
एक महिला खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतती है, लेकिन उसे ऑनलाइन हैरसमेंट, फ़ेक अकाउंट्स और आपत्तिजनक तस्वीरों का सामना करना पड़ता है। सदियों की वर्जनाओं ने हमें स्त्री को सिर्फ़ देह के तल पर देखने का आदी बना दिया है, उसकी काबिलियत या गहराई से कोई सरोकार नहीं रहता। यही पैटर्न गाड़ी, नौकरी और शादी जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में भी दिखता है। यह कोई विकृति नहीं, बल्कि इन्हीं वर्जनाओं की स्वाभाविक परिणति है।











प्रश्नकर्ता: एक जानकार हैं, स्कूल टीचर हैं। तो आपसे इस तरीक़े से वार्तालाप होगी, मैंने उनको बताया था तो मैंने कहा कुछ परेशानी है? बताऍं। तो उन्होंने कहा— मैं स्कूल टीचर हूँ और स्कूल टीचर से कोई शादी नहीं करना चाहता। मेरी शादी कब होगी? क्षमा चाहती हूँ उनके सवाल

प्रश्नकर्ता: मैं एक आध्यात्मिक संस्था से छः सालों से जुड़ा हुआ हूँ और आध्यात्मिक साधना का अभ्यास कर रहा हूँ। तीन साल तक ये साधना अच्छी चली लेकिन तीन साल पहले मेरी शादी होने के बाद मेरा ध्यान भटकने लगा।


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी जैसा आपने बताया कि आप एक वुमन (महिला) होने से पहले एक

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल इस संदर्भ में है कि बचपन से मैं बच्चों के प्रति जो हिंसा होती थी उसे पढ़ती थी


आचार्य प्रशांत: जाओ किसी भी आम लड़के से पूछ लो वह किसलिए विवाह करता है। सम्मानजनक काम करने के लिए तो वह विवाह करता नहीं। वह काम सारे ऐसे ही करता है जो अगर वह विवाह के बिना कर दे तो तुम कहोगे — जलील, लुच्चे, लफंगे गायब हो जा

प्रश्नकर्ता: हैलो सर, मेरा प्रश्न इंटरनेट पॉर्नोग्राफ़ी



प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी। जिनसे शादी हुई है, तो थोड़ा-सा, बड़े शांत स्वभाव की लगती थीं और थोड़ा


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी क्षमा की बात चल रही है तो मेरे पास एक कॉन्फेशन (पाप स्वीकरण) है करने के लिए। आचार्य जी, दिसम्बर दो-हजार-इक्कीस के सत्र में आया था मैं ऋषिकेश में, तो तब मैंने एक जिज्ञासा की थी सेक्स सम्बन्धित। तब मेरा अनुभव नहीं था उसका, तो

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में कामवासना, शारीरिक-आकर्षण, इन सबके विरुद्ध सावधान रहने को कहा जाता है, लेकिन जिस प्रक्रिया से एक जीव इस दुनिया में, अस्तित्व में आता है, वह प्रक्रिया ग़लत कैसे हो सकती है?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! आदि शंकराचार्य के विषय में ये कथानक है कि जब काशी में मंडन मिश्र के साथ उनका एक शास्त्रार्थ होता है, तो उनकी पत्नी काम (सम्भोग) से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछतीं हैं। तो जैसा मुझे पता है कि वो अपने स्थूल शरीर को त्यागकर किसी सम्राट

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सादर प्रणाम। पिछले छः माह से आपको सुन रहा हूँ और जीवन को नये स्वरूप में देखने की नज़र मिली है। बचपन से ही कामवासना के सामने लाचार महसूस करता रहा हूँ, लेकिन अभी आपको लगातार सुनने के बाद विगत दो माह से ऐसा लगता है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने दुनिया देख ली, अपना अनुभव देख लिया, दूसरों का अनुभव देख लिया, लेकिन फिर भी स्त्रियों की ओर खिंचाव रहता है। क्या करूँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! सर मेरा सवाल था रिलेशनशिप (रिश्ते) को लेकर। आप कहते हैं कि जो साथी चुनने का मुद्दा है वो बहुत इम्पॉर्टन्ट (महत्वपूर्ण) है, तो जैसे उसको मैं


प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं दिल्ली से हूँ , उम्र 25 साल। जिस उम्र में हूँ उसमें विपरीत लिंगी के प्रति थोड़ा-सा आकर्षण हो ही जाता है। हालाँकि ये पहली बार नहीं है, बीते समय के अनुभव रहे हैं। उससे ये पता चला कि मुझे इस दिशा में नहीं जाना

सेक्स अगर तुम्हें शांत कर सकता होता, दो बार, चार बार में कर गया होता न? यहाँ तो लोग अपने जीवन काल में हज़ारों बार कर जाते हैं और उसके बाद भी लालायित रहते हैं, प्यास ही नहीं बुझती।

तुम्हें लगता है, “वाह! मज़ा आ गया। लाइन दे दी उसने।“









प्रश्नकर्ता: मैं अर्थशास्त्र विषय में अनुसंधान कर रहा हूँ। मैं अपने विभाग में मेरी एक सीनियर छात्रा से अनुसंधान के कार्य के दौरान संपर्क में आया। उन्होंने मुझसे सांख्यिकी विषय में मदद ली थी, इसी दौरान मैं उनकी ओर आकर्षित होना शुरू हुआ। इस आकर्षण के कारण मेरी पढ़ाई, मेरा





प्रश्न: योग वाशिष्ठ में स्त्री भोग एवं संगत को 'सर्पिणी' की संज्ञा दी गई है। परंतु फ्राइड ने कहा है कि लैंगिक इच्छाओं के दमन से मानसिक विकृतियाँ पैदा होती हैं। अध्यात्म और मनोविज्ञान में ये विरोधाभास कैसा?
तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।
जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वो कुछ तो करने की कल्पना करेंगे न। अब आदमी को पता नहीं होता कि सूनापन चीज़ क्या है; वो पैदा कहाँ से हो रहा है। तो उसको भरने के लिए फिर तरह-तरह की कोशिशें करता है, अपनी स्थिति अनुसार। आप स्त्री हो, तो डिमांड पुरुष की करोगे; आप पुरुष हो, तो स्त्री की करोगे। आप ग़रीब हो, तो पैसे की करोगे। ऐसा लगेगा कि अलग-अलग चीज़ों की डिमांड हो रही है। पर वो जो आपकी डिमांड है, माने डिज़ायर है, वो वास्तव में आ रही है एक ही जगह से, वह है हमारा अस्तित्वगत अज्ञान, उसी को अहंकार बोलते हैं।
हम साइकोसोमैटिक बीइंग्स होते हैं न, हम तो कुछ खाते भी हैं, तो उसका भी असर मन पर पड़ता है। पड़ता है न? और वो शरीर की ही बात है। आप कुछ उल्टा-पुल्टा खा लीजिए, असर पड़ेगा। नशे का भी यही सिद्धांत होता है, आप कुछ ले लीजिए उससे दिमाग़ चक्कर खाना शुरू कर देगा। उसी तरीक़े से ये जो सेक्सुअल यूनियन होता है, ये भी एक फिज़िकल चीज़ है, जिसका मन पर असर पड़ता है। ये भी मन पर निशान छोड़ता है। तो आप इमोशनली भले ही नहीं अटैच हो रही हों, पर क्या आपने परखा है कि इसका मन पर क्या असर पड़ता है?
ये जो पारंपरिक बात रही है कि अध्यात्म के साथ-साथ कामवासना क्षीण हो जाती है, वो बात अपनी जगह बिलकुल ठीक है। लेकिन उसमें यह बात भी है कि फिर आपकी वासना, आपके मूल्यों का एक प्रतिबिम्ब बन जाती है, एक उद्घोषणा बन जाती है कि मुझे क्या चीज़ पसंद है। पहले आप एक साधारण आदमी थे, जिसके साधारण बल्कि निम्न तल के मूल्य थे। तो उसी तल का आप कोई साथी भी चुन लेते थे। आध्यात्मिक व्यक्ति चूँकि ऊँचाइयों का प्रेमी होता है, उच्चता का। तो इसीलिए वो फिर सेक्स (संभोग) को एक साधारण मनोरंजन की तरह नहीं इस्तेमाल करता।
सेक्स अच्छा या बुरा नहीं होता। अगर आपके जीवन में हर चीज़ के लिए उलझाव है, निर्णय नहीं ले पाते, तो आप सेक्स के बारे में भी अच्छा-बुरा, सही-गलत सोचेंगे। अगर आप सही जिंदगी जी रहे हो, हक़ीक़त के साथ हो, तो सेक्स पर सोचना नहीं पड़ेगा। होगा तो होगा, नहीं होगा तो नहीं होगा। जीवन में एक प्रवाह रहेगा, और तुम्हारे मन पर सेक्स एक बोझ की तरह नहीं रहेगा।
हमारी धार्मिकता तो ये है कि बोल दिया, चुपचाप मान लो और जैसा कहा जाए, करो। समझो, समझाओ, जानो तब मानो — ये तो धर्म में चलता ही नहीं है। तो धर्म ने बिना समझाए आपको बोल दिया है कि ये छी!छी! चीज़ है, छिच्छी! और ये होने मत देना। धर्म ने तो बोल दिया, ‘होने मत देना’, पर वो होकर रहेगी। और जब होकर रहेगी तो आप क्या हो जाओगे? शर्मसार, आप अपराध भाव से भर जाते हो। और जैसे ही अपराध भाव से भरते हो, आपको लग जाता है आप गुनहगार हो, आप लज्जित हो जाते हो।
शरीर की निर्मिति ही ऐसी है कि वासना इसे सताएगी, वासना के बीज इसी में मौजूद हैं। शरीर को आराम दे दो, रोटी दे दो और इसे सेक्स दे दो, इसके अलावा इसे कुछ नहीं चाहिए। जीवन के पल-पल को ऊँचे-से-ऊँचे काम से परिपूर्ण रखो। कोई भी ऐसा काम जिसमें स्वार्थ न हो, जिसमें करुणा हो, रचनात्मकता हो, संगीत हो — ये सब ऊँचे काम हैं। खाली मत रहो, जो खाली होगा, वही फँसेगा।
प्रश्नकर्ता: सर, आजकल बहुत लोग ये कहते हैं कि सेक्सुअली लिबरेटेड (यौन रूप से मुक्त) होना बहुत ज़रूरी है एक इंसान का। आप इस पर ज़रा प्लीज़ कुछ कहिए।
आचार्य प्रशांत: नहीं, सेक्सुअली लिबरेटेड जैसा कुछ होता नहीं है। बन्धन सेक्स पर नहीं होते, बन्धन मन पर होते हैं। तो …
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सेक्स (संभोग) की सामाजिक अस्वीकृति को लेकर ग्लानि का अनुभव होता है। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: अगर तुमको लाज ही आती है, शर्म ही आती है, तुममें अपराध भाव ही उठता है, तो अपराध भाव तुममें उठना चाहिए तब, जब तुम किसी का इस्तेमाल देह…
प्रश्नकर्ता: इंटरनेट से एक बहुत लम्बे समय तक मेरा कोई विशेष लगाव नहीं था। यूट्यूब भी मैंने तभी देखना शुरू किया जब आपको सुनने की आदत लगी है आपके कारण ही मैंने इंटरनेट पर ज़्यादा समय बिताना शुरू किया, पर अब ये हो गया है कि इंटरनेट पर मैं आता…
प्रश्नकर्ता: मेरे पति एक ऐड इंडस्ट्री (विज्ञापन उद्योग) में काम करते हैं। तो उनका पूरा समय जवान और सुन्दर महिलाओं के साथ बीतता है। जिसके वजह से मैं बहुत स्ट्रेस (तनाव) में रहती हूँ, पजेसिव (अधिकारात्मक) हो जाती हूँ, इनसिक्योर (असुरक्षित) हो जाती हूँ। तो मैं सारे हथकंडे अपना चुकी…
मैंने शादी के जो सपने संजोए थे कि उच्चतम सुख…
आचार्य प्रशांत: तुम उसको बोल रहे हो पॉर्न मत देख, दिन में तू चार घंटे पॉर्न देखता है, इतने में तू पढ़ाई कर लेगा तो टॉप कर जाएगा। वो कहता है टॉप कर जाऊँगा तो भी जो चीज़ मिलेगी उस पॉर्न से बेहतर तो नहीं है। टॉप करके भी तुम…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सेक्स से रिलेटेड (सम्बन्धित) बहुत थॉट्स (विचार) आते हैं तो कैसे कम करे या कंट्रोल (नियन्त्रित) कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो जो तुमको पता है…
आचार्य प्रशांत: लड़की-लड़का साथ रहेंगे, तो उसमें एक सेक्सुअल डायमैन्शन (यौन आयाम) हमेशा रहेगा। इस बात को न नकारने से कोई फ़ायदा है, न इस बात का विरोध करने की कोई ज़रूरत है। ठीक है?
हाँ, अब आपको क्या करना है, आपको याद रखना है कि आप कौन हो, आप…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, ऐसा कहते हैं कि एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते। मैंने भी यह देखा है कि कहीं-ना-कहीं कुछ छुपी हुई मंशा रहती है या इरादे रहते हैं।
इसी सिलसिले में एक पॉडकास्ट मैंने सुना, हालाँकि वह यूएस बेस्ड (आधारित) है,…
प्रश्नकर्ता: ब्रह्मचर्य और विवाह में क्या सम्बन्ध है? जो भी जितने भी ब्रह्मचारी लोग हुए हैं, उनके जीवन को पढ़ते हुए बड़ा आनन्द आता है। मतलब जो ब्रह्मचर्य के नियम पर चले हैं। जैसे– स्वामी दयानन्द हो गए, महात्मा बुद्ध हो गए, भगवान महावीर हो गए या स्वामी विवेकानन्द हो…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, आध्यात्मिक साहित्य हैं या पढ़ते-पढ़ते आ रहे हैं, उसमें साधु-संत ने कामवासना को ग़लत बताया और नियंत्रण की सलाह दी। तो यदि ये ग़लत है तो ये काम है ही क्यों? और हमें यौनांग मिला ही क्यों?
आचार्य प्रशांत: उसी में एक बात और…
आचार्य प्रशांत: जो सवाल पूछ रहे हैं, उनकी कुछ धारणाएँ हैं, जो सवाल के पीछे छुपी…
आचार्य प्रशांत: तुम्हारे सामने कोई स्त्री हो जो एकदम ही बेहूदी हो, उल्टी-पुल्टी बातें करती हो, गिरा हुआ उसका आचरण हो, झूठी हो,…
आचार्य प्रशांत: जब हम शादी करते हैं तो शायद ही होगा कोई जो कहेगा कि भाई जवानी छा रही है, शारीरिक माँगें हैं, इसके लिए हम विवाह करने जा रहे हैं। ख़ास तौर पर महिलाएँ तो बिलकुल नहीं मानेंगीं, वो कहेंगीं—"छी, छी! इतनी गंदी बात। हम बोल ही नहीं सकते…
अधेड़ हो गए, साठ के हो गए, अस्सी के हो गए,…
जब किसी को मृत्युदंड दिया जाता है जानते हो क्या लिखता है जज? “टू बी हैंगड टिल डेथ!"
अब यह लटकेगा जब तक मरेगा नहीं। हर कामुक…
प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में वीर्य बचाने को बहुत ज़्यादा महत्व दिया जाता है।
आचार्य प्रशांत: किस उपनिषद् में लिखा है, “वीर्य बचाओ”?
प्र: नहीं, मैंने पढ़ा था।
आचार्य: किस उपनिषद् में?
ये तो ऐसा लग रहा है जैसे कि पुराना नारा हो, “वीर्य बचाओ, वीर्य बढ़ाओ।” ये कौन से उपनिषद् में…
आचार्य प्रशांत: हमने बहुत बातें करी हैं तीन दिन में, लेकिन देखिए, कैसे कहूँ? क्योंकि इतनी बार कहा है इसीलिए, कैसे कहूँ? बार-बार कहा है, हर बार कहा है, ज़िन्दगी कैसी है? सब कुछ इस पर। जब निर्णय की घड़ी आती है तब निर्णय किधर को करते हो? सब कुछ…
प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में कामवासना, शारीरिक-आकर्षण, इन सबके विरुद्ध सावधान रहने को कहा जाता है, लेकिन जिस प्रक्रिया से एक जीव इस दुनिया में, अस्तित्व में आता है, वह प्रक्रिया ग़लत कैसे हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: जो सवाल पूछ रहे हैं, उनकी कुछ धारणाएँ हैं, जो सवाल के पीछे छुपी…
प्रश्नकर्ता: सर, पूछने में शर्म आ रही है पर पूछना ये चाहता हूँ कि कामवासना बहुत परेशान करती है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ये शर्म ही परेशानी है। तुम्हारी जो हालत है, उस बर्तन की तरह है जिसे नीचे से आँच दी जा रही है और ऊपर से बिल्कुल ढँककर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या वासनाओं का दमन आवश्यक है?
आचार्य प्रशांत: दबाना भी एक विधि है। शम- दम ये भी आवश्यक होते हैं। वासनाएँ तो भीतर बहुत समय तक बनी रहेंगी, निर्बीज नहीं हो जाओगेl और तुम ये इंतज़ार नहीं कर सकते कि जब वासनाएँ समूल नष्ट हो जाएंगी सिर्फ…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने अपने मन को बहुत टटोला, और पाया कि मेरा मन डरा हुआ है और अपने-आपको हीनता भरी निगाहों से देखता है। मुझे इतना जिस चीज़ ने गिराया है वो है मेरी कामुकता। इस कामुकता ने मुझसे बहुत ग़लत काम करवाए हैं, जिससे मैं अपने-आपको बहुत हीन…
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।
भावार्थ: जो मनुष्य कर्मेन्द्रियों को तो वश में करता है, किंतु मन से इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, ऐसा मूर्ख जीव मिथ्याचारी कहलाता है।
(श्रीमद्भागवत गीता अध्याय ३, श्लोक ६)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या मानसिक विकारों और…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मन में ये चलता रहता है कि आसपास के लोग क्या सोचते हैं। नफरत से डर लगता है। ये शायद देह की असुरक्षा का ही भाव है। इसका संबंध कामवासना से भी है, कामवासना को लेकर एक असहजता रहती है हमेशा से। बाहर प्रकट नहीं होने…
प्रश्नकर्ता: जो जीवन का सबसे कीमती समय होता है, जब हमें ज़िन्दगी बनानी होती है और ज़िन्दगी के बड़े-बड़े निर्णय करने होते हैं, ठीक उसी अवधि से गुज़रते हुए, ठीक उसी दरमियान हमें कामवासना सबसे ज़्यादा क्यों सताती है? एक बार अधेड़ हो गए, बूढ़े हो गए फिर कौन-सा बड़ा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन का अधिकांश समय कामवासना में व्यतीत किया है। किशोरावस्था से लेकर अब तक कामवासना से मन ग्रसित रहा। जीवन की सारी व्यग्रता, उदासी या मन की किसी भी व्यग्र कर देने वाली स्थिति में वासना को ही द्वार बनाया खाली होने के लिए या कुछ क्षणों…
आचार्य प्रशांत: ज़रा भीतर जाकर के देखा करो, थोड़ा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखो, ज़रा खोजी का चित्त रखो। नहीं हैं चीज़ें वैसी जैसी दिखाई पड़ती हैं। नहीं है दुनिया वैसी जैसी तुम्हें प्रकट होती है। और चीज़ें तो वैसी दिखाई भी नहीं पड़ती जैसी कि वो चीज़ भी है, ख़ासतौर पर…
प्रश्न: आचार्य जी, ज़िंदगी में ख़ुद खूब अनुभव करके निराशा भी ले ली, अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी में भी शादी और कामवासना को एक परेशानी की तरह ही पाया। स्वयं का भी अनुभव हो गया, दूसरों की ज़िंदगियाँ भी देख लीं, फिर भी मेरे मन में लड़कियों, महिलाओं…
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म तुमको बता रहा है कि - "जिसको तुम रस्सी…