जवान हो, और खून नहीं खौलता? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी दिल्ली महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न डर से सम्बन्धित है। मैं जब किसी इंसान को देखता हूँ कि वो ख़ुद से कमज़ोर इंसान को डाँट रहा है या मार रहा है तो मैं बहुत घबरा जाता हूँ, कभी-कभी बहुत गुस्सा हो जाता हूँ। मैंने सोचा, तो इसके पीछे मुझे कुछ कारण दिखें — मुझे लगा कि मेरी भावुकता कारण है, फिर मुझे लगा कि चूँकि मैंने अपने अतीत में अपने घर में थोड़ी-बहुत हिंसा देखी है, तो ये कारण हो।
कुछ समय घर से दूर रहा, पर बूढ़े हो चले माँ-बाप की ओर वापस चला गया। मैं बाहर भी कम ही जा पाता हूँ और मेरी सिए अन्तिम वर्ष की पढ़ाई भी काफ़ी बाधित होती है। अब मेरी कोशिश ऐसे मामलों में ज़्यादा प्रतिक्रिया न करने की होती है, पर ये इस समस्या का समाधान नहीं है। कृपया मार्गदर्शन करें ताकि मैं ऐसी स्थितियों में तटस्थ रह सकूँ और इतना ज़्यादा डर मुझ पर हावी न हो जाए।
आचार्य प्रशांत: किन बातों पर गुस्सा आता है? क्या देख लेते हो तो क्रोधित हो जाते हो?
प्र: गुस्सा इस चीज़ पर आता है कि कोई किसी पर क्यों हाथ उठा रहा है या चिल्ला रहा है। पहले गुस्सा ज़्यादा था, पर अब मैं प्रतिक्रिया नहीं करता हूँ।
आचार्य: कोई किसी पर क्यों बिलकुल अधिकार कर लेता है या डाँट लेता है, मार लेता है, शोषण कर लेता है? क्यों होता है ऐसा?
प्र: मुझे इन सबके पीछे लोगों का स्वार्थ दिखता है और लगता है कि अहंकार की पूर्ति के लिए करते होंगे। जानवरों को हिंसक होते देखता हूँ तो वहाँ घबराहट नहीं होती, वो मुझे सामान्य लगता है।



