प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही चीज़ का लम्बे समय तक सॉल्यूशन (हल) नहीं मिल पाता। जैसे मान लीजिए कि कोई मानसिक समस्या है, उसमें काफ़ी समय बीत गया और उस पर मनन-मंथन भी काफ़ी हुआ, लेकिन उससे उबर नहीं पाये हम, उससे उसका सॉल्यूशन (हल) नहीं निकल पाया। और उसके अटकने के कारण फिर अध्यात्म या कुछ और आगे बढ़ने की बात आती है, तो पता चला कि हम तो अभी उसी चीज़ में अटके हुए हैं। और आगे बढ़ने का भी कैसे सोच लें।
जैसे मैं अपनी व्यक्तिगत समस्या बताना चाहता हूँ। बचपन से कुछ लोगों से मिलने में एक झिझक-सी, डर-सा जैसे होता है। इसके अलावा अनेक क्षेत्रों में अभिव्यक्ति हुई है, लेकिन जब इस बिन्दु पर सोचते हैं तो उसका सॉल्यूशन नहीं निकलता कि कैसे ये चीज़ चली आ रही है। इसका क्या समाधान इसका किया जाए?
आचार्य प्रशांत: किस चीज़ का समाधान?
प्र: जैसे कई बार खुल न पाना, लोगों के बीच में या ग्रुप (समूह) में कहीं, एक अपनेआप को आइसोलेट- सा (एकान्त), अलग-सा समझना उसमें। तो इसकी क्या वजह है इसको?
आचार्य: क्यों खुलना है ग्रुप में?
प्र: अभिव्यक्ति ज़रूरी है, ऐसा लगता है।




