प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे अभी थोड़े ही समय पहले तक इसी बात पर चर्चा हो रही थी कि कैसे जो छोटे कस्बे हैं या शहर हैं हिन्दुस्तान में, उसमें क्योंकि लोगों के पास ठीक काम नहीं है करने को, तो अपने समय बर्बाद करने को वो वही सारे ऐबों में फँस जाते हैं जिन ऐबों में फँसकर आदमी जानवर बनता जाता है और यह बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है; इसकी कोई समाप्ति दिख नहीं रही है, बल्कि जैसा आपने बताया था कि पिछले बीस सालों में हैवानियत बढ़ते गयी है छोटे शहरों, गाँवों, कस्बों में। तो इसका इलाज क्या है? इसके लिए क्या किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: दो वजहें रही हैं, जिसकी वजह से छोटे शहरों और गाँवों में सांस्कृतिक पतन बहुत ज़्यादा हुआ है और बहुत तेज़ी से हुआ है, बीस साल में ही तस्वीर बदल गयी है।
जो पहली वजह है, वो ज़्यादा मूलभूत है। वो ये है कि जो संस्कृति चल रही थी वहाँ पहले से ही—इन बीस वर्षों में नहीं, इससे बहुत पहले से ही—वो संस्कृति अपनेआप में बहुत वज़न नहीं रखती थी, बहुत ठोस नहीं थी, खोखलापन था एक। रस्में थीं, प्रथाएँ हैं, परम्पराएँ हैं, रूढ़ियाँ; लोग उनका पालन कर रहे हैं या कुछ मूल्य थे, एक वैल्यू सिस्टम् (मूल्य व्यवस्था) था, लोग उसका भी पालन कर रहे हैं।
पर न तो ये पता है कि किसी मूल्य परम्परा पर चल रहे हैं तो क्यों चल रहे हैं, किसी को मूल्य देते हैं तो क्यों देते हैं; न आपको ये पता है कि आप किसी प्रथा का पालन कर रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं, उस प्रथा के केन्द्र में क्या रखा हुआ है।
तो उन चीज़ों को (पर) लोग बहुत दिनों से चले आ रहे थे, चले आ रहे थे और ऐसा लगता था कि इस चीज़ में बहुत दम होगा इसलिए दिनों से चल रही है।




