क्लास में प्रोफ़ेसर पढ़ा रहे हैं, और हम अपने ही विचारों में कहीं और हैं। फिर कहते हैं कि विचार आ जाते हैं, हम बेचारे क्या करें? पर बिना हमारी सहमति के कोई विषय आकर नहीं बैठता, उसे हमने ही चुना है। धुंध में जो मिठाई दिखती है, कहीं वह “साधारण गिट्टी पत्थर” तो नहीं? ओवरथिंकिंग की जड़ में एक माना हुआ अधूरापन है, जो कमी भरने के लिए कोई विषय पकड़ता है और फिर उसी पर सोचता रहता है। क्या हम उस धुंध को ईमानदारी से हटाकर देख पाएँगे?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
[आईआईटी बॉम्बे में छात्रों के साथ एक संवाद से। एक छात्र पूछते हैं कि वे अपने विचारों में क्यों फँसे रह जाते हैं।]
प्रश्नकर्ता 1: सर मेरा क्वेश्चन यह है कि मैं अपने थॉट्स को कंट्रोल नहीं कर पा रहा हूँ इंटरनल थॉट्स को और मैं सही और ग़लत में डिफ़रेंस नहीं कर पा रहा हूँ कि व्हॉट इज़ राइट एंड व्हॉट इज़ रॉन्ग इंटरनली एंड माय लाइफ़ इज़ लाइक अ इल्यूज़न फ़ॉर मी। मतलब चली जा रही है बस और मतलब मैं सिर्फ़ उसे वॉच कर रहा हूँ। मैं उसको कुछ कर नहीं पा रहा हूँ। कुछ उसमें ऐड ऑन नहीं कर पा रहा हूँ और उससे कुछ तोड़ नहीं पा रहा हूँ मैं। और सर इसी को थोड़ा-सा गाइड कर दिए मुझे कि व्हॉट कैन आई डू?
आचार्य प्रशांत: किसी एक स्थिति का उदाहरण लेकर के बताओ कि क्या होता है।




