पुरुषों में महत्त्वाकांक्षा और महिलाओं में भावना, उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते। समाज, संस्कार, लोकधर्म और देह, ये सब मिलकर चाहते हैं कि आप अपना पूरा जीवन सिर्फ़ देह के कामों में निकाल दो, कोई भी ऊँचा काम न करो। तुम्हारी भावनाएँ बंधन हैं, गहना मत माना करो उन्हें। संघर्ष करना सीखो, कोई भावनात्मक मजबूरी नहीं होती। 'मैं क्या करूँ, मेरे आँसू निकल जाते हैं।' तो फिर, ‘आँसुओं के साथ सही काम करो।’ बात इसमें नहीं है कि भावना उठी, बात इसमें है कि आपने भावना को समर्थन दे दिया क्या?
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं मतलब हमेशा ही भावनाओं में बह जाती हूँ और उससे निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है, तो यही है मेरा क्वेश्चन। सर ऐसा भी होता है कि रात को नींद नहीं आती है मतलब कुछ बातें सोच-सोचकर।
आचार्य प्रशांत: रात को नींद न आना तो, ये कोई...
प्रश्नकर्ता: सर, वो भावनाएँ इतनी हेवी (भारी) हो जाती हैं मेरे ऊपर।
आचार्य प्रशांत: आपकी क्या उम्र हो गई?
प्रश्नकर्ता: सर ट्वेंटी-सिक्स (छब्बीस)।




