
प्रदूषण केवल जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि गलत इरादों, सुविधा-प्रियता और गैर-जिम्मेदारी से पैदा होता है। लोग प्रदूषण के बारे में जानते हुए भी उसे बढ़ाते हैं क्योंकि ज्ञान अपने आप में पर्याप्त नहीं है। नदियों, हवा और पर्यावरण को सचमुच स्वच्छ बनाने के लिए पहले मन और नीयत को स्वच्छ करना आवश्यक है। बाहरी गंदगी अक्सर भीतर की अव्यवस्था और असंवेदनशीलता का ही विस्तार होती है।

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

फटी हुई जींस पहनने, और बाल रंगवाने से कोई कूल नहीं हो जाता। कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है, परंतु कूल हो नहीं, और ख़ुद को कूल कहो — यह समस्या है। कूल होना आध्यात्मिक बात है। कूल होने का असली मतलब है कि तुम श्रीकृष्ण का ज्ञान जानो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — तू विगत-ज्वर हो जा। जिसे ज्वर न चढ़े, जो आवेश और आवेग से मुक्त हो, वही वास्तव में कूल है।

साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।

पुरुषों में महत्त्वाकांक्षा और महिलाओं में भावना, उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते। समाज, संस्कार, लोकधर्म और देह, ये सब मिलकर चाहते हैं कि आप अपना पूरा जीवन सिर्फ़ देह के कामों में निकाल दो, कोई भी ऊँचा काम न करो। तुम्हारी भावनाएँ बंधन हैं, गहना मत माना करो उन्हें। संघर्ष करना सीखो, कोई भावनात्मक मजबूरी नहीं होती। 'मैं क्या करूँ, मेरे आँसू निकल जाते हैं।' तो फिर, ‘आँसुओं के साथ सही काम करो।’ बात इसमें नहीं है कि भावना उठी, बात इसमें है कि आपने भावना को समर्थन दे दिया क्या?

जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।

सिविलाइजेशन की एक बड़ी पहचान होती है, 'रिस्पेक्ट फ़ॉर इंडिविजुअलिटी।' कोई पूछे, ‘सिविलाइजेशन, सभ्यता की परिभाषा क्या है?’ निजता का सम्मान बढ़ने लगता, जैसे-जैसे सभ्यता बढ़ती है। और अगर निजता का सम्मान नहीं बढ़ रहा है तो जान लो कि हम अभी बहुत असभ्य लोग हैं। पर्सनल स्पेस की कद्र करना सीखिए। शारीरिक तौर पर भी और मानसिक तौर पर भी। न किसी के शरीर पर चढ़िए, न किसी के मन पर चढ़िए।

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…

हम एक ऐसे माहौल में जीते हैं जिसमें समझ के लिए बहुत जगह नहीं है, और इसलिए हमने भावनाओं को बहुत ऊँचा दर्जा दे दिया है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि जो कोई भी तुम्हें ग़ुलाम बनाना चाहेगा, वह जरूर भावुकता का प्रदर्शन करेगा। भावुक करके ही तुम्हारे मन पर कब्जा किया जा सकता है। भावुकता में बड़ी हिंसा है! संवेदनशीलता में प्रेम है; संवेदनशीलता सीखो, भावुकता नहीं।

जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन पर लगी चोट से कैसे उबरें?
आचार्य प्रशांत: दूसरे काम करो। तुम्हें हर्ट (दर्द) पसंद है इसीलिए उसको पकड़ के बैठे हो। वो बंदर याद है न? एक मर्तबान था जिसका मुँह बड़ा सँकरा था, बंदरिया भी हो सकती है (श्रोतागण हँसते हैं।), चलो बंदर, चलो…

जब हमारा दमन होता है तब जिस ऊर्जा का दमन हो रहा होता है, वह ऊर्जा हममें सड़ने लगती है। वही ऊर्जा जो एक फूल बन सकती थी, काँटा बन जाती है। जिस ऊर्जा से विकास हो सकता था, वह थम कर बदबू देना शुरू कर देती हैl ऊर्जा को…

पहली कुसंगति आंतरिक होती है। मन ऐसा कुसंगी है जिसे बाहर कुसंग नहीं खोजना पड़ता। मन को अगर मन का साथ मिल जाए तो इससे बड़ा कुसंग नहीं। बाहर का कुसंग हटाना आसान है, पर भीतर वाला कुसंग, जहाँ आदमी अपने ही विचारों में फँसा है, "मैं हूँ और मेरे विचार हैं" - इससे बड़ी कुसंगति क्या हो सकती है? आंतरिक कुसंगति न हो तो बाहर का कुसंग कुछ नहीं कर सकता।

जैसे शरीर को पोषण देते हैं, वैसे ही मन को पोषण दीजिए। फ़िल्म देखने से मन को पोषण नहीं मिल जाना है, मैच देखने से नहीं मिल जाना है। पार्टी करने से, ख़रीददारी करने से भी नहीं मिल जाना है। जहाँ मिलना है, वहाँ जाइए। वो मैंने करा है, इसीलिए आपसे बड़े अधिकार और बड़े विश्वास के साथ कहता हूँ कि आप भी करिए।

हम सोचते हैं वर्तमान में होने का अर्थ है कि जो काम कर रहे हो उसमें हो जाओ। ये हो ही नहीं पाएगा। हम सोचते हैं वर्तमान में होने का अर्थ है कि इस वक़्त जो हो रहा है उसको अपना पूरा मन दे दो। ये हो ही नहीं पाएगा जब तक तुम अपनी उस जगह को उपलब्ध नहीं हो जाते जो वास्तव में है, जो वास्तव में प्रेज़ेंट (वर्तमान) है, जिसकी सत्ता सच्ची से सच्ची है, जो बदल नहीं सकती, जिसका कोई आना-जाना नहीं है। जब तुम वहाँ बैठे होते हो तब दुनिया भी तुम्हारी होती है और चूँकि हम वहाँ नहीं बैठे होते इसीलिए हम दुनिया में भी फिसड्डी रह जाते है।

प्रश्नकर्ता: कोई काम करते हैं या कोई बुक पढ़ते हैं, तो मन उस समय नहीं होता, वो भविष्य या भूतकाल में चला जाता है। ज़्यादातर प्रेज़ेन्ट (वर्तमान) में नहीं रहता है। तो क्या करें कि वो अधिकांशतः वर्तमान में ही रहे?
आचार्य प्रशांत: क्या करोगे तुम वर्तमान में रहकर?
प्र:…

प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…

प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न नोट्स में से है: "बीइंग अवेयर ऑफ़ डिमांड्स ऑफ बॉडी, बीइंग अवेयर ऑफ़ स्ट्रे थॉट्स, दिस इज़ इंटेलिजेंस। इट ऑकर्स थॉट् इज़ एन इनेडिक्वेट रिस्पांस टू स्टिमुलस। एन एडीक्वेट रिस्पांस इज स्पॉनटेनिटी।" ("शरीर की माँगों के प्रति जागरूक होना, आवारा विचारों से अवगत होना, यह बुद्धिमत्ता है।…

मन इतना अशांत क्यों रहता है?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आज मेरा प्रश्न फिर से मुझसे ही जुड़ा हुआ है, कि मेरा मन इतना अशांत क्यों रहता है। एकसाथ मेरे दिमाग में बहुत चीज़ें चलती रहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है, मैं ध्यान केंद्रित…

उत्साह और निरुत्साह एक दूसरे की छाया है। बेईमानी हमारी ये होती है कि अचानक किसी दिन आएँगे 'आज मैं ये कर दूँगा, वो कर दूँगा।' ऊँचे-ऊँचे दावे, बड़ी-बड़ी बातें और वो बड़ी बातें हम कर ही इसीलिए रहे हैं ताकि कल से फिर कुछ न करना पड़े। जो असली आदमी होता है उसके पास एक शान्त, स्थिर, शीतल उत्साह होता है। जब उत्साह सहज बन जाए, उत्साह में जब एक सहजता हो, आपको उत्साह चाहिए ही नहीं, आपका सहज काम ही ऊर्जावान हैं।

प्रश्नकर्ता: किसी भी मन को सत्य की तरफ़ दिशा कैसे मिलेगी अगर उसकी ज़िन्दगी में शरीर रुपी गुरु ही नहीं हो? गुरु के बिना क्या सत्य से साक्षात्कार होने की सम्भावना है भी?
आचार्य प्रशांत: ऐसा किसी के साथ भी नहीं होता कि वो एक पर्सन (व्यक्ति) से ही खाली…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: इंटरनेट से एक बहुत लम्बे समय तक मेरा कोई विशेष लगाव नहीं था। यूट्यूब भी मैंने तभी देखना शुरू किया जब आपको सुनने की आदत लगी है आपके कारण ही मैंने इंटरनेट पर ज़्यादा समय बिताना शुरू किया, पर अब ये हो गया है कि इंटरनेट पर मैं आता…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, साक्षीभाव से साधना के विषय में कहा जाता है कि किसी एक विशेष चीज़ पर आपका ध्यान लगा होना चाहिए, जैसे विपश्यना ध्यान जिसमें अपनी आती-जाती साँसों के प्रति होश पूर्ण रहा जाता है, लेकिन आप हमें जिस चीज़ के प्रति सचेत रहने को कहते हैं वो…

देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां हसड्भादजस्त्र परिवर्तते धियः। वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा यावद्धवेत्तावदसौ भवोद्धव: ।।
बुद्धि की वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतना आत्मा के संघातरूप से निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञानरूपा है और जब तक यह रहती है, तब तक ही संसार में…

गुणानुरक्त्तं व्यसनाय जन्तो: क्षेमाय नैर्गुण्य मथो मन: स्यात्। यथा प्रदीपो घृत्वर्तिमश्रन् शिखा: सधूमा भजती ह्यन्यदा स्वम्।। पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मन: श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम्।।
विषयासक्त मन जीव को संसार-संकट में डाल देता है विषयहीन होने पर वही उसे शान्ति में मोक्ष पद प्राप्त करा देता है। जिस प्रकार घी से भीगी हुई…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं तीस वर्ष का हूँ। एक दशक से ज़्यादा से बाइपोलर डिसॉर्डर (दोध्रुवी विकार) की समस्या से जूझ रहा हूँ। ओशो जी द्वारा सुझाई विधियों ने कुछ मदद भी की। परिवार के साथ ही रहता हूँ। कोई काम नहीं करता हूँ। आप कोई विधि बताएँ। परिवार…

श्री भगवान् उवाच सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन:। सत्त्वेननान्यतमौ हन्यात् सत्त्वेन चैव हि।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम — यह तीनों बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्मा के नहीं। सत्त्व के द्वारा रज और तम — इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। गुरु पूर्णिमा पर आपको बहुत सारा धन्यवाद। आपके कारण मैंने ईशावास्य उपनिषद् पढ़ा, वैसे पहले बस में उपन्यास वगैरह ही पढ़ता था। सर, ये बताइए कि आपने अपनेआप को गुरु बुलवाने में इतना अनकम्फ़रटेबल (असुविधाजनक) क्यों रखा है? आप हमेशा खुद को गुरु बुलवाने में इतना अनकम्फ़रटेबल…

आचार्य प्रशांत: हम जैसे जीते हैं, हमारे लिए दो हैं, एक संसार और एक हम। संसार और एक हम, कुछ हम संसार की बात करते हैं, कुछ हम अपनी बात करते हैं। जब हम अपनी बात करते हैं तो भी हम अपने आप को देखते उन्हीं उपकरणों से और उसी…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! आचार्य जी, एक सिचुएशन है। जैसे बाहर कुछ हो रहा है दुख-सुख और वो मेरे पर घट रहा है और पीछे से कोई देख रहा है।और फिर उसको मैं जानना चाह रही हूँ कि वो कौन है। फिर जैसे ही मैं कोई भी चीज़ देख रही…

सर्वभावं न सन्देह : सर्वं नास्ति न संशय:। सर्वं तुच्छं न सन्देह : सर्वं माया न संशय:।।
All is thought. There is no doubt of this. All is not. And there is no doubt of this. All is trifling. And there is no doubt of this.All is illusion. And…

एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।
इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।
~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३
आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं…

प्रश्नकर्ता: जैसे मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और हाॅस्पिटल, कुछ मेडिकल और कुछ सेवाएँ हैं जहाँ सेवा चलते रहती है और लाभ उठाने वाले जो लोग हैं, क्या उन सेवाओं से उन पर दुष्परिणाम हो रहा है? जहाँ से फ्री (मुफ़्त) में जो उठा रहे हैं सेवा का लाभ और क्या इन…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब आप बोलते हो कि शुरुआत होगी तथ्य से, तो तथ्यों को देखना हैं, अब हर समय ऐसे तथ्यों को दूर ही से नहीं देखा जाता। जैसे अतीत है तो अतीत में भी उन तथ्यों के पास जाकर क्योंकि वो वहाँ लगातार हो रहे हैं तो…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा मन बहुत भटकता है और जब भी मन को एकाग्र करने की कोशिश करता हूँ, तो एकाग्र नहीं हो पाता। तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: मैं तुम्हें बता दूँ कि मन को कैसे एकाग्र करते हैं ताकि तुम इसको…

आचार्य प्रशांत: जो ये सारा छवि बचाने का खेल है, ये माल के लालच का खेल है।
ये जो पूरी बात ही है कि समाज में अपनी छवि अच्छी रहे, इज्ज़त ऊँची रहे, समझिए अच्छे से, कि वो बात पूरे तरीक़े से भौतिक है, मटेरियल है। भौतिक है, मटेरियल है।…

प्रश्नकर्ता: मैंने इस साल मई में पहली बार आपके सत्संग शिविर में हिस्सा लिया और इसके बाद मुझे शिविर का महत्व पता चला, क्योंकि अगर मैं ये शिविर नहीं लेती तो शायद मनोचिकित्सालय में होती।
मैं स्वयं साइकॉलोजी (मनोविज्ञान) की छात्रा हूँ, मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से साइकोलॉजी में बीए, एमए…

प्रश्नकर्ता::आर्टिकल (लेख) इंग्लिश में पढ़ रहे हैं और सवाल हिन्दी में रखना चाहूँगा 'क्रिएटिंग अ न्यू ह्यूमैनिटी थ्रू इंटेलिजेंस स्प्रिचुअलिटी' ( बौद्धिक आध्यात्मिकता के माध्यम से मानवता का निर्माण) पढ़ा था। और बहुत अच्छी वार्तालाप हुई; सभी सदस्यों के साथ। उसमें मैं पढ़ता हूँ कि कहाँ पर थोड़ी…

आचार्य प्रशांत: यहाँ चल रहे हैं उपनिषद् और उसके (एक श्रोता की ओर संकेत) दिमाग में खाना और खटिया है। ये आदमी घटिया है। सब घटिया है। किसी एक की नहीं बात हो रही है आदमी ही घटिया है।‘आचार्य जी, आप तो मनुष्यमात्र के गौरव की ज़रा भी परवाह…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने आपका पहले वाला पुराना एक वीडियो देखा था। जिसमें आपने कहा था कि मुझे जो मिला है वह आप सबको मिलना चाहिए तो वह मतलब क्या है और कैसे हमको मिलेगा, उसके लिए क्या करना है? ये मेरा प्रश्न था।
आचार्य प्रशांत: वही तो कर…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन आज के सत्र से है जिसमें आपने बोला कि हिंसा कमज़ोरी की निशानी और अहिंसा मज़बूती की है। लेकिन आजकल हिंसा को कई तरीकों से उचित ठहराया जा रहा है।
अभी तीस जनवरी को गाँधीजी की पुण्यतिथि आने वाली है, तो जितना हमें उस…

प्रश्नकर्ता: दुनिया की इस आठ-अरब की आबादी में आत्मस्थ आदमी की पहचान कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: तो गौरव, आत्मस्थ आदमी की पहचान तुम्हें करनी क्यों है? आत्मस्थ आदमी की पहचान तुम करना चाहते हो, इसका मतलब आत्मस्थ आदमी कुछ खास होता होगा! तुम ये तो कहते नहीं, कि “आठ-अरब की…

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) सौरभ झांगिड़ हैं, कह रहे हैं कि “सर (महोदय), मुझे अपनी नौकरी में काफ़ी कोशिशों के बाद भी तरक्की नहीं मिल पा रही है। मैं सेल्स-विभाग में हूँ, और मेरे सीनियर्स का कहना है कि मैं क्लाइंट्स का मन नहीं पढ़ पाता हूँ…

प्रश्रनकर्ता: कल ही एक बड़ी दुखद खबर मैंने पढ़ी, और सोचा था कि आपसे ज़रूर इस विषय में प्रश्न करूँगा।
हम हैं जो क्वारंटाइन (संगरोध) हैं, और सरकार की पूरी ज़िम्मेदारी है कि हमें बचाये इस बिमारी से, और समाज में एक वर्ग है डॉक्टरों का। वो, वो डॉक्टर हैं…

आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…

प्रश्नकर्ता: मुझे ईश्वर में विश्वास करना कठिन लगता है। मैं क्यों मानूँ कि कोई महान या संचालक सत्ता कहीं है या सब कुछ चला रही है।
अगर मैं नास्तिक हूँ और ईश्वर में विश्वास नहीं करता, तो क्या मैं आध्यात्मिक नहीं हो सकता?
आचार्य प्रशांत: अच्छा मुद्दा है, सबके काम…