
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम निधि है और मैं एक आई.टी. प्रोफ़ेशनल हूँ। आई फील वेरी ऑनर्ड टू बी एबल टू स्पीक टू यू। थैंक यू फ़ॉर दिस अपॉर्च्युनिटी। मेरा क्वेश्चन है कि जैसे स्टडी के अनुसार 21 दिन तक किसी भी चीज़ को दोहराया जाए तो वो एक आदत बन जाती है। तो अगर हम किसी भी चीज़ को बार-बार दोहराएँ, तो क्या कर्ता को बदला जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: कर्ता पहले भी वो था जो बेहोशी में आदतें उठाता था, 21 दिन बाद एक प्रकरण और खड़ा हो गया बेहोशी में आदत उठाने का। पहला दिन आपको पता था न कि आप वो हो जो 21 बार के दोहराव के बाद आदत बना लोगे? पहले ही दिन जानते थे न? जानते थे कि नहीं जानते थे? तभी तो शुरुआत करी। पहले दिन ही आप जानते थे कि 21 दिन करा तो आदत बन जाएगी। है न? ऐसे आप पहले ही दिन थे, थे कि नहीं थे? हाँ या ना?
प्रश्नकर्ता: हाँ।
आचार्य प्रशांत: और इक्कीसवें दिन क्या हुआ?
प्रश्नकर्ता: इक्कीसवें दिन आदत बनने लगी या बन गई।
आचार्य प्रशांत: तो जो इक्कीसवें दिन हुआ, वो पहले दिन से कुछ अलग था?
प्रश्नकर्ता: लेकिन एक आदत बन गई न हमारे अंदर, जैसे।
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, आप वही हो, आपने आदत बना ली, लेकिन आप तो वही हो न।
प्रश्नकर्ता: पढ़ने की आदत डाल ली सपोज़ पहले नहीं पढ़ते थे, अब 21 दिन आपने कोशिश की है कि रोज़ कोई अख़बार पढ़ना या कोई पत्रिका पढ़नी है। तो आप पसंद करने लग गए पढ़ने को, या फिर आपने कोई अच्छी आदत डाल ली जैसे.....
आचार्य प्रशांत: कोई आदत अच्छी नहीं होती, अच्छी आदत जैसा कुछ नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: जैसे आप वॉकिंग करने लगे या कुछ एक्सरसाइज़।
आचार्य प्रशांत: अच्छी आदत जैसा कुछ नहीं होता, हर आदत बस आपको आदत के वशीभूत रहना सिखाती है, वो आपको वही बने रहने देती है।
उदाहरण के लिए बता देता हूँ, मैं आदत बना रहा हूँ वॉकिंग करने की। इससे मैं क्या सोच रहा हूँ, क्या होगा? मेरा वज़न कम होगा। लेकिन इससे मैं वही बना रह गया जो आदतों का ही ग़ुलाम है, जो जो भी करेगा आदतवश ही करेगा। जो आदतवश वॉकिंग करेगा, वो आदतवश समोसा खाएगा। जिसको आप अच्छी आदत कह रहे हो, अनिवार्यतः उसके साथ बुरी आदत चलेगी ही चलेगी, क्योंकि आदत तो आदत है न।
बुरी आदत का इलाज अच्छी आदत नहीं होती, बुरी आदत का इलाज होश होता है।
लेकिन आपका जो पूरा सेल्फ-हेल्प लिटरेचर है, वो ये बात आपको नहीं बताता। वो बताता है कि किस तरीक़े से अपने ही माइंड को मैनिपुलेट करो। ये आप जितनी बातें बोल रहे हो न, सेल्फ-मैनिपुलेशन की हैं, सेल्फ़-डिज़ॉल्यूशन की नहीं हैं। “हाउ टू ट्रिक द सेल्फ।” ऐसी आदत बना लो, ये कर लो, वो कर लो — ख़ुद को हम बेवकूफ़ बनाते हैं, उससे हम होशियार थोड़े ही हो जाएँगे।
एक आदमी सुबह उठता है, उसने आदत बना ली है कि सुबह उठते ही मैं वॉक पर जाता हूँ, ठीक है। न सोचा न समझा, वॉक पर निकल गया, यही हुआ है न? ठीक वैसे ही जैसे, न सोचा, न समझा, वॉक पर निकल गया, वैसे ही न सोचेगा, न समझेगा, और भी दस काम करेगा फिर वो ज़िंदगी में, क्योंकि मूल आदत वॉकिंग नहीं है उसकी, मूल आदत है न सोचना, न समझना। ये है उसकी मूल आदत। तो ये मूल आदत उससे सौ और काम कराएगी।
तो कोई अच्छी आदत नहीं होती, ये लोक-संस्कृति में इस तरह का चलता है, “कुछ अच्छी आदतें पा लो बेटा।” कोई अच्छी आदत नहीं होती।
प्रश्नकर्ता: तो फिर हम अपने आप को नहीं बदल सकते? कैसे मतलब?
आचार्य प्रशांत: इतनी तो आज बात करी, आपने सुना क्या? कर्ता को बदलने की कोई विधि होती है? कर्म का अवलोकन, बात ख़त्म। पर चूँकि हम ये आग्रह करना चाहते हैं कि अच्छी आदतें ज़रूरी हैं तो तुरंत ये तर्क आ गया, “यानि कर्ता बदला नहीं जा सकता?”
कम से कम 500 घंटों में, 5000 बार मैंने बताया है कि कर्ता कैसे बदला जा सकता है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है, एक बार ये देख लोगे, कर्ता बदलता है। कर्ता अदृश्य रहता है, बस अपने कर्म में वो प्रकट होता है और कर्ता की सारी आदतें ही उसका कर्म बनती हैं। आप अपना कोई भी कर्म देखोगे न, तो आपको दिखाई देगा वो कर्म है ही नहीं, वो एक आदत भर है।
आदत माने क्या? जो कुछ भी अंधेपन में, बेहोशी में करा जाए, उसको आदत बोलते हैं।
आदत को ही शास्त्रीय भाषा में वृत्ति बोल देते हैं — टेंडेंसी। एक पूरा का पूरा सत्र इस पर था, खोज के देखिएगा। “आदत और अभ्यास में क्या अंतर है?” इसको खोजिएगा, पढ़िएगा।
प्रश्नकर्ता: एक चीज़ और हमने डिस्कस की, कि हम जैसे देवताओं का पूजन करते हैं, देवताओं को अर्पण करना चाहिए। पर देवताओं को मतलब श्रेष्ठ लोगों को या श्रेष्ठ, अपने से श्रेष्ठ को, जैसे हमने डिस्कस किया। तो मतलब अपने श्रेष्ठ को ठीक है, लेकिन जो अपने साथ के हैं या अपने से निम्नतर हैं, उन लोगों के साथ भी शेयर करना चाहिए। उससे फ़ायदा नहीं है या वो यज्ञ नहीं है?
आचार्य प्रशांत: आप गाड़ी चला रही हैं, आपके बगल में आपका बच्चा बैठा है, जो गाड़ी चलाना नहीं जानता, तो आप स्टीयरिंग उसको अर्पित कर देंगी?
प्रश्नकर्ता: नहीं। हमनें डिस्कस किया कि जो अच्छी चीज़ है, मेरे पास कुछ भी अच्छा हो सकता है, कुछ खाने में अच्छा हो सकता है।
आचार्य प्रशांत: अच्छा वही है, जो ऊँचा होता है। अच्छा माने वो नहीं जो स्वाद में अच्छा लगता है, समोसे को हम अच्छा नहीं बोल रहे, अच्छा माने ऊँचा। संसाधन। यज्ञ में संसाधन वहाँ रखे जाते हैं, जहाँ उन्हें होना चाहिए। चीज़ उसको दी जाती है, जो उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग कर सके। गाड़ी की स्टीयरिंग अपने हाथ में रखोगे, किसी नासमझ के हाथ में थोड़ी दे दोगे! और अगर नासमझ के हाथ में है, तो उससे छीन लेना यज्ञ कहलाता है।
ये यहाँ अच्छी-अच्छी गुडीज़ बाँटने की बात नहीं हो रही है। जीवन गुडीज़ के भोग के लिए नहीं है, हर चीज़ एक संसाधन है मुक्ति तक पहुँचने के लिए। वो संसाधन उसके हाथ में दो, जो सचमुच मुक्ति तक पहुँचने का इच्छुक हो भी। जो संसाधन खा जाना चाहता है उसको दोगे, या जो संसाधन का सही उपयोग करना चाहता है, उसको दोगे? बोलो।
एक ₹20 है, एक को दिया, वो उससे किताब ख़रीद लेगा; दूसरे को दिया, वो उससे जलेबी ख़रीद लेगा। किसको दोगे? ये यज्ञ है। जो जलेबी ख़रीदने में ₹20 खा जाएगा, उसको मत दो। वो ₹20 उसको दो, जिससे वो किताब रचेगा या किताब पढ़ेगा।
प्रश्नकर्ता: या जिसको ज़्यादा ज़रूरत है।
आचार्य प्रशांत: ज़रूरत का भी एक ही पैमाना है, एक ही केंद्रीय ज़रूरत होती है मुक्ति और कोई ज़रूरत नहीं होती। कोई बोले, “मुझे बहुत ज़रूरत है, मैं जलेबी खाऊँगा” ये ज़रूरत नहीं मानी जानी है।
एक ही ज़रूरत है, जो संसाधनों का उस ज़रूरत की दिशा में इस्तेमाल करे, उसको दे दो संसाधन, ये यज्ञ है।