प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं आता कि कैसे हम अच्छे समय पर बुरे काम कर देते हैं और बुरे समय में अच्छे कैसे कर देते हैं?
आचार्य प्रशांत: कोई अच्छे समय पर बुरे काम नहीं करता, कोई बुरे समय पर अच्छे काम नहीं करता, हम वही करते हैं जो 'हम हैं’।
आपके पास कोई विकल्प इत्यादि है नहीं। आप हमेशा बस वही करते हो जो आपको करना ही था। आप कुछ और कर ही नहीं सकते थे। कोई अच्छा समय नहीं आ जाता। समय वैसा ही है जैसे होना है। हाँ, आपकी अपेक्षाओं के ज़रा अनुरूप है तो आप कह देते हो, ‘अच्छा है, अच्छा है।’
आधा घंटा आप देर से पहुंँचे ट्रेन पकड़ने के लिए और ट्रेन एक घंटा लेट (देर) थी—अच्छा है, अच्छा है, और आपको अपनी मंज़िल पर सही जगह पहुंँचना था और ट्रेन एक घंटा लेट थी—बुरा है, बुरा है। दोनों ही स्थितियों में हो तो वही रहा है बाहर। जो हो रहा है, एक ही घटना ‘ट्रेन एक घंटा लेट’ है, पर आपके लिए कभी अच्छा है, कभी बुरा है।
आप जैसे हो आप हमेशा अपनेआप को केंद्र में रखते हो। और जब तक आप अपनेआप को केंद्र में रख रहे हो, आप वह करे ही जाओगे जो आप कर रहे हो। बाद में, प्रायश्चित होता है, बुरा भी लगता है, है न? और प्रायश्चित हो थोड़े ही पाता है! बस अपनेआप को दुख देने की बात है।
सबसे पहले कृपा करके सब ये देखें कि जिसकी भी ज़िंदगी में जो हुआ है वह अकस्मात नहीं हुआ है। हम जैसे हैं, हमारे साथ वो सबकुछ होना-ही-होना था। आज भी जो है वह अनायास नहीं है। आप यहाँ आये हो तो यूँही नहीं आ गये हो। न आने के आपके पास सैकड़ों बहाने थे और नियमित और निरंतर आने के भी आपके पास बड़े कारण हो सकते हैं।




