हम एक ऐसे माहौल में जीते हैं जिसमें समझ के लिए बहुत जगह नहीं है, और इसलिए हमने भावनाओं को बहुत ऊँचा दर्जा दे दिया है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि जो कोई भी तुम्हें ग़ुलाम बनाना चाहेगा, वह जरूर भावुकता का प्रदर्शन करेगा। भावुक करके ही तुम्हारे मन पर कब्जा किया जा सकता है। भावुकता में बड़ी हिंसा है! संवेदनशीलता में प्रेम है; संवेदनशीलता सीखो, भावुकता नहीं।
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प्रश्नकर्ता: सर, क्या किसी भी व्यक्ति की भावनाएँ गलत हो सकती हैं?
आचार्य प्रशांत: भावनाओं के अलावा और कुछ गलत होता ही नहीं!
भावना क्या है, इसको समझो।
जिसको तुम कहते हो कि अमुक व्यक्ति भावुक हो गया उसका अर्थ क्या है, इसको समझो। जब एक बच्चा पैदा होता है तो वो वृत्तियों का एक पिंड होता है, वृत्तियों का समूह; वृत्तियाँ ही पैदा होती हैं। उनमें जो मूल वृत्ति होती है, वो ‘अहम वृत्ति’ होती है। फिर बाहर से प्रभाव आते हैं। वो प्रभाव जब मन में ऊपर-ऊपर रहते हैं, सतह पर रहते हैं तो उनको कहते हैं–विचार। वही प्रभाव जब मन में गहरे प्रवेश कर जाते हैं, तो फिर वो वृत्तियों को जगा देते हैं और वृत्तियाँ मन के तहखाने में पड़ी होती हैं, उनमें बड़ी ऊर्जा होती है।
तुम ऐसे समझ लो कि अगर बाहर कुछ है, जिससे तुम्हें सिर्फ थोड़ी बहुत अड़चन हो रही है या ऊब हो रही है, तो मन में विचार उठेगा कि, 'ये सब क्या है?' थोड़ा सा क्लेश उठेगा, तुम सोचोगे कि, 'मैं इस जगह से दूर हट जाऊँ,' या तुम सोचोगे कि, 'मैं इस स्थिति को बदल दूँ, या इस व्यक्ति को यहाँ से हटा दूँ,' और ये सब कुछ मन में चलता रहेगा, और किसी और को पता भी नहीं लगेगा; तुम बैठे-बैठे सोचते रहो!




