होश का मतलब यही होता है — अपनी वर्तमान हालत के प्रति ईमानदारी। सब जानते हैं पर भीतर इतनी तामसिकता भरी हुई है कि कौन संघर्ष करे इस कैद, इस पिंजड़े, इस कसाई के ख़िलाफ़।मदद मिलती है, सहारे आते हैं, चमत्कार होते हैं थोड़ा भरोसा तो रखो। और नहीं होंगे चमत्कार तो अधिक–से–अधिक क्या होगा? मर ही तो जाओगे, मर तो वैसे भी रहे हैं। तो भविष्य की नहीं सोचनी है, वर्तमान के ख़िलाफ़ विद्रोह करना है। जो भविष्य की सोचते हैं, उनका वर्तमान वैसा ही चलता रहता है जैसा चल रहा है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरे जीवन में पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं है मैं जो सोचती हूँ, मेरे कार्य तथा शब्दों में पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती हूँ। हमेशा लगता है कि भविष्य के लिए तैयारी कर रही हूँ, लेकिन जीवन तो प्रतिपल ख़त्म होता जा रहा है। जीवन बहुत ही संकुचित रूप से व्यतीत हो रहा है।आचार्य जी, कृपया मार्गदर्शन दीजिए।
आचार्य प्रशांत: भविष्य की चिन्ता, परेशान ही तब करती है जब वर्तमान बिलकुल सूना, बेरंग बैठा हो। और वर्तमान किस चीज़ से भरना है, इसका कोई एक सीधा–साधा उत्तर नहीं हो सकता। क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि आप जो व्यक्ति हैं, वो इनसे अलग हैं, इनसे अलग हैं, इतना ही नहीं, आप आज जो व्यक्ति हैं, वो उस व्यक्ति से अलग है जो आप दो साल पहले थे, दो साल बाद होएँगे। सब लोग अलग अलग अलग–अलग है लेकिन सबकी केन्द्रीय अभीप्सा एक ही होती है और बात बहुत स्पष्ट है सब देखते हैं, सबके अनुभव की है। परेशान कोई नहीं रहना चाहता। ठीक? सारा अध्यात्म इस सीधे से वाक्य से उठता है।
हम परेशान नहीं रहना चाहते, किसको पसन्द है सिरदर्द? यहाँ (मस्तिष्क के पार्श्व भाग की ओर इशारा करके) बज रहा है, ऐसा लग रहा है धीरे-धीरे टन-टन-टन होता है, ना? भारी-भारी सा है, किसको पसंद है? किसी को नहीं होता। यहीं से अध्यात्म की शुरुआत होती है। सब लोगों की मौलिक और साझी चाह है शान्ति। कोई ऐसा नहीं होता जो अशान्त, परेशान रहना चाहे, उसी शान्ति को अलग–अलग नामों से कह दिया जाता है अलग–अलग सन्दर्भों में। कभी उसको सत्य कह देते हैं, कभी सरलता कह देते हैं, कभी बोध कह देते हैं, कभी कह दिया जाता है कि सत्य से प्रेम करो, कभी कह दिया जाता है शुद्ध होने के लिए साधना करो। ये सारे इशारे बिलकुल एक ही चीज़ की ओर हैं कोई अंतर नहीं है। वो जो चीज़ है, वह हम सब में साझी है।




