अपने बारे में धोखे में मत रहो [ऐसे जाँचो अपनी सच्चाई] || आचार्य प्रशांत (2021)
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो मैं अब तक समझा हूँ, मुझे लगता है कि जैसे मन अपना सही जगह जानता है, तो पूरे दिन वो वही ढूँढता रहता है हर चीज़ में। खाली भी बैठा है तो वो प्लेननेस (साधारणता), वो जो ब्लंटनेस (भोथरापन) अच्छी नहीं लगती, वो फ्रेशनेस (ताज़गी) ही अच्छी लगती है, जैसे मन अपना ठिकाना जानता है।
तो वो पूर्णता का भाव बार-बार छूट जाता है। ग़ौर करने पर पर समझ आता है कि क्या छा गया।
तो जब वो पूर्णता, सहजता रहती है तो कोई भी काम करता हूँ तो उसमे मुझे बहुत मज़ा आता है। जैसे– किसी से बात कर रहा हूँ या कोई चर्चा चल रही हो तो अच्छा लगता है लेकिन जहाँ वो पूर्णता छूट जाती है, तो फिर से तकलीफ़ होती है, वही काम बोरिंग (उबाऊ) लगने लग जाता है।
आचार्य: वो इसलिए छूट जाती है क्योंकि वो एक भाव है। असली पूर्णता, असली सहजता कोई भाव नहीं होते। भाव का तो काम है आना-जाना, भाव तो एक मानसिक गतिविधि है, भाव तो यातायात है, मेंटल ट्रैफिक (मानसिक गतिविधि) है।
भाव हों, आवेग हों आन्तरिक, विचार हों, इनका क्या काम है? आना-जाना। कोई भी भाव तुमको लगातार रहा है बचपन से आज तक? कोई भी भाव ऐसा है जो अभी है और अंत तक रहेगा? ऐसा तो कुछ है नहीं न!
तो जब तक पूर्णता तुम्हारे लिए भाव है, पूर्णता भी बाक़ी भावों कि तरह आएगी भी और फिर चली भी जाएगी, ग़ायब हो जाएगी। इसलिए तुम्हारी पूर्णता ग़ायब हो जाती है। पूर्णता कोई भाव नहीं हो सकती, सहजता कोई भाव नहीं हो सकती, सत्य कोई विचार नहीं होता, मुक्ति कोई ख़याल नहीं होता।



