प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: हर समय हो तो रहा है परिवर्तन। अभी बैठे थे, अब खड़े हो गये। हो गया परिवर्तन। और कैसा परिवर्तन चाहते हो? टीशर्ट पहने हो, थोड़ी देर में उतार दोगे, तो हो गया परिवर्तन। परिवर्तन क्या है? दायें को अटके थे, अब बायें को अटक गये, ये परिवर्तन है? पहले अपरिवर्तित होने के खयाल पर अटके थे, अब परिवर्तित होने के खयाल पर अटक गये, ये परिवर्तन है? पहले ऊपर उठना बहुत अच्छा लगता था अब नीचे गिरना बहुत अच्छा लगता है, ये परिवर्तन है?
पहले एक नौकरी में थे, अब दूसरी नौकरी में आ गये, ये परिवर्तन है? पहले एक रिश्ते में आसक्त थे, अब दूसरे रिश्ते में आसक्त हो गये, ये परिवर्तन है? परिवर्तन माने क्या? हम परिवर्तन का अर्थ यही समझते हैं कि पहले गिलास में चाय पीते थे अब चाँदी के कप में पीने लग गये। पहले रोटी खाते थे, अब पूड़ी खाने लग गये। या बहुत ज़ोर लगाया तो धर्म ही परिवर्तित कर दिया।
उससे भी मन नहीं भरा तो घर की दीवारों का रंग बदल दिया। कहे, ‘हो गया परिवर्तन।’ और ज़रा क्रान्तिकारी किस्म के हैं तो सरकार बदल दी। चल रहा है न ‘पोरिवर्तन’। तो यही है परिवर्तन। परिवर्तित करते तो रहते हो, कपड़े बदलते हो। हर हफ़्ते नयी मूवी देखने जाते हो। टहलने निकलते हो, कहते हो न, ‘चलो, ज़रा मन बदल जाएगा।’ परिवर्तित करते तो रहते हो। क्या ये परिवर्तन है? बैठो। (प्रश्नकर्ता को सम्बोधित करते हुए )
परिवर्तन का अर्थ ये नहीं होता कि ‘कुछ’ ‘कुछ और’ में बदल गया। परिवर्तन का अर्थ ये नहीं होता कि ‘अ’ ‘ब’ में बदल गया। परिवर्तन का अर्थ ये नहीं होता कि सीमा सुशीला में बदल गयी। परिवर्तन का अर्थ ये नहीं होता कि टीशर्ट शर्ट में बदल गयी, कि मुसलमान ईसाई बन गया, कि एक सरकार से दूसरी सरकार आ गयी। ये सब परिवर्तन है ही नहीं।




