प्रश्नकर्ता: गुरू जी, अपनी बातों से सबके जीवन का रस क्यों ख़त्म कर रहे हो? कुछ तो एक्साइटिंग (रोमांचक) रहने दो। सब ज्ञानी हो जाएँगे तो दुनिया बड़ी अजीब हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत: अरे, डरे हुए बेईमान आदमी! मक्कारी इतनी बढ़ गयी कि अभी तक ख़ुद से ही झूठ बोलते थे अब खुलेआम मुझसे भी बोलोगे? ये ग़लती कर बैठे न? जब तक ख़ुद से ही झूठ बोल रहे थे चल जाता, कोई तुमको पकड़ने नहीं आता, तुम्हारी अंदरूनी, व्यक्तिगत बात होती। ये क्या कर दिया, खुलेआम मुझसे झूठ बोल दिया?
डर का आलम ये है कि जैसे किसी बहुत बड़े दबंग के यहाँ तुम जाओ खाना खाने और वो तुम्हीं से पूरा घर पहले साफ़ कराये, चौका साफ़ कराये, तुम्हीं से बर्तन मँजवाये, फिर तुम्हीं से खाना बनवाये, फिर वो जो खाना बना है वो सब लोगों में बँटवा दे और फिर जो बचा-खुचा जूठन है उसमें पानी मिलाकर के और गरम करके तुमको बैठा दे कि लो खाओ। पर वो जो तुम्हारे सामने खड़ा है वो आदमी बड़ा दबंग है। तो फिर जब वो तुमसे पूछने आये कि हाँ भाई! मज़ा आ रहा है न? आज खूब मज़े किये और खाना रसीला है न? तो तुम बोलो, ‘अरे! जी, जी, जी, मज़ा ही आ गया। अरे! जी कितना रसीला भोजन है आ-हा-हा बिलकुल-बिलकुल आनन्द आ रहा है,आनन्द, आनन्द।’
ऐसी तुम्हारी हालत है। इतना डरे हुए हो कि अपनी दुर्गति को बता रहे हो कि ज़िन्दगी रसीली है। हिम्मत ही नहीं है तुम्हारी बोल पाने की कि ज़िन्दगी कड़वी है, कसैली है। क्योंकि अगर इतना बोल दोगे तो दुनिया जान ले लेगी तुम्हारी। ये ज़िन्दगी में तुमने जितनी भर रखी हैं कड़वियाँ और कसैलियाँ, जिनको तुम बोलते हो मेरी रसभरी, ये जान ले लेंगी तुम्हारी, अगर तुमने बोल दिया कि तुम्हारा वास्तविक अनुभव क्या चल रहा है जीवन का।
तो तुमसे जब भी पूछा जाता है, ठीक लग रहा है न सबकुछ? मज़ा आ रहा है न? तुम कहो, ‘अरे, मज़ा आ रहा है! मज़ा-ही-मज़ा आ रहा है, और हमारी तो किस्मत खुल गयी जो हमें इस तरह का जीवन जीने को मौक़ा मिला। अनुग्रहित आपके हम।’




