अवलोकन व ध्यान में अंतर

Acharya Prashant

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अवलोकन व ध्यान में अंतर
ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत से ही दो शब्द बहुत इस्तेमाल हो रहे हैं यहाँ पर अटेंशन एंड ऑब्ज़रवेशन। ख़ुद पर ग़ौर करने का मतलब ये है कि ख़ुद को देखना। लेकिन आचार्य जी, सिर्फ़ देख लेने से से क्या हो जाएगा? देखने का मतलब क्या है?

आचार्य प्रशांत: तो दो बातें हैं: पहला देखने का मतलब क्या है, और दूसरा देखने से होता क्या है, हो क्या जाएगा? पहली बात, अटेंशन का, ऑब्ज़रवेशन का मतलब क्या है? दूसरी बात, ये हो भी गया तो इससे होता क्या है? हो क्या जाएगा?

मतलब कुछ ख़ास इनका है नहीं, दोनों ही जो शब्द हैं ये बड़े सीधे-साधे हैं, दिक़्क़त क्या आ जाती है कि हमने ये शब्द पहले से सुन रखे हैं। हैं तो दोनों ही शब्द डिक्शनरी से ही न। तो हमने अटेंशन शब्द भी पहले से सुन रखा है और ऑब्ज़रवेशन भी सुन रखा है। तो जो पहले से पता है मीनिंग, वो इसमें बीच-बीच में आकर के मिलना शुरू कर देता है। तो उसकी वजह से थोड़ा-सा कन्फ़्यूज़न होना लाज़िमी है, कोई बड़ी बात नहीं, ठीक है।

ऑब्ज़रवेशन बिल्कुल वही है, जो तुम जानते हो। ऑब्ज़रवेशन का मतलब होता है, देखना। ऑब्ज़रवेशन का मतलब होता है, देख लेना। हम जब आम तौर पर ऑब्ज़रवेशन की बात करते हैं, तो आँखों से देखने की बात करते हैं। जब जीवन के सन्दर्भ में ऑब्ज़रवेशन की बात होती है, तो उसका मतलब होता है, जिन भी सेंसज़ से परसीव कर रहे हो, वो अलर्ट हैं।

तुम म्यूज़िक को भी ऑब्ज़र्व ही करते हो। ऑब्ज़रवेशन में लेकिन एक चीज़ होती है कि कोई ऑब्जेक्ट होता है। तुम हमेशा यही कहोगे, कि मैं इस चीज़ को ऑब्ज़र्व कर रहा हूँ। वो जो चीज़ है न, वो उस ऑब्ज़रवेशन का क्या है? ऑब्जेक्ट। मैं अभी माइक ऑब्ज़र्व कर रहा हूँ, पेन ऑब्ज़र्व कर रहा हूँ, दोस्त को ऑब्ज़र्व कर रहा हूँ, बोर्ड को ऑब्ज़र्व कर रहा हूँ, रोड को ऑब्ज़र्व कर रहा हूँ। उसका कुछ केंद्र होगा, सम ऑब्जेक्ट विल बी देयर। जिसको तुम कह सकोगे कि ऑब्ज़रवेशन चल रहा है।

ऑब्ज़रवेशन हम करते ही रहते हैं, लेकिन जो ऑब्ज़रवेशन तुम्हें आज तक पता था और जिस ऑब्ज़रवेशन की बात कोर्स में की गई, उनमें अंतर बस इतना है कि हमारा जो ऑब्ज़रवेशन है, वो आमतौर पर साफ़ नहीं होता है। आँखें देखती हैं, पर देखते ही मन उसमें इंटरफ़ेयर कर देता है और कोई मीनिंग डाल देता है। कान सुनते हैं, पर जो सुनते हैं वो आया नहीं कि उसका एक नामकरण हो जाता है; इमेज-मेकिंग और नेमिंग बहुत जल्दी हो जाती है। ये ऑब्ज़रवेशन के बैरियर हैं। ये ऑब्ज़रवेशन को रोक देते हैं। वरना ऑब्ज़रवेशन बिल्कुल वही है, आँख से देख लिया, ऑब्ज़र्व हो गया। कुछ बड़ी बात नहीं है।

कान से सुन लिया, ऑब्ज़र्व हो गया। पर हम सिर्फ़ देखते और सिर्फ़ सुनते हैं नहीं। हम जब देखते हैं तो उसमें ‘देखना प्लस समथिंग’ हो जाता है। हम जब सुनते हैं तो उसमें ‘सुनना प्लस समथिंग’ हो जाता है। और ये जो प्लस है, ये वास्तव में जो देखा जो सुना, उसमें से कुछ कम कर देता है, माइनस कर देता है।

तुम लोग कृष्णमूर्ति के कुछ आर्टिकल्स पढ़ चुके हो न कोर्स में? कृष्णमूर्ति ने एक बार बड़ा एक अजीब सवाल पूछा। उन्होंने पूछा, “हैव यू एवर रियली सीन अ ट्री?” यह बात किसी बच्चे से नहीं पूछी, यह बात उन्होंने इंटेलेक्चुअल से पूछी; कि “कभी पेड़ देखा है?” अब तुम कहोगे, बड़ी अजीब बात है, पेड़ तो सबने देखा है। कौन ऐसा है जिसको पेड़ नहीं दिखाई देता?

पर सवाल को समझो। तुम कभी पेड़ नहीं देखते। हम सब जब भी पेड़ देखते हैं, तो हमने देखा नहीं कि हम बोलते हैं, "अरे, यह तो पेड़ है।" नेमिंग हो गई न। हमें पहले से ही पता है, ये पेड़ है। तो अब उसमें देखने लायक कुछ बचा नहीं। अब ऑब्ज़रवेशन नहीं हो सकता, मेमोरी ने अपना काम कर दिया; ऑब्ज़रवेशन हैज़ बीन सब्सीट्यूटेड बाय मेमोरी। ऑब्ज़रवेशन गया, मेमोरी ने काम शुरू कर दिया।

जो चीज़ आँखों को साफ़-साफ़ दिखनी चाहिए थी, वहाँ कुछ और है जो आ गया। हम नहीं कर पाए ऑब्ज़र्व। तो बात तो बड़ी सीधी थी, आँख खोलो, पेड़ देख लो। आँख को खोलो और पेड़ को देखो। पर वो छोटी सी चीज़ भी हमारे साथ हो नहीं पाती है।

अब मैंने तुमसे कभी बात कहा, छोटी सी चीज़ हो नहीं पाती है। शब्दों को ऑब्ज़र्व करने को लेकर भी एक प्रयोग कर लेते हैं, मज़ा आएगा। मैंने एक शब्द कहा, ‘चीज़।’ सब लिखो, कि चीज़ माने क्या? शब्द एक ही है जो सबसे बोला गया जितने लोग बैठे हो; पर चीज़ माने क्या? एक शब्द है, चीज़, और एक ही आदमी ने बोला। पर तुम लिखोगे, चीज़; और चीज़ मत लिखना चीज़ को बनाना, ड्रॉ करो जरा। चीज़ माने क्या? उसको बनाओ, स्केच करो। चीज़ क्या है? करो।

मैंने कहा, एक छोटी सी चीज़ है जो कुछ ऐसे करके, अब जो मैंने कहा, शब्द प्रयोग किया, ‘चीज़।’ अब चीज़ को जरा ड्रॉ करो, कैसे ड्रॉ करोगे? कैसे करोगे? करो। पर तुम करते हो, मन तो करता है क्योंकि जैसे ही मैंने कुछ बोला, मन का काम ही है कि वो उसके साथ एक छवि बना दे, इमेज फॉर्मेशन तुरंत होता है। बनाओ चीज़। जल्दी से बना लो, पाँच सेकंड में क्रूडली बिल्कुल।

अब अपना और अपने नेबर का जो स्केच है, उसको देखो, कि क्या एक ही है? क्या एक ही चीज़ बनाई है? जिन्होंने कुछ बनाया नहीं वो कान में बता दें दूसरे को, मैं सोच क्या रहा था। इशारा समझ में आ रहा है?

एक ही शब्द है जो कहा जा रहा है, पर तुम एक ही चीज़ सुन नहीं रहे। एक ही शब्द कहा गया है। कितने यहाँ पर बैठे हुए हैं स्पीकर? पंद्रह-बीस तो नहीं बैठे हैं। एक स्पीकर है और एक शब्द कह रहा है; पर जितने भी यहाँ लोग बैठे हैं वो सब अलग-अलग सुन रहे हैं।

आँखों के लिए जैसे तुम ऑब्ज़रवेशन यूज़ करते हो न, वैसे ही कानों के लिए तुम यूज़ करते हो, लिसनिंग। वो एक ही चीज़ है। अब वो हो नहीं पाया। तुम मेरे शब्द को ऑब्ज़र्व नहीं कर पाए और उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं। मन की ट्रेनिंग ही ऐसी है कि कुछ सुनेगा नहीं, कि उसमें वो कुछ जोड़ देगा। और तुमने अलग जोड़ा, तुम्हारे पड़ोसी ने अलग जोड़ा, यह जोड़ा, वो जोड़ा। बड़ी ख़तरनाक चीज़ हो रही है। कि बात कही तो एक जा रही है, और पहुँच कितनी रही है? जितने लोग बैठे हैं, उतनी बातें पहुँच रही हैं।

इस बात की गहराई को, ग्रेविटी को समझो। इसका मतलब है, हम सब अपनी दुनिया में जी रहे हैं। इसका मतलब यहाँ पर एक लेक्चर नहीं चल रहा है, पचास लेक्चर चल रहे हैं। तो फिर कम्युनिकेशन कैसे होगा? क्योंकि तुम कुछ समझ रहे हो, वो कुछ समझ रहा है, वो कुछ समझ रहा है, वो कुछ समझ रहा है।

तो मैं इसको और ज़्यादा अगर वेरीफ़ाई करना है, तो अभी जब मैं अपनी बात पूरी करूँगा, तो सब ज़रा लिख लेना तीन पॉइंट्स में, कि मैंने क्या कहा? और अपने-अपने पड़ोसी से फिर कम्पेयर कर लेना। और तुम हैरान रह जाओगे कि ये कैसे हो सकता है! हम दोनों ने अगर एक ही बात सुनी, तो हम दोनों के सुनने में इतना फ़र्क़ कैसे आ गया? सुनी तो दोनों ने एक ही बात।

दोनों ने एक ही बात नहीं सुनी। हम सबके अपने मन हैं, हम सबके मन की अपनी एक दुनिया है, और हम उसी में जीते हैं। समझ रहे हो? तो ऑब्ज़रवेशन बड़ी साधारण-सी चीज़ होकर भी बड़ी इम्पॉसिबल हो जाती है। इसीलिए बार-बार तुमसे ये शब्द कहना पड़ता है, ऑब्ज़र्व।

ऑब्ज़र्व का मतलब है बेसिकली, ऑब्ज़र्व विदाउट प्रिजुडिस; ऑब्ज़र्व विदाउट इमेज-फ़ॉर्मेशन।

पर हमारी आँखों की, कान की, स्किन की ट्रेनिंग ऐसी हो चुकी है कि वो काफ़ी इनसेंसिटिव हो गई है। हम ठीक से देख भी नहीं पाते, हमारी सेंसज़ भी डल हो गई हैं। अभी मौक़ा है, बिकॉज़ वी आर स्टिल यंग।

अटेंशन पर आते हैं। हमने कहा, ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर।

तुम ये नहीं कहोगे, कि आई एम अटेंटिव अबाउट समथिंग। ऑब्ज़रवेशन में तुम क्या कहोगे? आई एम ऑब्ज़र्विंग समथिंग। अटेंशन में तुम यह नहीं कह सकते, कि आई एम अटेंटिव टुवर्ड्स समथिंग। अगर तुमने यह कह दिया तो फिर वो अटेंशन नहीं है, वो एक तरह का कंसंट्रेशन है। और कंसंट्रेशन अटेंशन नहीं होता। समझ में आ रही है बात?

अटेंशन का मतलब बस होश है, “मैं होश में हूँ।” ऐसे समझ लो, कि यह रोशनी जल रही है इस रूम में। यह चुनाव नहीं कर रही है न कि रोशनी किस ऑब्जेक्ट पर पड़ेगी और किस ऑब्जेक्ट पर नहीं पड़ेगी। इस कमरे में यह लाइट है, ये चुनाव तो नहीं कर रही है न, ये समझ लो अटेंशन है। ये ऑब्जेक्ट-इंडिपेंडेंट है। इस कमरे में जो कुछ हो रहा होगा, उसी पर यह रोशनी पड़ेगी।

तुम यहाँ चलो, यू आर वॉकिंग इन अटेंशन। यू आर वॉकिंग इन लाइट। लेट दिस लाइट बी अटेंशन। अगर तुम इस कमरे में चलो, तो यू आर वॉकिंग इन अटेंशन बिकॉज़ यू आर वॉकिंग इन लाइट। तुम यहाँ सो भी जाओ, तो यू आर स्लीपिंग इन अटेंशन। यू आर स्पीकिंग इन? यू आर लिसनिंग इन अटेंशन। यू आर सिंग इन अटेंशन। तुम जो कुछ भी करोगे, उस पर यह रोशनी पड़ रही है। इस कमरे में जो भी होगा, उस पर यह रोशनी पड़ रही है। ये अटेंशन है।

ऑब्ज़रवेशन ऑब्जेक्ट-स्पेसिफ़िक हो जाता है। अब रोशनी सब कुछ पर पड़ रही है, पर तुम चुनाव करते हो कि अभी मैं सिर्फ़ बोर्ड को देख रहा हूँ। फ़र्क़ को समझ रहे हो? रोशनी हर एक चीज़ पर पड़ रही है, पर तुम फ़ैसला करते हो कि मैं देख किसको रहा हूँ, बोर्ड को देख रहा हूँ। तो अब यह क्या हो गया, बोर्ड को देखना? ये ऑब्ज़रवेशन हो गया। यही असली ऑब्ज़रवेशन है, क्योंकि इस ऑब्ज़रवेशन के पीछे क्या बैठा हुआ है? अटेंशन।

यह रोशनी जल रही है, यह रोशनी न जले तो तुम बोर्ड को देखोगे भी, तो तुम्हें धुँधला-सा दिखाई देगा। तुम ठीक-ठीक पढ़ नहीं पाओगे क्या लिखा है। इसलिए तुम्हारी इमेजिनेशन बीच में आ जाएगी, मेमोरी बीच में आ जाएगी। बात स्पष्ट हो पा रही है?

अटेंशन इज़ लाइक अ बैकग्राउंड लाइट विच इल्यूमिनेट्स द एंटायर वर्ल्ड ऑफ माइंड, व्हाटएवर इज़ हैपनिंग। व्हाटएवर इज़ हैपनिंग, इज़ हैपनिंग इन अटेंशन। इट हैज़ नो चॉइस रिगार्डिंग इट्स ऑब्जेक्ट। अटेंशन ये नहीं कहता, कि मैं यह करता हूँ तो मैं अटेंशन में आ जाता हूँ। बस अटेंशन है, अटेंशन इज़ देयर। एंड इन अटेंशन सेवरल एक्टिविटीज़ कीप हैपनिंग। द एंटायर लाइफ़ कीप्स मूविंग। और जब अटेंशन में जीवन आगे बढ़ता है, तो ऑब्ज़रवेशन साफ़ रहता है, लिसनिंग साफ़ रहती है। अटेंशन में ऑब्ज़रवेशन कैसा रहेगा? अटेंशन में लिसनिंग कैसी रहेगी? क्लियर?

अभी तुम मुझे सुन रहे हो। जो लोग अटेंटिव माइंड में सुन रहे हैं, वो मेरे शब्दों को ऑब्ज़र्व कर पाएँगे। और जिनका माइंड अटेंशन में नहीं है, वो नहीं कर पाएँगे। उसमें एक दूसरी बात भी है कि जिनका माइंड अटेंटिव है अभी, वह सिर्फ़ मेरे ही शब्दों को नहीं ऑब्ज़र्व कर रहे; जो कुछ हो रहा है, वो हर चीज़ के प्रति जागरूक हो जाएँगे। क्योंकि यह रोशनी जब जल रही है, तो हर चीज़ पर पड़ रही है। इस वक़्त अगर उनका पड़ोसी थोड़ी आवाज़ भी करता है, तो वो उनको आवाज़ बहुत ज़ोर से सुनाई देगी।

तुमने कभी यह नोटिस किया है कि जब तुम ध्यान में बैठे होते हो, तब अगर हल्की-सी भी आवाज़ हो, तो आवाज़ बहुत ज़ोर से सुनाई देती है। बहुत बड़ा डिस्टरबेंस बन जाती है। अभी इस समय इस कमरे में अगर कोई पेन गिरा दे, तो उसकी आवाज़ तुम्हें बिल्कुल एम्प्लीफ़ाई होकर सुनाई देगी; और आमतौर पर पेन गिरते रहते हैं किसी को क्या फ़र्क पड़ता है?

वो इसलिए हो रहा है क्योंकि इस वक़्त मन जो है, मन अटेंशन में है। जब मन अटेंशन में होता है, तो जितनी घटनाएँ होती हैं, वो बहुत साफ़ और बहुत स्पष्ट सुनाई देती हैं। समझ में आ रही है बात?

फिर तुमने कहा, कि इनसे हो क्या जाएगा? अटेंशन से हो क्या जाना है? सिर्फ़ देखने से, ऑब्ज़रवेशन से? सब कुछ हो जाना है। एक मूलभूत बात है, कि सीइंग इज़ डूइंग। जब तुम कहते हो, कि हो क्या जाना है? तो तुम्हारा अर्थ यह है कि उससे घटना क्या घटेगी? एक्शन क्या हो जाएगा? तुम एक्शन को इम्पॉर्टेन्स दे रहे हो, है न?

सीइंग इज़ डूइंग।

जो समझ में आ गया, वो कर्म में उतरता ही उतरता है। जो समझ में आ गया, वो एक्शन में रिफ़्लेक्ट होगा ही होगा। तुम चाहकर भी उसे रोक नहीं पाओगे।

तुम पूरी कोशिश कर लो उसे रोकने की, तब भी उसे रोक नहीं पाओगे। तो इस बात की कोशिश ख़ास करनी ही नहीं चाहिए कि मैं बहुत एफ़र्ट करके एक्शन करूँ। तुम सारा एफ़र्ट कर लोगे अगर एक बार तुमको बात समझ में आने लग जाए। तुमको एक बार समझ में आने लग जाए न कि तुम बीमार हो, तुम ख़ुद कोशिश करोगे दवाई खाने की, डॉक्टर के पास जाने की, डायग्नोसिस की, प्रोग्नोसिस की ख़ुद कोशिश करोगे। पहले लेकिन समझ में आना ज़रूरी है कि मेरी बीमारी है।

जिसको समझ में ही नहीं आया कि मैं बीमार हूँ, अभी वो स्वस्थ होने की कोशिश भी नहीं शुरू करेगा। जो भी काम होगा, वो अंडरस्टैंडिंग से ही तो निकलेगा न? और अगर बिना अंडरस्टैंडिंग के तुम कोशिश कर भी रहे हो, तो कोशिश तुम्हारे काम नहीं आएगी कि आएगी?

सो, अटेंशन-ऑब्ज़रवेशन इज़ एवरीथिंग, जस्ट एवरीथिंग। ऑब्ज़रवेशन से ही निकलती है अंडरस्टैंडिंग। ऑब्ज़रवेशन अगर साफ़-साफ़ हो रहा है; अभी अगर साफ़-साफ़ सुन रहे हो, तो अंडरस्टैंडिंग पैदा होगी, क्लैरिटी आएगी और उस क्लैरिटी से बड़ा तेज़ एक्शन निकलता है। उस क्लैरिटी से बहुत एनर्जेटिक एक्शन निकलता है, इतनी एनर्जी जितनी तुम अपने एफ़र्ट से नहीं जुटा सकते।

आमतौर पर हम सोचते हैं कि एनर्जी के लिए डिटरमिनेशन चाहिए, विल-पावर चाहिए। यही कहते हो न, कि पूरी कोशिश चाहिए? ये सब नहीं चाहिए। एनर्जी के लिए क्लैरिटी चाहिए। जैसे ही क्लैरिटी होती है, तो तुम्हारा पूरा जो ऑर्गेनिज़्म है, उसका सारा फ़्लो, एनर्जी का चैनलाइज़ेशन हो जाता है। और वो तुम्हारी कोशिश से नहीं होता, वो अपने आप हो जाता है।

एक बार जो बंदा जान जाता है कि ज़रूरी क्या है, वॉट इज़ इम्पॉर्टेन्ट? और पूरी क्लैरिटी से जान जाता है कि यह इंपॉर्टेंट है, उसको कोई रोक नहीं सकता। अब उसको रोका नहीं जा सकता, क्योंकि उसने ख़ुद जान लिया है कि क्या इंपॉर्टेंट है। उसे सुन नहीं लिया है, समझना बात को। उसे किसी और ने आके नहीं बता दिया है, उसने ख़ुद जान लिया है, दैट दिस इज़ इम्पॉर्टन्स ऐंड वैल्यूएबल। अब तुम उसे रोक के दिखाओ, अब तुम उसे कन्विन्स करके दिखाओ कि भाई, तू ये न कर। तुम उसे रोक ही नहीं सकते।

इसी बात की कोरोलरी को समझो, अगर हम यह पाते हैं कि हमारी ज़िंदगी में एनर्जेटिक एक्शन नहीं रहता, अगर हम ये पाते हैं कि हम अक्सर डल रहते हैं, बोर्ड रहते हैं, एनर्जी-लेस रहते हैं, तो इसका अर्थ क्या हुआ? हमने कहा, क्लैरिटी से निकलती है एनर्जी, और अगर किसी के जीवन में एनर्जी का अभाव हो, तो इसका क्या मतलब है?

श्रोता: क्लैरिटी नहीं है।

आचार्य प्रशांत: क्लैरिटी नहीं है। और ये कोर्स इसीलिए है, ताकि तुम जैसे जवान लोग एनर्जेटिक रहें, बोर्ड न रहें, डल न रहें, लाइफ़-लेस न रहें। और एनर्जी कूदने-फाँदने से नहीं आएगी, एनर्जी मोटिवेशन से नहीं आएगी, कोई आगे तुमसे अच्छी-अच्छी बातें बोले, उससे तुम एनर्जेटिक हो जाओ। एनर्जी तो सिर्फ़ क्लैरिटी से आती है।

एनर्जी तो सिर्फ़ तभी आती है जब बात साफ़-साफ़ दिख रही हो कि भाई, ऐसा ही हैक् मैंने पकड़ लिया बात को। फिर देखो कितनी एनर्जी उठती है। और वो एनर्जी एप्रोप्रियेट होती है। वो एनर्जी स्कैटर्ड नहीं होती। वो एनर्जी मिस-डायरेक्टेड नहीं होती। वो एनर्जी रैंडम भी नहीं होती कि कहीं को भी भाग लिए। वो एनर्जी समझ लो एक शार्प पॉइंटेड एरो की तरह होती है जो बिल्कुल सही दिशा में जाता है, पूरी स्पीड से जाता है और जाकर के बस लग जाता है।

प्रश्नकर्ता: इसका मतलब हर थॉट की एनर्जी होती है अपनी। तभी दिमाग में जब कहते हैं कि विचलन है, बहुत सारा विचार आ रहे हैं, तो हमारी एनर्जी रिफ़्लेक्टेड है। फिर जब हमें क्लैरिटी हो जाती है तो एनर्जी एक दिशा में है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, बढ़िया बढ़िया, बहुत बढ़िया। ऑब्ज़रवेशन में भी एनर्जी लगती है। और वही एनर्जी जब स्कैटर हो जाती है, बिखर जाती है, अपना सेंटर खो देती है, तो वो बिखरे हुए थॉट्स की एनर्जी हो जाती है। हमारी ही एनर्जी, चूँकि चैनलाइज़ नहीं है, इसीलिए सौ तरह के थॉट्स में इधर-उधर होती रहती है।

क्लैरिटी में क्या होगा? कि वो पूरी शार्प पॉइंटेड एरो बन जाएगी, और ये सौ तरह के जो थॉट्स हैं, इनमें एनर्जी नहीं बचेगी। इनमें नहीं बचेगी। सारी एनर्जी बस एक दिशा में जाएगी और वही तुम्हारे लिए सही दिशा होगी। वो क्या दिशा होगी, वो तुम्हें देखना है, क्योंकि ज़िंदगी तुम्हारी है। पर जो भी होगा, वो सही ही होगा, बढ़िया होगा मस्त।

प्रश्नकर्ता: सर, ये हमें पता कैसे चलेगा कि अटेंशन में हैं या नहीं?

आचार्य प्रशांत: जो अटेंशन में होता है, उसको अटेंशन का थॉट नहीं आता, समझो बात को। जो अटेंशन में होता है न, वो ये सवाल ही नहीं उठाता कि अटेंशन है कि नहीं है? हर थॉट अपने आप में डिस्टर्बेन्स है। किसी को कैसे पता चले कि तुम बीमार नहीं हो? तुम्हें कैसे पता चलता है, मैं बीमार नहीं हूँ?

प्रश्नकर्ता: वहाँ पर कोई सिम्पटम्स नहीं होते बीमारी के।

आचार्य प्रशांत: सिम्पटम्स तो बीमारी के होते हैं।

प्रश्न मकर्ता: जब हम बीमार नहीं होते तब सरल (ईज़ी) सा लगता है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, यू फ़ील ऐट ईज़। यही है न? तुम बीमार हो इसके तो सिम्पटम्स हो सकते हैं; और मेडिकल साइंस ने जितने भी सिम्पटम्स उठाए हैं, वो बीमारी के ही उठाए हैं। हेल्थ का क्या सिम्पटम होता है? हेल्थ का यही सिम्पटम है दैट आइ ऐम ऐट पीस। आइ ऐम नॉट फ़ीलिंग अनीज़ी।

तुम्हें ये तो पता चल जाता है, मुझे प्यास लगी है। जैसे ही प्यास लगती है, तो गला सिग्नल भेजना शुरू कर देता है। पर तुम्हें ये कैसे पता चलता है कि मुझे प्यास नहीं लगी है? बस, नहीं लगी है। उसका और कोई इंडिकेटर नहीं हो सकता। बस नहीं लगी है, अब तुम अनइज़ी नहीं हो। यू आर विद योरसेल्फ, सेंटरड, स्टिल, स्टेबल। एंड दैट इज़ इट। देयर इज़ नथिंग मोर मैग्निफ़िसेन्ट अबाउट इट।

कुछ और नहीं है कि बहुत बड़ी बात हो जाएगी। जब तुम अटेंशन में हो तो फूल खिलने लगेंगे और तुम्हारा ऑरा बन जाएगा, और कोई दिव्य दृष्टि आ जाएगी। ऐसा कुछ नहीं हो जाएगा। बस ये है कि इज़ी रहोगे, चलोगे तो इज़ी रहोगे, पढ़ोगे तो इज़ी रहोगे, हँसोगे तो भी इज़ी रहोगे, खेलोगे इज़ी रहोगे। देयर वुड बी वेरी स्मूथ, रिवर लाइक फ़्लो टू लाइफ़।

जब तक ये पाओ कि डाउट्स हैं; और हमारे डाउट्स बहुत रहते हैं न, बात-बात में हमें डाउट रहता है, किसी भी चीज़ में हम 100% श्योर तो होते नहीं। जब तक ये पाओ कि डाउट्स हैं, तब तक समझ लेना कि क्लैरिटी नहीं है। बस यही है। जब तक ये पाओ कि बार-बार सोचना पड़ रहा है, तब तक समझ लेना कि अंडरस्टैंडिंग नहीं है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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