन्हीं बेड़ियों से आज़ादी की कामना रखते हैं।
ये स्थिति आयी कैसे? हर कोई गुलामी में ही दिखता है और आज़ादी की कोशिश कर रहा है। ये जो द्वैत है इसका आधार क्या है, इसका स्त्रोत क्या है? और कौन है वो जो आज़ाद होने की कोशिश कर रहा है?
आचार्य प्रशांत: आप लगातार व्यस्त हैं, आप लगातार किसी दिशा में गति कर रहे हैं, कुछ-न-कुछ निरंतर चाह रहे हैं, कुछ-न-कुछ निरंतर सोच रहे हैं। एक पूरा ब्रह्मांड है मन के भीतर जिसमें आप इधर-से-उधर भाग रहे हैं। आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जो भी सोच रहे हैं, जिधर को भी भाग रहे हैं, चाहत आपकी एक ही है आज़ादी!
अन्दरूनी फ़ितरत कुछ ऐसी है हमारी कि हम बर्दाश्त नहीं कर सकते बन्धनों में रहना। उस बन्धन को आप लाख जायज़ ठहरा लें, उसका कोई औचित्य ढूँढ लें, बुद्धि से उसको सार्थक प्रमाणित कर दें, लेकिन फिर भी बुद्धि से भी गहरा है जो आपमें, बुद्धि से भी नीचे और केन्द्रीय जो है आपके भीतर, वो राज़ी नहीं होने वाला। वो असहमत ही रहेगा, उसका मुँह उतरा रहेगा, स्थिर नहीं हो पाएगा वो। उसकी स्थिरता मात्र पूर्ण मुक्ति में ही सम्भव है।




