नारी मन और भावनाएँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल भावनाओं को पहचानने पर है। कुछ चार साल पहले मैंने एक वर्कशॉप अटेंड की थी, जिसका नाम था ‘सेक्रेड फेमिनिन'। उसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं थी जो कि मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
उसमें एक स्टेटमेंट थी- ‘इमोशन इस द एज ऑफ़ वैकफुलनेस। उस टीचिंग का सार यह था कि जो स्पिरिचुएलिटी है, उसमें भी देयर आर वेज़ ऑफ़ सीइंग (देखने के तरीक़े होते हैं)। एक जो फेमिनिन वे है, वो क्या कहती है।
क्योंकि ज़्यादातर अध्यात्म आदमियों ने लिखा है, तो उन्होंने कुछ चीज़ें हटा दी हैं। बुद्धिज़्म में भी इस तरह के काफ़ी डिवीज़नस होते हैं। 'व्रजयान', बुद्धिज़्म की टीचिंग्स पर निर्धारित था वह कोर्स। और उसमें ये कहा गया था कि 'जो डिफिकल्ट इमोशंस हैं, अगर आप उसको सप्रेस करके अध्यात्म में आगे बढ़ना चाहेंगे, तो एक स्पिरिचुअल बाइपास हो जाता है।' मेरा मुख्य सवाल यह है कि हाउ टू रेकॉग्निस स्पिरिचुअल बयपास एंड हाउ इट इस रिलेटेड टू इमोशंस? और रोज़मर्रा में हम जैसे भावनाओं से गुज़रते हैं?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं है, आप मेरे हाथों कुछ विध्वंस कराना चाहती हैं। (श्रोतागण हसँते हुए)
आप भारत से हैं, षड्दर्शन का देश है यह; आपने छह दर्शनों को इस लायक नहीं समझा कि पढ़ें? इतने संत हुए, वो भी इस लायक नहीं थे कि उनसे मार्गदर्शन ले लिया जाए? आप कहाँ जाकर, किस वर्कशॉप (कार्यशाला) में बैठ आईं?



