पहली कुसंगति आंतरिक होती है। मन ऐसा कुसंगी है जिसे बाहर कुसंग नहीं खोजना पड़ता। मन को अगर मन का साथ मिल जाए तो इससे बड़ा कुसंग नहीं। बाहर का कुसंग हटाना आसान है, पर भीतर वाला कुसंग, जहाँ आदमी अपने ही विचारों में फँसा है, "मैं हूँ और मेरे विचार हैं" - इससे बड़ी कुसंगति क्या हो सकती है? आंतरिक कुसंगति न हो तो बाहर का कुसंग कुछ नहीं कर सकता।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन को कुसंगति से दूर रखने का क्या तरीक़ा है?
आचार्य प्रशांत: एक तो ये है ही कि मन को सफ़ाई में रखोगे तो सफ़ाई में रहेगा और कीचड़ में रखोगे तो कीचड़ में रहेगा। आप मन को कीचड़ में न भी रखिए, आप कहिए कि मैं किसी से मिलती-जुलती नहीं हूँ, मैं तो अकेले रहती हूँ, तो मन वहाँ भी कीचड़ ढूँढ़ ही लेता है। क्योंकि बहुत सारी कीचड़ तो मन ने पहले से ही सोख रखी होती है अपने भीतर।
तो भले ही आदमी अपना जीवन ऐसा कर ले कि बहुत सामाजिक न हो, बहुत लोगों से मिलता-जुलता न हो, अकेले भी रहता हो, लेकिन अकेलेपन में भी भीतर तो कीचड़ है न। मन उसी को बार-बार सोखता रहेगा, उसी की उल्टी करेगा, फिर उसी को सोखेगा फिर उसी की उल्टी करेगा, फिर उसी को सोखेगा।
निदान व समाधान तो सिर्फ़ एक है कि सार्थक काम में अपने आप को पूरी तरह से डुबो दो। क्योंकि कुसंगति बाहरी ही नहीं होती, पहली कुसंगति तो आंतरिक होती है।
मांसाहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस अंग।




